पटना। कटिहार रेलवे स्टेशन पर उस दिन रोज़ से कुछ ज्यादा भीड़ थी। प्लेटफार्म पर खड़ी कटिहार-मुंबई सेंट्रल ट्रेन में चढ़ने वाले यात्रियों के साथ उनके परिजन भी थे। इसी भीड़ में 21 बच्चों का एक समूह भी मौजूद था, जिनके साथ छह वयस्क थे — लेकिन कोई भी उनके परिवार जैसा नहीं लग रहा था। पहली नजर में यह असामान्य नहीं लगा, लेकिन 1400 किलोमीटर दूर मध्यप्रदेश के विदिशा में स्थित ‘विदिशा सोशल वेलफेयर ऑर्गेनाइजेशन’ (वीएसडब्ल्यूओ) को सूचना मिल चुकी थी कि बच्चों की तस्करी करने वाला एक गिरोह इन्हें ट्रेन से मुंबई ले जा रहा है।
बच्चों को मुंबई और सूरत ले जाकर कपड़ों पर कढ़ाई और कशीदाकारी जैसे श्रम-कार्यों में लगाया जाना था। चौंकाने वाली बात यह थी कि 14 वर्ष के कुछ बच्चों ने बताया कि वे पहले से ही तीन वर्षों से इन शहरों में काम कर रहे थे। तस्कर बच्चों के गांव के ही थे और उनके माता-पिता को बेहतर भविष्य और कमाई का लालच देकर बच्चों को अपने साथ ले जाते थे। मुंबई और सूरत पहुंचने पर बच्चों से घरों में चलने वाली इकाइयों में बिना तय समय के काम कराया जाता, और अधिकतर मजदूरी भी नहीं दी जाती थी।
वीएसडब्ल्यूओ, जो ‘जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रन’ (जेआरसी) नेटवर्क का हिस्सा है, ने यह खबर रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ) को दी। 16 जुलाई की सुबह चार बजे, वीएसडब्ल्यूओ और आरपीएफ की संयुक्त टीम ने कार्रवाई कर सभी 21 बच्चों को मुक्त कराया और छह तस्करों को गिरफ्तार कर लिया। ये सभी बच्चे बिहार के सीमांचल क्षेत्र – कटिहार, किशनगंज और पूर्णिया – से थे, जिनकी उम्र 11 से 16 वर्ष के बीच थी।
पूछताछ के बाद छह तस्करों के खिलाफ मामला दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार किया गया। बच्चों को बाल कल्याण समिति (सीडब्ल्यूसी) के समक्ष प्रस्तुत किया गया और आश्रय गृह भेजा गया। सीडब्ल्यूसी ने बच्चों के माता-पिता को सूचित किया और उन्हें बच्चों को सौंपने की प्रक्रिया शुरू की।वीएसडब्ल्यूओ के निदेशक राम रघुवंशी ने कहा, “बच्चों की तस्करी पर अंकुश लगाने के लिए सरकार और नागरिक समाज दोनों को मिलकर अधिक सतर्क और सक्रिय होना होगा। कानून तो हैं, लेकिन जागरूकता की कमी और निगरानी का अभाव बड़ा संकट है। तस्करी के इस अंधेरे सफर को रोकने के लिए सख्ती और संवेदनशीलता दोनों जरूरी हैं।”

