Familial Hemophagocytic lymphohistiocytosis, 3 वर्ष के मरीज़ के जीन में दुर्लभ म्यूटेशन

नई दिल्ली। हाल ही में 3 वर्ष की मरीज़, नाशरा खान को इलाज के लिए फोर्टिस अस्पताल शालीमार बाग लाया गया। पूरी जांच से पता चला कि उसको हेमोफैगोसाइटिक लिम्फोहिस्टोसाइटोसिस नाम की बीमारी है। यह आनुवांशिक रूप से होने वाली दुर्लभ ऑटो-इम्यून बिमारी है। इसमें नाशरा के बचने की केवल पांच प्रतिशत उम्मीद थी। उनके इलाज के लिए मल्टीडिसप्लनेरी एप्रोच अपनाई गई। डॉक्टर राहुल भार्गव (डायरेक्टर और हेड, बल्ड डिसॉर्डर, हेमाटोलॉजी आईमेडिकल ऑन्कोलॉजी, हेमेटोलॉजी और बीएमटी) और डॉक्टर अमृता चक्रबर्ती (एसोसिएट कंसल्टेंट, हेमाटोलॉजी एंड बोन मैरो ट्रांसप्लांट) के नेतृत्व में उसका इलाज किया गया।

 

 

 

फैमिलिया या आनुवांशिक एचएलएच बहुत दुर्भल बीमारी है जो जीन में आए दोषों के कारण आनुवांशिक रूप से परिवार में आगे बढ़ती है। इसके कारण इम्यून सिस्टम कोशिकाएं कही जाने वाली टी और एनके कोशिकाओं में ख़राबी आ जाती है, जिसके कारण उनकी अति सक्रियता से अत्यधिक सूजन आती है और ऊतक ख़त्म होने लगते हैं। इस ख़राबी के कारण शरीर का इम्यून सिस्टम मरीज़ के अपने अंगों और ऊतकों को नुकसान पहुंचाना शुरू कर देता है, जैसे कि लीवर, मस्तिष्क और बोन मैरो। बोन मैरो पर असर होने से ख़ून के बनने और ख़ून की दो या अधिक कोशिका अंशों में रुकावट आ सकती है।

 

जब मरीज अस्पताल पहुंची तो उसको बुखार, दस्त और पेट में सूजन की समस्या थी। मरीज़ की मेडिकल हिस्ट्री से पता चला कि उसके बड़े भाई-बहनों को भी यही समस्या हुई थी, जिसके बाद उनकी मृत्यु हो गई थी। तुरंत मरीज़ के ख़ून की जांच, स्कैन, और बोन मैरो टेस्ट किया गया और जांच से फैमिलिया एचएलएच होने की पुष्टि हुई। मरीज़ के जीन में एसटीएक्सबीपी2 (STXBP2) नाम का बहुत ही दुर्लभ म्यूटेशन हुआ था, जिससे फैमिलिया एचएलएच नाम की दुर्लभ आनुवांशिक बीमारी की पुष्टि करने में मदद मिली।

 

डॉ राहुल भार्गव (डायरेक्टर और हेड, ब्लड डिसॉर्डर, हेमाटोलॉजी आईमेडिकल ऑन्कोलॉजी, हेमेटोलॉजी और बीएमटी) ने कहा, “हमने कीमोथेरेपी के साथ इलाज की शुरुआत की – जिससे मरीज़ के अतिसक्रिय, असामान्य और ख़ुद को नुकसान पहुंचाने वाले इम्यून सिस्टम को नियंत्रित किया जा सके। हमने एचएलएच प्रोटोकॉल 94 को अपनाया और इलाज का शुरुआती दौर पूरा होने के बाद हमने हाफ-मैच्ड बोन मैरो ट्रांसप्लांट (जिसे हाप्लोआईडेंटिकल स्टेम सेल ट्रांसप्लांट भी कहा जाता है) किया। उनके पिता ने अपनी स्टेम कोशिकाएं दान दीं। टेरोसुल्फान, फ्लुडरबाइन और टीबीआई कंडीशनिंग के ज़रिए नशरा का इलाज करने के बाद स्टेम सैल ट्रांसप्लांट किया गया।”

 

 

डॉ अमृता चक्रबर्ती (एसोसिएट कंसल्टेंट, हेमाटोलॉजी एंड बोन मैरो ट्रांसप्लांट) ने कहा, “नशरा ट्रांसप्लांट के 3 महीने बाद तक गंभीर रूप से बीमार रही। उसके शरीर में कई समस्याएं पैदा हुई जैसे एक्यूट स्किन एंड गट ग्राफ्ट बनाम होस्ट डिजीज – ऐसी स्थिति जिसके कारण पूरी त्वचा, भोजन नली की परत, पेट और आंतों में भयानक छाले हो जाते हैं। उसे साइटोमेगालोवायरस का संक्रमण भी हुआ- एक वायरल संक्रमण जिसके कारण बोन मैरो सही तरह से काम नहीं करता और ख़ून का स्तर नीचे चला जाता है। साथ ही उसे पॉस्टिरीएर रिवर्सेबल एन्सेफैलोपैथी सिंड्रोम की परेशानी भी हुई, जिसके कारण उसे बार-बार दौरे पड़े।”

 

 


डॉ राहुल भार्गव ने कहा, “हमने बच्चे को बचाने के लिए हर संभव कोशिश की। स्टेरॉयड, इम्यूनोमॉड्यूलेटरी ड्रग्स, इम्युनोग्लोबुलिन, एंटीबायोटिक्स और बार-बार ब्लड ट्रांस्फ्यूशन के ज़रिए उसका इलाज किया गया। आखिरकार, उसकी स्थिति में धीरे-धीरे सुधार होने लगा और ब्ल़ड ट्रांस्फ्यूशन करने की ज़रूरत खत्म हो गई। उसका बोन मैरो ट्रांसप्लांट सफल रहा क्योंकि उसकी काइमेरिज्म रिपोर्ट से पता चला था कि उसका बोन मैरो अब दानदाता की तरह की 100% स्वस्थ कोशिकाओं का निर्माण कर रहा था। अब उसका बोन मैरो ट्रांसप्लांट हुए डेढ़ साल से ज़्यादा का समय हो गया है और मुझे यह कहते हुए खुशी हो रही है कि नाशरा पूरी तरह से ठीक हो गई है।”

 

 

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