पटना। बिहार की राजनीति एक बार फिर निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। मुख्यमंत्री Nitish Kumar का राज्यसभा की ओर रुख करना केवल एक संसदीय औपचारिकता नहीं, बल्कि सत्ता के समीकरणों में बड़े बदलाव का संकेत माना जा रहा है। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि वे दिल्ली जा रहे हैं, बल्कि यह है कि क्या यह उनका निजी निर्णय था या किसी पूर्व नियोजित राजनीतिक पटकथा का हिस्सा?
राजनीति में संयोग कम और संकेत अधिक होते हैं। जिस तरह पूर्व उपराष्ट्रपति Jagdeep Dhankhar की ‘अचानक अस्वस्थता’ को लेकर उठे सवाल पूरी तरह शांत नहीं हो पाए, उसी तरह नीतीश कुमार को राज्यसभा भेजे जाने के तर्क भी कई लोगों को सहज नहीं लग रहे। भाजपा के नेता यह कह रहे हैं कि उनकी राज्यसभा जाने की इच्छा थी, लेकिन मुख्यमंत्री की कुर्सी छोड़कर संसद के उच्च सदन में जाना स्वाभाविक रूप से चर्चा का विषय बनेगा। आखिर मुख्यमंत्री का पद किसी भी सांसद या यहां तक कि केंद्रीय मंत्री से भी अधिक प्रभावशाली माना जाता है।
‘सुशासन बाबू’ के नाम से प्रसिद्ध नीतीश कुमार ने बिहार की राजनीति में दो दशक से अधिक समय तक निर्णायक भूमिका निभाई। कई बार सत्ता परिवर्तन, गठबंधन बदलाव और राजनीतिक उठापटक के बावजूद वे केंद्र में बने रहे। ऐसे में उनका यह निर्णय उनके समर्थकों के लिए भावनात्मक भी है और राजनीतिक रूप से उलझन भरा भी। उनके कट्टर समर्थक इसे सहज स्वीकार नहीं कर पा रहे।
अब बड़ा प्रश्न यह है कि आगे क्या? भाजपा और एनडीए नेतृत्व किसे नया मुख्यमंत्री बनाता है, इस पर बिहार की आगामी दिशा निर्भर करेगी। नाम कई चल रहे हैं—उपमुख्यमंत्री से लेकर केंद्रीय नेताओं तक—लेकिन नीतीश कुमार जैसा अनुभव और संतुलन फिलहाल एनडीए खेमे में कम ही दिखाई देता है।
75 वर्ष की आयु पार कर चुके नीतीश कुमार के बाद उनकी पार्टी Janata Dal United का भविष्य भी चर्चा का विषय है। क्या नेतृत्व की नई पीढ़ी तैयार है? क्या संगठन वैसी ही पकड़ बनाए रख पाएगा? या फिर यह परिवर्तन किसी बड़े राजनीतिक पुनर्संरचना की भूमिका है?
राजनीति में अक्सर कहा जाता है—“होइहें वही जो शाह रचि राखा।” केंद्रीय नेतृत्व, विशेषकर Amit Shah की रणनीतिक शैली को देखते हुए यह पंक्ति सियासी गलियारों में बार-बार दोहराई जा रही है। अंतिम निर्णय चाहे जो हो, यह तय है कि बिहार की राजनीति अब नए अध्याय की ओर बढ़ रही है।
फिलहाल इतना जरूर कहा जा सकता है कि मुख्यमंत्री के रूप में नीतीश कुमार का लंबा और प्रभावशाली कार्यकाल बिहार की राजनीतिक स्मृति में दर्ज रहेगा। आने वाले दिन तय करेंगे कि यह विदाई एक युग का अंत है या किसी नई भूमिका की प्रस्तावना।

