क्या नेतन्याहू की कॉल ने बिगाड़ा इस्लामाबाद वार्ता का खेल? US-ईरान गतिरोध के पीछे की कहानी

नई दिल्ली। इस्लामाबाद में अमेरिका और ईरान के बीच चल रही ऐतिहासिक वार्ता का अचानक विफल हो जाना वैश्विक कूटनीति के लिए बड़ा झटका माना जा रहा है। जहां इस बातचीत से मध्य-पूर्व में शांति की उम्मीदें बंधी थीं, वहीं इसके टूटने के बाद कई गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब दोनों देश समझौते के करीब थे, तो आखिर आखिरी क्षणों में ऐसा क्या हुआ कि बातचीत पटरी से उतर गई।

ईरान का सनसनीखेज आरोप

ईरान के विदेश मंत्री Seyyed Abbas Araghchi ने बड़ा दावा करते हुए कहा है कि बातचीत के दौरान इजरायल के प्रधानमंत्री Benjamin Netanyahu ने अमेरिकी उपराष्ट्रपति JD Vance को फोन किया, जिसने पूरे घटनाक्रम को प्रभावित किया।

अराघची के अनुसार, इस कॉल के बाद अमेरिका का रुख बदल गया और वार्ता का केंद्र अमेरिका-ईरान मुद्दों से हटकर इजरायल के हितों की ओर झुक गया। उन्होंने आरोप लगाया कि अमेरिका ने बातचीत की मेज पर वे शर्तें रखनी शुरू कर दीं, जिन्हें वह युद्ध के जरिए हासिल नहीं कर पाया था।

‘इस्लामाबाद MoU’ से ठीक पहले बदला माहौल

ईरान का कहना है कि वार्ता सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ रही थी और दोनों पक्ष “इस्लामाबाद समझौते” के करीब पहुंच चुके थे। लेकिन अचानक अत्यधिक मांगें, बदलते लक्ष्य और नई शर्तें सामने आने लगीं, जिससे बातचीत ठप हो गई।

अराघची ने कहा, “47 वर्षों में पहली बार ईरान ने सद्भावना के साथ अमेरिका से बातचीत की, लेकिन बदले में हमें अविश्वास और दबाव का सामना करना पड़ा। सद्भावना का जवाब सद्भावना से मिलना चाहिए, न कि दुश्मनी से।”

परमाणु मुद्दा बना विवाद की जड़

विश्लेषकों के अनुसार, वार्ता के टूटने के पीछे ईरान का परमाणु कार्यक्रम भी एक बड़ा कारण रहा। JD Vance ने अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा था कि अमेरिका को यह सुनिश्चित करना है कि तेहरान परमाणु हथियार विकसित न करे।

हालांकि ईरान का दावा है कि यह मुद्दा पहले से चर्चा में था और बातचीत आगे बढ़ रही थी, लेकिन अचानक रुख में बदलाव ने पूरी प्रक्रिया को प्रभावित कर दिया।

नाकेबंदी की घोषणा, तेल बाजार में उछाल

वार्ता विफल होने के तुरंत बाद अमेरिका ने कड़ा कदम उठाते हुए ईरानी बंदरगाहों की नौसैनिक नाकेबंदी की घोषणा कर दी। इस फैसले का असर वैश्विक बाजार पर तुरंत दिखा।

तेल की कीमतों में तेज उछाल दर्ज किया गया—कच्चा तेल 8 प्रतिशत बढ़कर 104.24 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गया, जबकि ब्रेंट क्रूड 7 प्रतिशत बढ़कर 102.29 डॉलर प्रति बैरल हो गया।

विशेषज्ञों का मानना है कि मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव का सीधा असर ऊर्जा बाजार पर पड़ रहा है और आने वाले दिनों में यह अस्थिरता और बढ़ सकती है।

मध्य-पूर्व में बढ़ता तनाव

इस घटनाक्रम ने एक बार फिर मध्य-पूर्व की जटिल कूटनीति को उजागर कर दिया है, जहां क्षेत्रीय और वैश्विक शक्तियों के हित अक्सर टकराते रहते हैं। इजरायल, अमेरिका और ईरान के बीच संतुलन बनाना हमेशा से चुनौतीपूर्ण रहा है।

अगर ईरान के आरोपों में सच्चाई है, तो यह संकेत देता है कि क्षेत्रीय राजनीति किस तरह शांति प्रयासों को प्रभावित कर सकती है।

क्या आगे बढ़ेगी बातचीत?

अब सवाल यह है कि क्या दोनों देश फिर से बातचीत की मेज पर लौटेंगे या यह गतिरोध और गहरा होगा। फिलहाल, हालात तनावपूर्ण हैं और वैश्विक समुदाय की नजरें इस पूरे घटनाक्रम पर टिकी हुई हैं।

इस्लामाबाद में टूटी यह वार्ता सिर्फ एक कूटनीतिक असफलता नहीं, बल्कि उस जटिल शक्ति संतुलन का प्रतीक है, जहां एक फोन कॉल भी अंतरराष्ट्रीय समीकरण बदल सकता है।

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