भारत-इज़रायल संबंधों को नई ऊंचाई: प्रधानमंत्री मोदी की यात्रा ने खोले सहयोग के नए आयाम

डॉ धनंजय गिरि

भारत की विदेश नीति पिछले एक दशक में बहुआयामी और संतुलित कूटनीति का उदाहरण बनकर उभरी है। इसी क्रम में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की हालिया इज़रायल यात्रा को भारत-इज़रायल संबंधों में एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है। विदेश सचिव विक्रम मिसरी ने इस यात्रा को दोनों देशों के संबंधों के लिए “मील का पत्थर” बताया है।

करीब नौ वर्षों के अंतराल के बाद किसी भारतीय प्रधानमंत्री की यह दूसरी इज़रायल यात्रा थी, जिसने पिछले दशक में विकसित हुई रणनीतिक साझेदारी को और अधिक व्यापक और गहराई प्रदान की है।हालांकि यह यात्रा लगभग 24 घंटे से कुछ अधिक समय की रही, लेकिन इसके परिणाम अत्यंत महत्वपूर्ण रहे। यह दौरा केवल द्विपक्षीय संबंधों को सुदृढ़ करने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि पश्चिम एशिया में भारत की बढ़ती कूटनीतिक सक्रियता को भी दर्शाता है।

पिछले एक वर्ष में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने क्षेत्र के कई देशों का दौरा कर भारत की रणनीतिक उपस्थिति को मजबूत किया है। इस क्रम में पश्चिम एशिया भारत की ऊर्जा सुरक्षा, व्यापार, तकनीकी सहयोग और सामरिक हितों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र बनकर उभरा है। इस यात्रा का सबसे उल्लेखनीय क्षण तब आया जब प्रधानमंत्री मोदी ने इज़रायल की संसद नेसेट को संबोधित किया। इस अवसर पर उन्हें भारत-इज़रायल संबंधों को मजबूत करने में विशेष योगदान के लिए “नेसेट मेडल” से सम्मानित किया गया। यह सम्मान प्राप्त करने वाले वे विश्व के पहले नेता बने हैं। यह केवल व्यक्तिगत सम्मान नहीं, बल्कि भारत और इज़रायल के बीच गहरे होते विश्वास और सहयोग का प्रतीक भी है।

प्रधानमंत्री मोदी और इज़रायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के बीच हुई वार्ता में भविष्य की चुनौतियों और अवसरों को ध्यान में रखते हुए द्विपक्षीय संबंधों को “शांति, नवाचार और समृद्धि के लिए विशेष रणनीतिक साझेदारी” के स्तर तक ले जाने का निर्णय लिया गया। दोनों देशों के बीच कुल 16 समझौतों पर हस्ताक्षर हुए, जिनमें प्रमुख क्षेत्र शामिल हैं:आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और साइबर सुरक्षा, विज्ञान, प्रौद्योगिकी और अंतरिक्ष अनुसंधान, कृषि और जल प्रबंधन, रक्षा सहयोग, व्यापार और निवेश। इसके अतिरिक्त विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में संयुक्त आयोग को अब मंत्रिस्तरीय स्तर तक उन्नत करने का निर्णय भी लिया गया है, जिससे अनुसंधान और तकनीकी सहयोग को नई गति मिलेगी।

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने यरुशलम स्थित विश्व प्रसिद्ध होलोकॉस्ट स्मारक याद वाशेम जाकर द्वितीय विश्व युद्ध के पीड़ितों को श्रद्धांजलि अर्पित की। यह यात्रा मानव इतिहास की त्रासदी को याद रखने और शांति के प्रति वैश्विक प्रतिबद्धता को दर्शाने का महत्वपूर्ण प्रतीक मानी जाती है। इस दौरान उन्होंने इज़रायल के राष्ट्रपति आइजैक हर्जोग से भी मुलाकात की और पर्यावरण संरक्षण के संदेश के रूप में “एक पेड़ मां के नाम” पहल के अंतर्गत एक ओक का पौधा लगाया।

प्रधानमंत्री ने अपने दौरे के दौरान इज़रायल में रहने वाले भारतीय मूल के यहूदी समुदाय, इंडोलॉजिस्ट विद्वानों और सांस्कृतिक जगत की हस्तियों से भी मुलाकात की। लोकप्रिय इज़रायली टीवी श्रृंखला Fauda के कलाकारों के साथ उनकी बातचीत भी चर्चा का विषय रही। यह पहल दर्शाती है कि भारत-इज़रायल संबंध केवल रणनीतिक या आर्थिक सहयोग तक सीमित नहीं हैं, बल्कि सांस्कृतिक और सामाजिक स्तर पर भी मजबूत हो रहे हैं।

सबसे प्रभावशाली दृश्य तब सामने आया जब नेसेट को भारतीय तिरंगे के रंगों से रोशन किया गया। यह केवल एक प्रकाश सज्जा नहीं थी, बल्कि दो लोकतांत्रिक राष्ट्रों के साझा मूल्यों—लोकतंत्र, नवाचार और सुरक्षा सहयोग—की अभिव्यक्ति थी। दरअसल, आज वैश्विक परिदृश्य में भू-राजनीतिक समीकरण तेजी से बदल रहे हैं। ऐसे समय में भारत और इजरायल का सहयोग केवल द्विपक्षीय लाभ तक सीमित नहीं है; यह तकनीकी आत्मनिर्भरता, खाद्य और जल सुरक्षा तथा आतंकवाद-रोधी सहयोग जैसे क्षेत्रों में स्थिरता का आधार बन सकता है। दोनों देश आतंकवाद और सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर चुके हैं, इसलिए उनके अनुभव और तकनीकी साझेदारी वैश्विक शांति में भी योगदान दे सकती है।

द्विपक्षीय व्यापार अब लगभग 4 अरब डॉलर के आसपास पहुँच चुका है। भारत के लिए रत्न-आभूषण, इंजीनियरिंग और इलेक्ट्रॉनिक्स प्रमुख निर्यात क्षेत्र हैं, जबकि इज़राइल से विद्युत मशीनरी, उर्वरक और रक्षा उपकरण आयात किए जाते हैं। 2025 में हस्ताक्षरित Bilateral Investment Treaty और 2026 में शुरू हुई मुक्त व्यापार समझौता वार्ता दर्शाती है कि संबंध केवल सुरक्षा तक सीमित नहीं, बल्कि आर्थिक साझेदारी की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

रूस के बाद इज़राइल भारत के प्रमुख रक्षा आपूर्तिकर्ताओं में गिना जाता है। मिसाइल रक्षा प्रणाली, निगरानी तकनीक और साइबर सुरक्षा सहयोग ने इस संबंध को विशेष महत्व दिया है। लगभग 10 अरब डॉलर तक के संभावित रक्षा सौदे—जिनमें उन्नत एयर डिफेंस और लेज़र आधारित सिस्टम शामिल हैं—भविष्य की सैन्य रणनीति का संकेत देते हैं। भारतीय वायु सेना के लिए मिड-एयर रिफ्यूलिंग विमानों की प्रस्तावित परियोजना, जिसमें हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड की भागीदारी होगी, रक्षा आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

लगभग 85,000 भारतीय मूल के यहूदी इज़राइल में रहते हैं, जो दोनों देशों को सांस्कृतिक रूप से जोड़ते हैं। हर वर्ष हजारों भारतीय पर्यटक वहां जाते हैं और सैकड़ों छात्र उच्च शिक्षा प्राप्त करते हैं। यही सामाजिक संपर्क राजनीतिक और रणनीतिक साझेदारी को स्थायित्व देता है। स्पष्ट है कि यह यात्रा औपचारिक कूटनीति से आगे बढ़कर विश्वास, सम्मान और साझा भविष्य की आकांक्षा का संदेश देती है। नेसेट पर तिरंगे की रोशनी दरअसल उस नई विश्व व्यवस्था की झलक है, जिसमें मूल्य आधारित साझेदारियाँ केवल समझौतों से नहीं, बल्कि भावनात्मक और रणनीतिक विश्वास से आगे बढ़ती हैं। यह विश्वास आने वाले वर्षों में भारत-इजरायल संबंधों को और अधिक ऊंचाई प्रदान करेगा।

भारत की विशेषता यह रही है कि उसने पश्चिम एशिया में संतुलित विदेश नीति अपनाई—इज़राइल के साथ घनिष्ठ सहयोग रखते हुए ईरान और अरब देशों से भी संबंध बनाए रखे। यही संतुलन भारत को भरोसेमंद वैश्विक साझेदार बनाता है। 2023 के एक सर्वे में लगभग 71% इज़राइलियों की भारत के प्रति सकारात्मक राय इसी विश्वास की पुष्टि करती है। प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की यात्रा इस रिश्ते को तकनीक, रक्षा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता सहयोग के नए स्तर तक ले जाने का प्रयास है—जिसकी शुरुआत 2017 की ऐतिहासिक यात्रा से हुई थी।

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी की यह यात्रा भारत-इज़रायल संबंधों के विकास की नई दिशा को दर्शाती है। तकनीकी सहयोग, रक्षा साझेदारी, कृषि नवाचार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान जैसे क्षेत्रों में बढ़ती साझेदारी यह संकेत देती है कि आने वाले वर्षों में दोनों देश वैश्विक चुनौतियों का सामना करने में एक-दूसरे के महत्वपूर्ण सहयोगी बन सकते हैं। यह यात्रा इस बात का भी प्रमाण है कि भारत की विदेश नीति अब केवल क्षेत्रीय सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि वैश्विक स्तर पर रणनीतिक साझेदारियों के माध्यम से नए अवसरों की तलाश कर रही है।

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक व संघ से जुड़े हैं।)

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