वैश्विक राजनीति के नए दौर में कुछ रिश्ते समय के साथ केवल औपचारिक नहीं रहते, बल्कि रणनीतिक भरोसे में बदल जाते हैं। भारत और इजराइल के संबंध इसी परिवर्तन की कहानी कहते हैं। भारत ने वर्ष 1950 में इजराइल को मान्यता दी, पर 29 जनवरी 1992 को स्थापित हुए औपचारिक राजनयिक संबंधों ने इस रिश्ते को वास्तविक गति दी। बीते दशक में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में यह संबंध रक्षा, प्रौद्योगिकी, कृषि और नवाचार तक फैल चुका है और प्रस्तावित “स्पेशल स्ट्रेटेजिक पार्टनरशिप” इसकी स्वाभाविक अगली कड़ी है। पहले वर्ष 2017 में और अब उनकी यात्रा से संबंधों को नया आयाम मिल रहा है।
इजरायल की पार्लियामेंट, नेसेट को भी भारतीय झंडे के रंगों में रोशन किया गया, जो एक ऐसी पार्टनरशिप को एक सिंबॉलिक ट्रिब्यूट है जो लगातार मजबूत और गहरी होती जा रही है। इजरायल के पूर्व प्रधानमंत्री और विपक्ष के नेता यायर लैपिड ने सोशल मीडिया पर हिंदी में एक पोस्ट में लिखा, “पूरा इजराइल कल प्रधानमंत्री मोदी का स्वागत करने के लिए उत्साहित है। वह इजराइल के सच्चे दोस्त हैं। इज़राइल और भारत के बीच रिश्ता सिर्फ़ स्ट्रेटेजिक नहीं है, बल्कि देशों के बीच गहरी दोस्ती का बंधन है।”
भारत और इजरायल के संबंध पिछले दशक में तेजी से विकसित हुए हैं। वर्ष 2017 में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की ऐतिहासिक यात्रा के दौरान इन्हें रणनीतिक साझेदारी का दर्जा मिला था और अब प्रस्तावित उन्नयन इस रिश्ते को और उन्नत स्तर पर ले जाएगा। खास बात यह है कि दोनों देशों के संबंध औपचारिकता से अधिक भरोसे पर आधारित रहे हैं—चाहे रक्षा तकनीक हो, कृषि नवाचार या आतंकवाद-रोधी सहयोग, दोनों ने कठिन समय में एक-दूसरे का साथ दिया है। इस यात्रा का प्रमुख उद्देश्य रक्षा और व्यापार सहयोग को सुदृढ़ करना है। नई साझेदारी के तहत उन्नत रक्षा प्रणालियों का संयुक्त विकास संभव होगा और आपसी सुरक्षा सहयोग अधिक संस्थागत रूप ले सकेगा। इससे भारत की आत्मनिर्भर रक्षा नीति को भी बल मिलेगा और इजरायल को एक विशाल, विश्वसनीय तकनीकी भागीदार प्राप्त होगा।
प्रधानमंत्री का स्वागत इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू द्वारा किया जाना और उसके बाद नेताओं की आमने-सामने वार्ता इस यात्रा की गंभीरता को दर्शाता है। इसके अतिरिक्त नेसेट में संबोधन, भारतीय समुदाय से संवाद और तकनीकी प्रदर्शनी में भागीदारी इस बात का संकेत है कि यह दौरा केवल कूटनीतिक बातचीत तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि जनता-से-जनता और नवाचार-आधारित संबंधों को भी नई ऊर्जा देगा।
प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की यात्रा को लेकर पूरे इजरायल में दिखाई दे रहा उत्साह केवल एक कूटनीतिक औपचारिकता नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक राजनीति में उभरती साझेदारियों का संकेत है। स्वागत में बिछाया गया ‘रेड कार्पेट’ इस बात का प्रतीक है कि दोनों देशों के रिश्ते अब पारंपरिक मित्रता से आगे बढ़कर एक विशेष रणनीतिक साझेदारी का रूप ले चुके हैं। यह संबंध रक्षा, कृषि, प्रौद्योगिकी, जल प्रबंधन और नवाचार जैसे अनेक क्षेत्रों में गहराता हुआ दिखाई देता है।
इस प्रतीकात्मकता का सबसे प्रभावशाली दृश्य तब सामने आया जब नेसेट को भारतीय तिरंगे के रंगों से रोशन किया गया। यह केवल एक प्रकाश सज्जा नहीं थी, बल्कि दो लोकतांत्रिक राष्ट्रों के साझा मूल्यों—लोकतंत्र, नवाचार और सुरक्षा सहयोग—की अभिव्यक्ति थी। दरअसल, आज वैश्विक परिदृश्य में भू-राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। ऐसे समय में भारत और इजरायल का सहयोग केवल द्विपक्षीय लाभ तक सीमित नहीं है; यह तकनीकी आत्मनिर्भरता, खाद्य और जल सुरक्षा तथा आतंकवाद-रोधी सहयोग जैसे क्षेत्रों में स्थिरता का आधार बन सकता है। दोनों देश आतंकवाद और सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर चुके हैं, इसलिए उनके अनुभव और तकनीकी साझेदारी वैश्विक शांति में भी योगदान दे सकती है।
द्विपक्षीय व्यापार अब लगभग 4 अरब डॉलर के आसपास पहुँच चुका है। भारत के लिए रत्न-आभूषण, इंजीनियरिंग और इलेक्ट्रॉनिक्स प्रमुख निर्यात क्षेत्र हैं, जबकि इज़राइल से विद्युत मशीनरी, उर्वरक और रक्षा उपकरण आयात किए जाते हैं। 2025 में हस्ताक्षरित Bilateral Investment Treaty और 2026 में शुरू हुई मुक्त व्यापार समझौता वार्ता दर्शाती है कि संबंध केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं, बल्कि आर्थिक साझेदारी की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
रूस के बाद इज़राइल भारत के प्रमुख रक्षा आपूर्तिकर्ताओं में गिना जाता है। मिसाइल रक्षा प्रणाली, निगरानी तकनीक और साइबर सुरक्षा सहयोग ने इस संबंध को विशेष महत्व दिया है। लगभग 10 अरब डॉलर तक के संभावित रक्षा सौदे—जिनमें उन्नत एयर डिफेंस और लेज़र आधारित सिस्टम शामिल हैं—भविष्य की सैन्य रणनीति का संकेत देते हैं। भारतीय वायु सेना के लिए मिड-एयर रिफ्यूलिंग विमानों की प्रस्तावित परियोजना, जिसमें हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड की भागीदारी होगी, रक्षा आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
लगभग 85,000 भारतीय मूल के यहूदी इज़राइल में रहते हैं, जो दोनों देशों को सांस्कृतिक रूप से जोड़ते हैं। हर वर्ष हजारों भारतीय पर्यटक वहां जाते हैं और सैकड़ों छात्र उच्च शिक्षा प्राप्त करते हैं। यही सामाजिक संपर्क राजनीतिक और रणनीतिक साझेदारी को स्थायित्व देता है। स्पष्ट है कि यह यात्रा औपचारिक कूटनीति से आगे बढ़कर विश्वास, सम्मान और साझा भविष्य की आकांक्षा का संदेश देती है। नेसेट पर तिरंगे की रोशनी दरअसल उस नई विश्व व्यवस्था की झलक है, जिसमें मूल्य आधारित साझेदारियाँ केवल समझौतों से नहीं, बल्कि भावनात्मक और रणनीतिक विश्वास से आगे बढ़ती हैं। यह विश्वास आने वाले वर्षों में भारत-इजरायल संबंधों को और अधिक ऊंचाई प्रदान करेगा।
भारत की विशेषता यह रही है कि उसने पश्चिम एशिया में संतुलित विदेश नीति अपनाई—इज़राइल के साथ घनिष्ठ सहयोग रखते हुए ईरान और अरब देशों से भी संबंध बनाए रखे। यही संतुलन भारत को भरोसेमंद वैश्विक साझेदार बनाता है। 2023 के एक सर्वे में लगभग 71% इज़राइलियों की भारत के प्रति सकारात्मक राय इसी विश्वास की पुष्टि करती है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की यात्रा इस रिश्ते को तकनीक, रक्षा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता सहयोग के नए स्तर तक ले जाने का प्रयास है—जिसकी शुरुआत 2017 की ऐतिहासिक यात्रा से हुई थी।


