गोवर्धन पूजा : पर्यावरण संरक्षण, समाजिक समरसता और दायित्व वोध का अद्भुत संदेश

रमेश शर्मा

भारतीय वाड्मय में प्रत्येक तीज त्यौहार और परंपरा निर्धारण प्राकृतिक, सामाजिक और मानवीय मनोवैज्ञान के अनुसंधान के बाद हुआ है। इन सबमें आदर्श समाज निर्माण का संदेश है। ऐसा संदेश जो संपूर्ण मानवता ही नहीं प्रकृति के साथ भी समन्वयक बनाता है। यही संदेश गोबर्धन पूजा का है। इस त्यौहार के आयोजन में सामाजिक समरसता, पर्यावरण संरक्षण एवं मानवीय दायित्व बोध का अद्भुत संदेश है।
दीपोत्सव की पाँच दिवसीय त्यौहार श्रृंखला में चौथे दिन गोवर्धन पूजन एवं अन्नकूट का आयोजन होता है। यद्यपि यह दीपावली पूजन के ठीक दूसरे दिन कार्तिक शुक्लपक्ष एकम् को होता है लेकिन इस वर्ष अमवस्या दो दिन रही। इसलिये एक दिन बढ़ गया और अब गोवर्धन पूजन एवं अन्नकूट आयोजन 22 अक्टूबर को होगा। दीपोत्सव भगवान श्रीराम के अयोध्या लौटने की स्मृति है तो गोबर्धन पूजा भगवान श्रीकृष्ण से संबंधित है। परंपरानुसार इस दिन घर की महिलाएँ प्रातःकाल उठकर स्नान आदि करके अपने आँगन के बीचोंबीच गाय के ताजा गोबर से पर्वत के आकार का एक छोटा प्रतीक बनाती हैं प्रतीक बनातीं हैं, उसे सजातीं हैं। फिर दिन में विभिन्न पकवान बनाकर इस पर्वत प्रतीक की पूजन करती हैं। जबकि परिवार के सभी पुरुष इसी दिन अपने घर में गाय सहित सभी पालतू पशुओं का श्रृंगार करते हैं। पशुओं के श्रृंगार केलिये उनके गले में घंटियों की माला तथा शरीर पर रंग बिरंगी आकृतियाँ भी बनाते हैं। सभी पालतू पशुओं के पूजन के साथ गाय की विशेष पूजन होती है और आरती भी उतारी जाती है। पालतू पशुओं को सम्मान देने का ऐसा उदाहरण संसार में कहीं नहीं मिलता।

गोवर्धन पूजन की पौराणिक कथा

गोबर्धन पूजा भगवान श्रीकृष्ण द्वारा गोबर्धन पर्वत उठाने से जुड़ी है। यह कथा लगभग सभी पुराणों में है। फिर भी ब्रह्मवैवर्त पुराण और श्रीमद्भागवत में यह कथा विस्तार से है। कथा के अनुसार समाज में पहले देवराज इन्द्र की पूजा होती थी देवराज इन्द्र को समस्त देवताओं का स्वामी और धरती पर बरसात करने का आदेश देने वाले देवता माने जाते हैं। बरसात का संबंध जीवन केलिये आवश्यक जल और फसल की उत्पादकता से जुड़ा होता है। इसलिये देवराज इन्द्र के पूजन की परंपरा थी। भगवान श्रीकृष्ण ने समाज से इन्द्रदेव से पहले पर्वत पूजन करने का आव्हान किया। उनका कहना था कि देवराज इन्द्र वर्षा तो करते हैं लेकिन बरसात का संतुलन तो पर्वत से होता है। यदि पर्वत बादलों के साथ समन्वय न बनायें तो बरसात में असंतुलन हो जायेगा। जिससे मनुष्य सहित सभी प्राणियों का जीवन संकट में पड़ जायेगा। इस प्रकार संपूर्ण प्रकृति और समस्त प्राणियों के जीवन रक्षक तो पर्वत हैं। अतएव पर्वत की पूजन पहले होनी चाहिए। पूजन केलिये प्रतीक के रूप में उन्होंने गोवर्धन पर्वत का चयन किया। उनके आव्हान पर समस्त ब्रजवासी गोवर्धन पर्वत की पूजन करने लगे। इससे इन्द्र देव कुपित हो गये। उनके आदेश पर वरुणदेव ने ब्रज में भारी वर्षा आरंभ कर दी। बाढ़ आ गई तब भगवान श्रीकृष्ण ने सभी ग्वाल बालों एवं समस्त नागरिकों के साथ मिलकर गोवर्धन पर्वत उठा लिया। गोवर्धन पर्वत ने एक प्रकार से छत्री जैसा काम किया और पूरा ब्रजमंडल बाढ़ से सुरक्षित हो गया। यह देखकर इन्द्रदेव को भी अपनी गल्ती का आभास हुआ। वे स्वयं आये और उन्होंने गोवर्धन पर्वत पूजन को मान्यता दी। इन्द्र देव से मान्यता मिलने के बाद समस्त ब्रज वासियों ने उत्सव मनाया। सभी अपने घर से अपनी सामर्थ्य के अनुसार भोजन बनाकर लाये। सभी के भोजन की वस्तुओं को मिलाया गया फिर सबने एक साथ बैठकर भोजन किया। तब से जन मानस में यह गोवर्धन पूजन के साथ अन्नकूट की परंपरा भी आरंभ हुई।

गोवर्धन पूजन से सामाजिक समरसता और पर्यावरण का संदेश

कहने और सुनने में गोबर्धन पर्वत पूजन भले सामान्य लगे लेकिन इसमें समाज जीवन की उन्नति केलिये गहरे संदेश छिपे हैं। गोवर्धन पर्वत पूजन में संकल्पशीलता, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक समरसता का अद्भुत संदेश है। इन्द्रदेव का कुपित होकर वर्षा करने से समस्त ब्रज मंडल में बाढ़ आ गई थी। अर्थात प्राणों का संकट उत्पन्न हो गया था। फिर भी ब्रजवासी भयभीत नहीं हुये। अपने संकल्प पर अडिग रहे। इससे तीन संदेश बहुत स्पष्ट हैं। सबसे पहला यही कि प्रत्येक नागरिक का दायित्व अपने जीवन संचालन केलिये उचित कर्म कर्त्तव्य करने के साथ प्रकृति के संरक्षण के लिये भी अपने दायित्व का बोध होना चाहिए। दूसरा यदि यथार्थ आधारित कोई संकल्प कर लिया है तो उसपर अडिग रहना चाहिए। किसी धमकी अथवा किसी भय से भयभीत होकर मार्ग नहीं बदलना चाहिए। तीसरा प्रकृति और पर्यावरण की रक्षा पूरी शक्ति से करना चाहिए। चौथा संदेश सामूहिक शक्ति के परिणाम का है। यदि पूरा समाज संगठित है, सब मिलकर काम करते हैं तो बड़े से बड़े संकट से निबटा जा सकता है, बड़ी से बड़ी समस्या का समाधान हो सकता है। पाँचवा संदेश सामाजिक समरसता का है। इन्द्रदेव से मान्यता मिलने के बाद समस्त ब्रजमंडल ने गोवर्धन पूजन के साथ उत्सव भी मनाया। हर घर से भोजन की सामग्री आयी। किसी एक पर कोई अतिरिक्त बोझ भी नहीं। हर घर से कुछ न कुछ भोजन सामग्री आई। इस सारी सामग्री को मिलाया गया। ताकि यह पता ही न चले कि किसके घर से क्या आया। किसके घर से पकवान आये अथवा किसके घर से केवल उबले हुये चने आये। फिर सबने मिलकर भोजन किया। इसमें न किसी जाति का भेद है न किसी वर्ग का, न गरीब का भेद है न अमीर का और न किसी जाति का। सबने एक साथ मिलकर भोजन किया। सामाजिक समरसता का ऐसा उदाहरण संसार में कहीं नहीं मिलता। भारतीय परंपरा की विशेषता है कि यहाँ न तो जन्म के आधार पर कोई भेद है न जाति के आधार पर कोई भेद है। अपने गुण और कर्म के आधार पर सब अपना अपना काम करते हैं और आने वाली समस्या का सब एकजुट होकर सामना करते हैं। गोवर्धन पर्वत पूजन से यह स्पष्ट संदेश है कि समस्त भारतीय जन एक हैं और समरस हैं। भगवान श्रीकृष्ण ने गोवर्धन पर्वत पूजन के माध्यम से भारत के प्रत्येक नागरिक को अपने दायित्व, पर्यावरण संरक्षण, सामाजिक समरसता और समूह शक्ति का महत्व समझाया। गोवर्धन पूजन में समाज को संकल्पशीलता का भी स्पष्ट संदेश है। संकट कितना भी गंभीर क्यों न हो। यदि धैर्य और संकल्प के साथ सामना किया जाय तो किसी संकट को टाला जा सकता है। ब्रज मंडल पर इन्द्रदेव का कोप साधारण नहीं था। भारी वर्षा और बाढ़ से संपूर्ण समाज जीवन अस्त व्यस्त हो गया था लेकिन भगवान श्रीकृष्ण के आव्हान पर समस्त ब्रज वासियों ने धैर्यपूर्वक सामना किया और सफलता मिली। गोवर्धन पूजन में नेतृत्वकर्ता की कुशलता का भी संदेश है। यदि नेतृत्व दूरदर्शी है, संकल्पशील है, कर्मठ है तो समाज सदैव सुरक्षित रहेगा।

भारतीय ज्ञान परंपरा की श्रेष्ठता का प्रमाण भी

गोवर्धन पूजन समाज जीवन में आदर्श स्वरूप के संदेश के साथ भारतीय ज्ञान परंपरा की श्रेष्ठता और वैज्ञानिकता का प्रमाण भी झलकता है। आधुनिक विज्ञान के अनुसंधान ने यह प्रमाणित कर दिया है कि वर्षा और बादलों का संतुलन पर्वतों से होता है। बादलों की गति और वर्षा दोनों में पर्वतों की भूमिका महत्वपूर्ण होती है। पर्वतों ऊगने वाली प्राकृतिक जड़ी बूटियाँ प्राणीमात्र को आरोग्य देती हैं। पालतू और वन्य प्राणियों का पर्वतों पर विचरण करने में ही आरोग्य का रहस्य है। ग्रामीण क्षेत्र में पशु पालकों द्वारा अपनी गाय आदि पालतू पशुओं को वन और पर्वत पर भेजने की परंपरा रही है। उनके आरोग्य और दीर्घायु होने का रहस्य यही है। द्वारिका और कुरुक्षेत्र के उत्खनन से भगवान श्रीकृष्ण का समय आज से लगभग पांच हजार वर्ष पुराना प्रमाणित हो गया है। इसका अर्थ हुआ कि आज से पांच साल पहले भी भारतीय पूर्वज आधुनिक विज्ञान के इस निष्कर्ष को जान गये थे कि पर्वतों की सुरक्षा से नदी तालाब तथा अन्य जल स्रोत सुरक्षित रहते हैं। पर्वतीय सुरक्षा ही वनों को सुरक्षा देती है। यदि पर्वत संरक्षित है, सुरक्षित है तो पर्यावरण सुरक्षित होगा, पर्यावरण सुरक्षित है तो समस्त प्राणी जगत के साथ मानवता भी सुरक्षित रहेगी। पर्वत पर पनपने वाली औषधीय वनस्पति मनुष्य को आरोग्य देती है।
भौतिक प्रगति की स्पर्धा में पर्वत और पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचाकर आधुनिक विज्ञान के शोधकर्ता अब पर्वतों की सुरक्षा का आव्हान कर रहे हैं। इसका ज्ञान भारतीय पूर्वजों को हजारों वर्ष पहले था और भगवान श्रीकृष्ण ने पर्वत सुरक्षा का अभियान पाँच हजार वर्ष पहले ही छेड़ दिया था।
गोवर्धन पूजन को गाय के गौबर से जोड़ा गया है। पर्वत का प्रतीक तो मिट्टी पर्वत का भी बन सकता था। लेकिन गाय के गौबर को चुना गया। इसमें गौ संरक्षण का संदेश है। आधुनिक विज्ञान के अनुसंधान का एक निष्कर्ष यह भी है कि गाय का दूध, गौ मूत्र गौबर आदि में भी औषधीय गुण होते हैं। इसके साथ गौबर का खाद भी कृषि केलिये अत्यंत उपयोगी माना गया है। इसीलिए पूरा संसार अब पशु पालन और जैविक खाद पर जोर दे रहा है। गौबर एवं अन्य अपविष्ट पदार्थ सोलर ऊर्जा आदि का संचालन विज्ञान अब जान पाया है। लेकिन गोवर्धन पूजन परंपरा यह प्रमाणित करती है कि भारतीय चिंतन में यह ज्ञान हजारों साल से हैं। इसीलिए भारत को विश्व गुरु होने का सम्मान मिला हुआ था। यदि भारत पुनः अपने अतीत के गौरव को प्राप्त करना चाहता है तो प्रत्येक भारतीय को अपने पूर्वजों की परंपरा और तीज त्यौहार के महत्व को समझना होगा। और इसी भाव से गोवर्धन पूजन करनी होगी।

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