नई दिल्ली। दिल्ली के कालकाजी जिले के अंतर्गत साकेत नगर स्थित लाडो सराय गांव एवं एक्सटेंशन क्षेत्र में आयोजित भव्य हिंदू सम्मेलन में हजारों लोगों की उत्साहपूर्ण भागीदारी देखने को मिली। पंचायत भवन स्थित शिव मंदिर परिसर में आयोजित इस ऐतिहासिक कार्यक्रम में करीब 2500 से अधिक श्रद्धालु, सामाजिक कार्यकर्ता, युवा, महिलाएं और बुजुर्ग शामिल हुए। सम्मेलन का उद्देश्य हिंदू समाज को संगठित करना, सांस्कृतिक चेतना जागृत करना और राष्ट्रहित के विषयों पर संवाद को आगे बढ़ाना था।
कार्यक्रम का शुभारंभ अयोध्या नरेश भगवान श्रीराम और भारत माता को पुष्पांजलि अर्पित कर किया गया। इसके उपरांत आर्य समाज के विद्वान आचार्यों द्वारा वैदिक विधि से हवन आयोजित किया गया, जिसमें लाडो सराय गांव एवं एक्सटेंशन के सभी परिवारों के सदस्यों ने आहुतियां अर्पित कर राष्ट्र की उन्नति, समाज की समृद्धि और विश्व कल्याण की कामना की। पूरा वातावरण वैदिक मंत्रोच्चार, शंखनाद और “जय श्रीराम” के उद्घोष से गुंजायमान हो उठा।
कार्यक्रम के मुख्य अतिथि विश्व हिंदू परिषद के राष्ट्रीय प्रवक्ता श्री विनोद बंसल ने अपने प्रेरणादायी संबोधन में कहा कि ऐसे सम्मेलनों से हिंदू समाज में एकता और संगठन की भावना को मजबूती मिलती है। उन्होंने कहा, “हिंदू समाज की सबसे बड़ी शक्ति उसकी एकता है। जब समाज संगठित होता है, तब वह न केवल अपनी संस्कृति की रक्षा करता है, बल्कि राष्ट्र निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।”
उन्होंने यह भी स्मरण कराया कि वर्ष 2005-2006 में गुरु गोलवलकर जी की 100वीं जयंती के अवसर पर भी इसी प्रकार के भव्य हिंदू सम्मेलन आयोजित किए गए थे, जिनसे समाज में एक नई चेतना का संचार हुआ था। उन्होंने जातिवाद को हिंदू समाज की एकता में सबसे बड़ी बाधा बताते हुए कहा कि हमें जाति, भाषा और क्षेत्र के भेदभाव से ऊपर उठकर एक राष्ट्र, एक समाज और एक संस्कृति के सूत्र में बंधना होगा।
श्री बंसल ने यह भी बताया कि दिल्ली में 5000 से अधिक स्थानों पर ऐसे सम्मेलन आयोजित किए जाएंगे, जिससे समाज के हर वर्ग तक संगठन, संस्कृति और राष्ट्रवाद का संदेश पहुंचेगा। उन्होंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की 100 वर्षों की यात्रा का उल्लेख करते हुए कहा कि संघ की स्थापना उस समय हुई थी जब भारत गुलामी की जंजीरों में जकड़ा हुआ था और मात्र दो लाख अंग्रेज करोड़ों भारतीयों पर शासन कर रहे थे। इसके बावजूद संघ ने राष्ट्र जागरण का बीड़ा उठाया और आज वह समाज सेवा, राष्ट्र निर्माण और सांस्कृतिक संरक्षण के क्षेत्र में एक मजबूत स्तंभ के रूप में खड़ा है।
उन्होंने यह भी स्मरण कराया कि वर्ष 1963 में गणतंत्र दिवस की परेड में संघ के स्वयंसेवकों ने पहली बार भाग लेकर राष्ट्रभक्ति और अनुशासन का उदाहरण प्रस्तुत किया था। यह भारतीय समाज के लिए गौरव का क्षण था, जिसने विश्व को यह संदेश दिया कि भारत की आत्मा उसकी संस्कृति, अनुशासन और सेवा भावना में निहित है।
महा मंडलेश्वर पूज्य साध्वी विभानंदगिरी जी ने अपने संबोधन में कहा कि हिंदू संस्कृति केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की एक पूर्ण पद्धति है, जो सत्य, अहिंसा, करुणा और सेवा जैसे मूल्यों पर आधारित है। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे अपनी संस्कृति पर गर्व करें और आधुनिक जीवन में भी भारतीय मूल्यों को आत्मसात करें।
सम्मेलन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी अजय जी उपाध्याय, आरडब्ल्यूए अध्यक्ष देवेंद्र सेजवाल, साध्वी विभानंदगिरी जी, आयोजन समिति के अध्यक्ष अशोक जी गौड़, सचिव बीबी मिश्रा जी, कोषाध्यक्ष दयाशंकर जी शरण, सुमेर सेजवाल, राज पहलवान जी, अवधेश झा जी, वरिष्ठ अधिवक्ता जगदीश प्रसाद शर्मा तथा इस्कॉन मंदिर के प्रभुजी ने भी अपने प्रेरक विचार साझा किए।
आरडब्ल्यूए अध्यक्ष देवेंद्र सेजवाल ने आयोजन की सफलता का श्रेय स्थानीय नागरिकों, सामाजिक संगठनों और स्वयंसेवकों को देते हुए कहा कि यह सम्मेलन समाज की सामूहिक चेतना का प्रतीक है। उन्होंने बताया कि कार्यक्रम के माध्यम से समाज में भाईचारे, सहयोग और समर्पण की भावना को सुदृढ़ करने का प्रयास किया गया है।
कार्यक्रम के दौरान हिंदू सम्मेलन आयोजन समिति की ओर से वरिष्ठ नागरिकों को भगवान श्रीराम की तस्वीर भेंट कर सम्मानित किया गया। यह पहल बुजुर्गों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का एक सुंदर उदाहरण रही।
इस अवसर पर हरे कृष्णा सेंटर, एकता नई पहचान फाउंडेशन ट्रस्ट, साईं जन विकास फाउंडेशन, छठ पूजा समिति, जेकेबीएम फाउंडेशन, सरस्वती पूजा समिति, शिव मंदिर समिति, काली मंदिर समिति, हनुमान मंदिर समिति, प्राचीन पीपल शिव मंदिर समिति तथा साईं मंदिर समिति सहित अनेक सामाजिक और धार्मिक संगठनों ने सक्रिय भागीदारी निभाई। इन सभी संगठनों ने सम्मेलन को सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
पूरे आयोजन का मंच संचालन देवेंद्र सेजवाल द्वारा कुशलतापूर्वक किया गया। कार्यक्रम की व्यवस्थाएं अनुशासन, समर्पण और सेवा भावना का उत्कृष्ट उदाहरण रहीं। स्वयंसेवकों ने पूरे दिन सेवा भाव से श्रद्धालुओं की सहायता की, जिससे कार्यक्रम सुव्यवस्थित और सफल रहा।
सम्मेलन के अंत में उपस्थित जनसमूह को सामूहिक भोजन प्रसाद वितरित किया गया, जिसमें हजारों लोगों ने पंक्तिबद्ध होकर प्रेम, समानता और सेवा की भावना के साथ प्रसाद ग्रहण किया। यह दृश्य भारतीय संस्कृति की उस परंपरा को जीवंत करता दिखा, जिसमें सभी लोग बिना किसी भेदभाव के एक साथ बैठकर भोजन करते हैं।
यह भव्य हिंदू सम्मेलन न केवल एक धार्मिक आयोजन था, बल्कि यह सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और राष्ट्रप्रेम का एक सशक्त मंच भी सिद्ध हुआ। लाडो सराय क्षेत्र के नागरिकों ने जिस उत्साह, श्रद्धा और एकता के साथ इस सम्मेलन को सफल बनाया, वह समाज के लिए प्रेरणास्रोत है।
इस आयोजन ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि जब समाज संगठित होता है, अपनी संस्कृति पर गर्व करता है और राष्ट्रहित को सर्वोपरि मानता है, तब कोई भी चुनौती उसे कमजोर नहीं कर सकती। हिंदू सम्मेलन ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया कि “एक भारत, श्रेष्ठ भारत” की संकल्पना तभी साकार हो सकती है, जब हम सभी मिलकर सांस्कृतिक मूल्यों, सामाजिक समरसता और राष्ट्रभक्ति के मार्ग पर अग्रसर हों।
लाडो सराय में आयोजित यह सम्मेलन आने वाले समय में समाज को नई दिशा, नई ऊर्जा और नई प्रेरणा प्रदान करेगा। यह आयोजन केवल एक दिन का कार्यक्रम नहीं, बल्कि समाज में स्थायी चेतना और सकारात्मक परिवर्तन की शुरुआत है।

