राम मंदिर के बाद जानकी मंदिर से होगा आस्था का श्रृंगार : विरासत और विकास का नया रूप

अनंत अमित

अयोध्या में श्रीराम मंदिर का निर्माण भारत की आस्था, संस्कृति और धरोहर के पुनर्जागरण का प्रतीक बना। अब, बिहार के सीतामढ़ी के पुनौराधाम में मां जानकी मंदिर का पुनर्विकास इस यात्रा को एक और मुकाम देने जा रहा है। यह केवल एक धार्मिक स्थल का निर्माण नहीं है, बल्कि हमारी आध्यात्मिक विरासत को संजोने और भविष्य की पीढ़ियों तक पहुंचाने का प्रयास है।

मां सीता का जन्मस्थल माना जाने वाला सीतामढ़ी, सदियों से भक्ति और सांस्कृतिक गौरव का केंद्र रहा है। यहां का हर कोना मिथिला की उस परंपरा का गवाह है जिसने रामायण जैसी अमर कथा को जन्म दिया। राम मंदिर के बाद जानकी मंदिर का निर्माण, इस सांस्कृतिक श्रृंखला का स्वाभाविक विस्तार है। यह उत्तर और पूर्व भारत को धार्मिक पर्यटन की एक साझा धुरी पर जोड़ देगा।

882.87 करोड़ रुपये से अधिक की लागत से बनने वाला यह प्रोजेक्ट केवल पूजा-अर्चना का स्थान नहीं होगा, बल्कि क्षेत्र में पर्यटन, रोजगार और बुनियादी ढांचे के विकास का नया द्वार भी खोलेगा। जैसे अयोध्या में मंदिर निर्माण ने स्थानीय अर्थव्यवस्था को नई ऊर्जा दी, वैसे ही सीतामढ़ी भी आने वाले वर्षों में देशी-विदेशी पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र बन सकता है।
राज्य मंत्रिमंडल ने 1 जुलाई को मंदिर परिसर के समग्र विकास के लिए 882.87 करोड़ रुपये की स्वीकृति दी। इस राशि में से 137 करोड़ रुपये का उपयोग पुराने मंदिर और उसके आसपास के क्षेत्र के विकास में किया जाएगा, जबकि 728 करोड़ रुपये पर्यटन से जुड़ी गतिविधियों के लिए निर्धारित हैं। इसके अतिरिक्त, 10 वर्षों तक व्यापक रखरखाव के लिए 16 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे। इस परियोजना के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी बिहार राज्य पर्यटन विकास निगम (बीएसटीडीसी) को सौंपी गई है। हाल ही में राज्य सरकार ने मंदिर के निर्माण और पुनर्विकास के लिए मुख्य सचिव की अध्यक्षता में नौ सदस्यीय न्यास का भी गठन किया है।

आठ अगस्त का दिन मिथिला के लिए अब ऐतिहासिक हो गया। आज का दिन मिथिला और पूरे बिहार के लिए किसी त्यौहार से कम नहीं। गलियां सजी हैं, ढोल-नगाड़ों की गूंज है, और हर चेहरे पर एक ही भाव — मां सीता का स्वागत। मां-बहनें मंगलगीत गा रही हैं, युवा जोश से लबरेज हैं, और बुजुर्गों की आंखों में गर्व और संतोष की चमक है। यह सिर्फ मंदिर का शिलान्यास नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक पुनर्जागरण है।
केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने पूरे विधि विधान और मिथिला के कर्मकांड के अनुसार पुनौराधाम में मां जानकी के भव्य मंदिर का शिल्यान्यास किया है। इस अवसर पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सहित एनडीए के तमाम बड़े नेता और कई मंत्री रहे।  पुनौराधाम में बन रहा है भव्य-दिव्य-नव्य मां जानकी मंदिर, जो न सिर्फ धार्मिक आस्था का केंद्र होगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए विरासत, पर्यटन और विकास का नया अध्याय भी लिखेगा। मिथिला की धरती, जिसे देवी सीता का जन्मस्थल माना जाता है, अब दुनिया के सांस्कृतिक नक्शे पर और भी प्रखर रूप से उभरेगी।

यह मंदिर केवल ईंट-पत्थरों का ढांचा नहीं, बल्कि मिथिला की संस्कृति, मर्यादा और मातृशक्ति का प्रतीक होगा। यहां हर भक्त के कदम के साथ आशीर्वाद की गूंज होगी, हर दीवार पर इतिहास की कहानी होगी, और हर कोने से मां जानकी के स्नेह की अनुभूति होगी। राजनीतिक विमर्श अपनी जगह है, लेकिन सच यह है कि मां सीता के नाम पर एकजुट बिहार आज उत्सव मना रहा है। जब परंपरा और विकास साथ कदम बढ़ाते हैं, तो नतीजा यही होता है—भक्ति का उल्लास और भविष्य की उम्मीद का संगम।

ऐसे परियोजनाओं पर अक्सर राजनीति की छाया पड़ जाती है। लेकिन जानकी मंदिर केवल किसी दल या सरकार का प्रोजेक्ट नहीं, बल्कि यह पूरे भारत की सांस्कृतिक विरासत है। इसे आस्था और एकता के प्रतीक के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि चुनावी समीकरणों के नजरिये से। असल में, राम मंदिर और जानकी मंदिर – ये दोनों मिलकर भारतीय सभ्यता के दो ऐसे स्तंभ बन सकते हैं, जो आने वाले समय में न केवल धार्मिक पर्यटन बल्कि सांस्कृतिक पुनर्जागरण के भी आधार बनेंगे। यह आस्था का श्रृंगार है, जिसमें विरासत और विकास दोनों का नया रूप उभरकर सामने आएगा।

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं।)

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