कुमकुम झा
हर वर्ष 8 मार्च को दुनिया भर में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस मनाया जाता है। यह दिन केवल एक औपचारिक उत्सव नहीं, बल्कि महिलाओं के अधिकार, सम्मान, सुरक्षा और समान अवसरों के लिए समाज को जागरूक करने का एक महत्वपूर्ण अवसर है। महानगरों और बड़े शहरों में इस दिन सेमिनार, कार्यशाला ,सांस्कृतिक कार्यक्रम और सामाजिक अभियानों की भरमार रहती है लेकिन जब हम ग्रामीण भारत—विशेषकर उत्तर बिहार के सुदूर गाँवों—की ओर नज़र डालते हैं, तो तस्वीर कुछ और ही दिखाई देती है।इन दिनों गाँव में रहने के दौरान हमने जो अनुभव किया, वह चिंताजनक भी था और विचारणीय भी। जिन ग्रामीण महिलाओं से बातचीत हुई, उनमें से अधिकांश को “अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस” का नाम तक ज्ञात नहीं था। इसके उद्देश्य और महत्व की जानकारी तो बहुत दूर की बात है ,यह स्थिति केवल एक गाँव की नहीं, बल्कि ग्रामीण समाज की व्यापक वास्तविकता को उजागर करती है।
जागरूकता का अभाव—एक गंभीर प्रश्न
बिहार हाल के वर्षों में महिलाओं की सुरक्षा से जुड़ी कई घटनाओं के कारण राष्ट्रीय चर्चा में रहा है। छात्रावासों से जुड़े विवाद हों या समाज में घटित अन्य घटनाएँ—इन सबने महिलाओं की सुरक्षा और सम्मान को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े किए हैं, ऐसी परिस्थितियों में यह अपेक्षा की जाती है कि समाज, प्रशासन और शैक्षणिक संस्थान मिलकर महिलाओं के अधिकारों और सुरक्षा के प्रति व्यापक जागरूकता कैसे लाया जाय इस पर विमर्श करें ,परंतु वास्तविकता यह है कि ग्रामीण क्षेत्रों में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस जैसे अवसर लगभग अनदेखे रह जाते हैं। न पंचायत स्तर पर कोई विशेष पहल दिखाई देती है, न स्कूलों और कॉलेजों में कोई उल्लेखनीय गतिविधि। प्रशासनिक तंत्र भी अधिकांशतः मौन दिखाई देता है।
ग्रामीण बिहार की महिलाएँ समाज और परिवार की रीढ़ हैं वैसे हर क्षेत्र और हर समाज की वो रीढ होती हैं ,वे खेतों में काम करती हैं, घर संभालती हैं, बच्चों की परवरिश करती हैं और परिवार की आर्थिक गतिविधियों में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।इसके बावजूद उन्हें आज भी अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है—
• शिक्षा के सीमित अवसर
• स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी
• सामाजिक रूढ़ियाँ और परंपरागत बंधन
• आर्थिक निर्भरता
• सुरक्षा और न्याय तक पहुँच में कठिनाई
ऐसी स्थिति में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस केवल एक प्रतीकात्मक दिवस नहीं, बल्कि एक ऐसा अवसर बन सकता है जब समाज अपनी सोच और व्यवस्था की समीक्षा करे।जागरूकता से ही बदलाव होगा यदि इस दिवस को गंभीरता से लिया जाए, तो यह ग्रामीण समाज में सकारात्मक परिवर्तन का माध्यम बन सकता है।पंचायत स्तर पर बैठकों का आयोजन, स्कूलों और कॉलेजों में चर्चा, स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से महिलाओं को उनके अधिकारों की जानकारी, और प्रशासन द्वारा सुरक्षा संबंधी कानूनों के प्रति जागरूकता—ये सभी छोटे-छोटे कदम बड़े सामाजिक परिवर्तन की शुरुआत कर सकते हैं।
महिलाओं की शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा केवल महिलाओं का मुद्दा नहीं है; यह पूरे समाज के विकास का प्रश्न है। जिस समाज में महिलाएँ सुरक्षित, शिक्षित और आत्मनिर्भर होंगी, वही समाज वास्तव में प्रगति कर सकेगा।ग्रामीण भारत में अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस का वास्तविक महत्व तभी सिद्ध होगा, जब यह केवल शहरों की औपचारिकता न रहकर गाँवों के जीवन से भी जुड़े।यह आवश्यक है कि प्रशासन, शैक्षणिक संस्थान, सामाजिक संगठन और स्वयं समाज मिलकर इस दिन को जागरूकता, संवाद और परिवर्तन का माध्यम बनाएं।क्योंकि अंततः यह एक सरल लेकिन गहरी सच्चाई है महिला सशक्त होगी, तभी समाज सशक्त होगा।”
(लेखिका शिक्षिका और साहित्यकार हैं।)


