कानपुर। साहित्यकारों और पत्रकारों के साथ ही आजादी की लड़ाई में कलम और हथियारों से क्रांति का उद्घोष करने कानपुर में आजकल शब्द बाण के साथ ही शब्दों की अमृत वर्षा हो रही है। स्थान है जीआईसी का विशाल मैदान जहां पर पुस्तक मेला 2025 की शुरुआत 13 नवम्बर से हो चुकी है। नामी-गिरामी प्रकाशकों ने मुख्तलिफ स्टालों पर विभिन्न विषयों की पुस्तकों की प्रदर्शनी लगाई है। यह वार्षिक आयोजन पुस्तक प्रेमियों, विद्यार्थियों, लेखकों और प्रकाशकों के लिए एक बड़े उत्सव की तरह होता है। दस दिन तक चलने वाले पुस्तक मेला में हिंदी, अंग्रेज़ी, उर्दू सहित कई भाषाओं की नई और क्लासिक किताबें उपलब्ध हैं। स्थानीय लेखकों के लिए अलग स्टाल हैं जहां वे अपनी पुस्तकें प्रदर्शित कर सकते हैं। वरिष्ठ पत्रकार कवि सुरेश अवस्थी कहते हैं कि पढ़े कानपुर-बढ़े कानपुर की थीम का व्यापक प्रचार होना चाहिए था। वरिष्ठ पत्रकार महेश शर्मा का कहना है कि हमारे अपने कनपर में लेखकों और पत्रकारों के कलम कुल्हाडों से तो फिरंगी हुकूमत हिल गयी थी। नामचीन लेखकों की नगरी में आयोजित पुस्तक मेला में लोगों भागीदारी ने थोड़ा निराश किया। मंच से सत्ता का गुणगान अटपटा से लगा। पुस्तक मेला के मंच से राजनीतिक विचार आधारित चर्चा से परहेज करना चाहिए। उद्घाटन अवसर और कवि सम्मेलन में कुछ ऐसी ही झलक मिली थी। पुस्तक मेला से शहर में पढ़ने की संस्कृति को प्रोत्साहन मिलना चाहिए।
ज्ञान, सृजन और साहित्य का पर्व कहे जाने वाला कानपुर पुस्तक मेला का उद्देश्य शहर में पढ़ने की संस्कृति को बढ़ावा देना है। मेले का उद्घाटन मेयर प्रमिला पांडेय ने किया। उद्घाटन समारोह में शहर के अनेक शिक्षाविद, लेखक, छात्र और साहित्य प्रेमी मौजूद रहे। लखनऊ आये पत्रकार श्रीधर अग्निहोत्री कहते हैं कि किताबें केवल ज्ञान नहीं देतीं, वे मनुष्य को संवेदनशील बनाती हैं। इतिहासकार साहित्य निकेतन के स्वामी मनोज कपूर ने युवाओं से अपील की कि वे मोबाइल की स्क्रीन से हटकर किताबों के पन्नों से दोस्ती करें। युवा पत्रकार प्रवीन मोहता तो लगभग रोज ही आते हैं। मोहित पांडे भी किताबों का थैला लिए मुस्कराते हुए निकल रहे हैं। पुस्तक मेला में राजकमल, वाणी, प्रभात, भावना, हिंदी युग्म, पेंगुइन, ऑक्सफोर्ड और नेशनल बुक ट्रस्ट जैसे प्रमुख प्रकाशनों के स्टॉल आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं। यहां साहित्य, विज्ञान, इतिहास, राजनीति, धर्म और बाल पुस्तकों का समृद्ध संग्रह है। पुस्तक मेलों की एक और खासियत यह है कि यह स्थानीय और नवोदित लेखकों को मंच प्रदान करता है। वे यहाँ अपनी किताबें सीधे पाठकों तक पहुँचा सकते हैं। कई बार ऐसे आयोजनों से नए लेखक पहचान भी बना लेते हैं। पुस्तक मेले में आयोजित परिचर्चाएँ, कविता गोष्ठियाँ और विमोचन समारोह साहित्यिक वातावरण को जीवंत बना देते हैं। वरिष्ठ पत्रकार जीपी वर्मा कहते हैं कि यहां आयोजित कार्यक्रम न सिर्फ मनोरंजक होते हैं, बल्कि समाज में सोचने और समझने की क्षमता भी बढ़ाते हैं। वर्मा कहते हैं कि पुस्तक मेला केवल एक व्यापारिक आयोजन नहीं, बल्कि ज्ञान, संस्कृति और संवेदना का पर्व है। यह हमें याद दिलाता है कि पढ़ना सिर्फ शौक नहीं, बल्कि समाज को सजग और समृद्ध बनाने का सबसे सशक्त माध्यम है। पेंगुइन के डॉ संजीव मिश्र की उपश्थिति उल्लेखनीय रही। वे अपनी पुस्तक बवाली कनपुरिया को प्रमोट करते देखे तो महेश शर्मा भी भला कहां चूकने वाले थे। वह रफनोट्स कि मार्केटिंग करते रहे।

