पहले ही लिखी जा चुकी थी मुख्यमंत्री पद से नीतीश कुमार की विदाई की पटकथा

कृष्णमोहन झा

आज जब मैं बिहार के ताजे राजनीतिक घटनाक्रम का गहन विश्लेषण करने की मंशा से अपने इस लेख की शुरुआत कर रहा हूं तब मुझे अपने उस लेख की याद आ जाना स्वाभाविक है जो मैंने ढाई साल पहले भाजपा के सहयोग से नीतीश कुमार की सरकार बनने के मौके पर लिखा था। नीतीश कुमार ने उस समय राजद के नेतृत्व वाले महागठबंधन से नाता तोड़कर भाजपा के समर्थन से सरकार बनाई थी और उन्होंने 9 वीं बार बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। उस घटना क्रम को लेकर लिखे गए अपने लेख में मैंने मैंने अपनी इस दो टूक राय को व्यक्त करने में कोई संकोच नहीं किया था कि इस मौके पर नीतीश कुमार को बधाई की नहीं सहानुभूति की आवश्यकता है।आज जब नीतीश कुमार राज्यसभा की सीट के नामांकन दाखिल कर चुके हैं तब मेरे उस लेख में की गई परोक्ष भविष्यवाणी सच साबित हो गई है।
गत वर्ष भाजपा के समर्थन से दसवीं बार बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर एक कीर्तिमान स्थापित करने वाले नीतीश कुमार राज्यसभा के लिए नामांकन दाखिल कर चुके हैं और इसके लिए उन्होंने यह हास्यास्पद तर्क दिया है कि वे बिहार विधान मंडल के दोनों सदनों के सदस्य बनने के साथ ही संसद के भी दोनों सदनों के सदस्य बनने की वर्षों पुरानी साध को पूरा करना चाहते हैं। शायद नीतीश कुमार ने तय कर लिया था कि अपने मन की उस अधूरी साध का रहस्योदघाटन वे बिहार से राज्यसभा की सीट के लिए नामांकन दाखिल करने के बाद ही करेंगे। पिछले दिनों राज्य सभा सीट के नामांकन दाखिल करने से जब उनकी पार्टी के कार्यकर्ता अत्यधिक व्याकुल हो गये तब नीतीश कुमार ने आखिरकार वह रहस्योद्घाटन कर ही दिया जो अब तक जदयू के कार्यकर्ताओं के गले नहीं उतर रहा है। नीतीश कुमार ने बताया कि उनके मन में वर्षों से यह उत्कंठा बनी हुई थी कि वे बिहार विधान मंडल के दोनों सदनों की सदस्यता के साथ ही संसद के भी दोनों सदनों की सदस्यता अर्जित करने का कीर्तिमान स्थापित करें। राज्यसभा सीट के लिए दाखिल करने का फैसला नीतीश कुमार ने अपनी इस अधूरी साध को पूरा करने की मंशा से किया है इस तर्क को जदयू के कार्यकर्ता तो क्या कोई भी स्वीकार नहीं कर पा रहा है । उनका मानना है कि मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़ कर राज्य सभा में बैठने का फैसला नीतीश कुमार ने भाजपा के दबाव में आकर किया है जिससे पार्टी कार्यकर्ताओं का मनोबल टूटना स्वाभाविक है लेकिन नीतीश कुमार उन्हें यह कह कर सांत्वना दे रहे हैं कि राज्य सभा का सदस्य बन जाने के बाद भी बिहार की राजनीति पर उनकी नजर बराबर बनी रहेगी और वे जदयू के हितों को संरक्षण प्रदान करते रहेंगे।
दरअसल पिछले साल संपन्न हुए बिहार विधानसभा चुनावों में जब भाजपा ने जदयू से अधिक सीटें जीतने के बावजूद नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री का ताज धारण करने का सौभाग्य प्रदान किया था तभी इस उलटफेर की पटकथा लिखी जा चुकी थी। बस , भाजपा उचित अवसर की प्रतीक्षा कर रही थी। उधर ‘कुर्सी की राजनीति के चतुर खिलाड़ी’ नीतीश कुमार भी उसी समय इस कड़वी हकीकत का अंदाजा लगा चुके थे कि अब भाजपा से बड़े भाई का सम्मान मिलने की उम्मीद उन्हें हमेशा हमेशा के लिए छोड़ देना चाहिए यही कारण है कि उन्होंने मुख्यमंत्री की कुर्सी का मोह त्याग कर राज्य सभा में जाने का विकल्प स्वीकार कर लिया। अब यह उत्सुकता का विषय है कि राज्यसभा में पहुंचने के बाद केंद्र में उनकी क्या भूमिका होगी। इतना तो तय है कि नीतीश कुमार अपनी कोई शर्त पेश करने की स्थिति में नहीं रह गए हैं। दरअसल दरअसल भाजपा की शर्तों पर राजनीति करने की मजबूरी में तो वे ढाई साल पहले ही आ गए थे जब उन्होंने राजद से संबंध तोड़ कर भाजपा के सहयोग से 9 वीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ग्रहण की थी। उसके बाद उनके नेतृत्व में जब एनडीए बिहार विधानसभा के चुनाव में उतरा तो भाजपा ने अपने रणनीतिक कौशल का इस्तेमाल करके सभी घटक दलों में सीटों का बंटवारा कुछ इस तरह किया कि नवनिर्वाचित विधान सभा में भाजपा ने सबसे बड़ी पार्टी के रूप में प्रवेश करने में सफलता अर्जित की और नीतीश कुमार की पार्टी दूसरे स्थान पर रही। उसके बावजूद भाजपा ने अपनी रणनीति के तहत नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री की कुर्सी से उपकृत किया लेकिन दसवीं बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेकर नीतीश कुमार ने उस समय भले ही एक कीर्तिमान स्थापित कर लिया था परंतु उनके चेहरे पर वह चमक नहीं थी जो उन्होंने कभी ‘सुशासन बाबू’ के रूप में अर्जित की थी। दरअसल वह चमक तो मुख्यमंत्री के रूप में उनके पहले कार्यकाल के बाद ही धीरे धीरे फीकी पड़ने लगी थी। अब तो बिहार में उनकी एकमात्र पहचान यही है कि मुख्यमंत्री की कुर्सी के लिए वे आत्म सम्मान से समझौता करने से उन्हें गुरेज नहीं है। लेकिन अब उन्हें इस हकीकत को स्वीकार कर लेना चाहिए कि बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में यह उनका अंतिम कार्यकाल है। भाजपा के द्वारा अपनी रणनीति के तहत यह संदेश दिया जा है कि उसने नीतीश कुमार को मुख्यमंत्री पद छोड़ने के लिए विवश नहीं किया बल्कि नीतीश कुमार खुद ही राज्य सभा जाने की इच्छा रखते हैं लेकिन सभी जानते हैं कि अंदरखाने की बात कुछ और है। इसमें दो राय नहीं हो सकती कि नीतीश कुमार अगर अपने स्वास्थ्य कारणों से मुख्यमंत्री पद छोड़ने की मंशा जाहिर करते तो शायद उनका वह तर्क कहीं अधिक स्वीकार्य होता और उस पर आसानी से भरोसा भी कर लिया जाता।
बहरहाल अभी यह सुनने में आ रहा है कि राज्य सभा सदस्य बनने के बाद भी नीतीश कुमार एकदम मुख्यमंत्री पद नहीं छोड़ेंगे। बहुत संभव है कि वे मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देने के लिए तत्काल तैयार न हों। मुख्यमंत्री रहते हुए ही भाजपा को इस बात के लिए राजी करने में कोई कसर बाकी नहीं रखेंगे कि भाजपा के मुख्यमंत्री के नेतृत्व में बनने वाली नयी सरकार में संख्या बल के हिसाब से जदयू की न केवल भाजपा के बराबर भागीदारी हो बल्कि जदयू कोटे से जो मंत्री बनाए जाएं उन्हें महत्वपूर्ण पोर्टफोलियो भी मिलें। नीतीश कुमार केंद्र में जाने के पहले न केवल जनता दल यूनाइटेड की बागडोर अपने बेटे निशांत कुमार को सौंपना चाहेंगे बल्कि भाजपा के मुख्यमंत्री के नेतृत्व में बनने वाली नयी सरकार में भी अपने बेटे को उपमुख्यमंत्री पद पर प्रतिष्ठित होते देखने की महत्वाकांक्षा भी उनके मन में अवश्य होगी। नीतीश कुमार के राज्य सभा में जाने से निराश जदयू कार्यकर्ता भी निशांत कुमार को पार्टी की बागडोर सौंपे जाने के पक्ष में हैं। बिहार में पहली बार अपना मुख्यमंत्री बनाने जा रही भाजपा के सामने भी यह चुनौती अवश्य है कि नीतीश कुमार का कट्टर समर्थक मतदाता उससे दूर न जाने पाए।यह चुनौती आसान नहीं है परन्तु जिस तरह भाजपा ने सधे हुए कदमों से आगे बढ़ते हुए अधिकांश राज्यों में अपने को स्थापित कर लिया है उसे देखते हुए यह मान लेना चाहिए कि बिहार में उसने नये युग की शुरुआत कर दी है। बिहार में उसने अपने रणनीतिक कौशल से उस राजनेता की सत्ता से विदाई तय कर दी है जिसने अपने मन के किसी कोने में देश का प्रधानमंत्री बनने की महत्वाकांक्षा पाल रखी थी। गौरतलब है कि 2013 में जब भाजपा ने देश के सबसे लोकप्रिय नेता के रूप में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में प्रोजेक्ट करने का फैसला किया था तब नीतीश कुमार ने उस फैसले से कुपित होकर एक झटके में एनडीए से अपनी पार्टी के 19 साल पुराने संबंध तोड़ दिए थे। नीतीश कुमार को बाद में अपने फैसले पर पश्चात्ताप हुआ और वे फिर एनडीए में लौट आए लेकिन इसके पहले वे यह घोषणा भी कर चुके थे कि भाजपा के विरुद्ध माहौल बनाने के लिए देश भर का दौरा करेंगे लेकिन नीतीश कुमार को यूपीए में अपनी महत्वाकांक्षाएं पूरी न होने से उन्होंने उससे भी दूरी बना ली और कभी भाजपा कभी विपक्षी महागठबंधन से जुड़कर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर काबिज रहने में कामयाब होते रहे। परंतु अब बाजी पलट चुकी है । अब उन्हें उस भाजपा की शर्तों पर राजनीति करनी होगी जिसने उत्तर प्रदेश में मायावती की बसपा और महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की शिवसेना के सामने अस्तित्व का संकट पैदा कर दिया है। यही हाल देश के क ई राज्यों में क्षेत्रीय दलों का हो चुका है।


(लेखक राजनैतिक विश्लेषक है)

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