डॉ धनंजय गिरि
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बिहार राज्य जीविका निधि क्रेडिट कोऑपरेटिव यूनियन लिमिटेड के शुभारंभ अवसर पर अपने संबोधन में जिस तरह से कांग्रेस और आरजेडी पर तीखा प्रहार किया, उसने एक बार फिर भारतीय राजनीति की गिरती हुई भाषा और मर्यादा पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। प्रधानमंत्री ने भावुक स्वर में कहा कि उनकी स्वर्गीय माता को विपक्षी मंच से गालियाँ दी गईं—और यह केवल उनकी माँ का नहीं बल्कि पूरे देश की माताओं-बहनों-बेटियों का अपमान है।
यह वक्तव्य महज एक राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं है। यह उस मूल समस्या की ओर संकेत करता है, जहाँ असहमति की जगह अब व्यक्तिगत कटाक्ष और अपमानजनक टिप्पणियाँ ने ले ली है। राजनीति में विचारों का संघर्ष होना चाहिए, न कि परिवारों या दिवंगत माता-पिता पर अभद्र आक्षेप। लोकतंत्र का आधार गरिमा और संवाद है, लेकिन जब भाषा की मर्यादा टूटती है तो जनता का विश्वास भी आहत होता है।
प्रधानमंत्री ने सही कहा कि “माँ हमारा संसार है, माँ हमारा स्वाभिमान है।” भारतीय समाज में मातृशक्ति को देवत्व का दर्जा दिया गया है। बिहार की संस्कृति तो विशेष रूप से “माई के स्थान देवता-पीतर से ऊपर” मानने वाली है। ऐसे प्रदेश में अगर राजनीति के मंच से किसी माँ पर अपमानजनक टिप्पणी की जाती है, तो यह केवल राजनीतिक शिष्टाचार का ह्रास नहीं, बल्कि सामाजिक मूल्यों का भी पतन है।
यह घटना विपक्ष के लिए आत्ममंथन का विषय होना चाहिए। चुनावी राजनीति में प्रतिस्पर्धा स्वाभाविक है, लेकिन वह इस स्तर तक न पहुँचे कि लोकतांत्रिक संवाद का स्वरूप ही दूषित हो जाए। सत्ता और विपक्ष दोनों को यह सुनिश्चित करना होगा कि बहस और आलोचना तर्क और नीतियों पर केंद्रित रहे, न कि व्यक्तिगत अपमान पर।
प्रधानमंत्री मोदी ने इस अवसर पर महिला सशक्तिकरण और जीविका समूहों की भूमिका पर भी प्रकाश डाला। यह संदेश राजनीति के लिए दिशा-दर्शक है कि असली संघर्ष विकास और आत्मनिर्भरता की राह पर होना चाहिए।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का हालिया संबोधन बिहार की राजनीति में नए विमर्श को जन्म देता है। अपने वक्तव्य में उन्होंने न केवल बिहार की सांस्कृतिक परंपराओं का स्मरण कराया, बल्कि यह भी रेखांकित किया कि राजनीति में असहमति के बावजूद मर्यादा और शालीनता बनी रहनी चाहिए। विपक्ष के मंच से उनकी स्वर्गीय मां के खिलाफ अपशब्दों का प्रयोग न केवल व्यक्तिगत स्तर पर अपमान है, बल्कि यह पूरे देश की मातृशक्ति का तिरस्कार भी माना जाएगा।
भारत की राजनीति में वैचारिक मतभेद स्वाभाविक हैं, किंतु जब बहस व्यक्तिगत हमलों तक सीमित हो जाती है, तब लोकतंत्र की आत्मा आहत होती है। प्रधानमंत्री ने सही ही कहा कि जिनकी राजनीति जातिवाद और परिवारवाद पर टिकी है, वे कभी गरीब परिवार की पीड़ा को समझ ही नहीं सकते। यह वक्तव्य केवल एक राजनीतिक पलटवार नहीं, बल्कि सामाजिक चेतावनी भी है कि मातृशक्ति के सम्मान से समझौता किसी भी कीमत पर स्वीकार्य नहीं होना चाहिए।
बिहार की धरती सदैव संस्कृति, परंपरा और मूल्यों की ध्वजवाहक रही है। यहां “माई के स्थान देवता-पीतर से ऊपर” माना जाता है। ऐसे प्रदेश में माताओं पर की गई अभद्र टिप्पणी निश्चित ही सामाजिक चेतना को आहत करती है। यही कारण है कि प्रधानमंत्री मोदी के संबोधन के दौरान बड़ी संख्या में महिलाएं भावुक हुईं और बिहार भाजपा अध्यक्ष दिलीप जायसवाल तक की आंखें नम हो गईं।
यह प्रकरण केवल चुनावी बयानबाजी का हिस्सा नहीं है। यह सवाल है कि क्या हम राजनीति को इतनी गिरावट तक ले जाएंगे कि वहां केवल निंदात्मक शब्द और व्यक्तिगत हमले ही शेष रह जाएं? लोकतंत्र का असली सौंदर्य संवाद, बहस और तर्कशीलता में है, न कि अपशब्दों और व्यक्तिगत कटाक्ष में।
अब समय आ गया है कि सभी राजनीतिक दल इस मुद्दे पर आत्ममंथन करें। अगर राजनीति में मातृशक्ति का सम्मान सुरक्षित नहीं रहेगा, तो आने वाली पीढ़ियां लोकतंत्र से विश्वास खो देंगी। प्रधानमंत्री मोदी ने महिलाओं की आत्मनिर्भरता और जीविका समूहों की भूमिका का उल्लेख कर एक सकारात्मक राह भी दिखाई है। यही राजनीति का सही रास्ता है—सम्मान, सहयोग और विकास की दिशा।


