नई दिल्ली। उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ का अचानक इस्तीफा देश की राजनीति में हलचल मचाने वाला घटनाक्रम बन गया है। संसद के मानसून सत्र के पहले दिन उन्होंने राज्यसभा के सभापति के रूप में पूरी तरह सक्रिय रहते हुए कार्यवाही चलाई, बैठकों को स्थगित किया और शाम होते-होते राष्ट्रपति से मिलकर इस्तीफा सौंप दिया। उन्होंने खुद ही एक्स (पूर्व ट्विटर) पर पोस्ट कर इसकी जानकारी दी।
इस अप्रत्याशित घटनाक्रम ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं — क्या इस्तीफे का कारण वास्तव में स्वास्थ्य है, या फिर यह किसी गंभीर राजनीतिक मतभेद का संकेत है?
सरकार की चुप्पी और विपक्ष की हमदर्दी
धनखड़ का इस्तीफा ऐसे समय पर आया जब मानसून सत्र की शुरुआत ही हुई थी। अगर स्वास्थ्य कारण प्रमुख थे तो वे सत्र शुरू होने से पहले ही पद छोड़ सकते थे। इसके उलट उन्होंने कार्यवाही का संचालन किया, जो उनकी सक्रियता का संकेत देता है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रतिक्रिया भी बेहद संक्षिप्त रही। उन्होंने बस “उत्तम स्वास्थ्य” की कामना की, लेकिन आमतौर पर ऐसी परिस्थितियों में की जाने वाली सेवा की सराहना नहीं की। इससे यह संकेत मिला कि धनखड़ और सरकार के बीच संबंधों में खटास आ चुकी थी।
क्या इस्तीफा सरकार की नाराज़गी का परिणाम?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस्तीफा स्वैच्छिक नहीं बल्कि राजनीतिक दबाव में दिया गया है। जिस तरह से इस्तीफा राष्ट्रपति को सौंपने के बाद तुरंत उसे सार्वजनिक किया गया, उससे यह स्पष्ट संकेत मिला कि धनखड़ सरकार से असंतुष्ट थे और अपनी नाराजगी का संकेत देना चाहते थे।
विवादों से जुड़े उपराष्ट्रपति
धनखड़ का कार्यकाल शुरू से ही विवादों से घिरा रहा। चाहे सुप्रीम कोर्ट को लेकर दिए गए बयान हों या राज्यसभा में सरकार के असहज मुद्दों पर टिप्पणी, उन्होंने अपनी आउटस्पोकन शैली से सत्ता पक्ष को कई बार चौंकाया।
उन्होंने कृषि मंत्री पर सदन में तीखी टिप्पणी की थी और हाल ही में न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के खिलाफ विपक्ष के महाभियोग प्रस्ताव को स्वीकार कर सत्ता पक्ष को नाराज़ कर दिया था। इसके अलावा जस्टिस शेखर यादव पर भी महाभियोग प्रस्ताव विचाराधीन था, जिससे सरकार असहज थी।
क्या राष्ट्रपति बनने की महत्वाकांक्षा भी कारण?
ऐसी चर्चा भी रही है कि धनखड़ उपराष्ट्रपति से अगला कदम राष्ट्रपति बनने की इच्छा रखते थे, लेकिन शायद यह संकेत उन्हें नहीं मिला, जिससे उनकी नाराज़गी और बढ़ गई। उनके राजनीतिक जनाधार की सीमाएं और सरकार के प्रति बढ़ती असहजता ने उनके भविष्य को लेकर तस्वीर धुंधली कर दी।
विडंबना: जिनसे टकराव, अब उनसे समर्थन
विपक्ष, जिसने कभी उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाया था, अब उनके इस्तीफे को दबाव और नैतिकता के रूप में देख रहा है। यह भारतीय राजनीति की विडंबना है कि जिस नेता की आलोचना की जाती रही, अब उसी को समर्थन मिल रहा है।
धनखड़ का इस्तीफा केवल स्वास्थ्य कारणों का परिणाम नहीं लगता। यह एक स्पष्ट संकेत है कि सरकार और उनके बीच सहयोग की सीमाएं टूट चुकी थीं। उन्होंने अपने संवैधानिक पद की गरिमा बनाए रखने के बजाय कई बार राजनीतिक दायरे से बाहर जाकर टिप्पणियां कीं, जो अंततः उनके विरुद्ध चली गईं।
अब देखने वाली बात यह होगी कि अगला उपराष्ट्रपति कौन होगा और क्या वह केंद्र सरकार की अपेक्षाओं पर खरा उतरने वाला चेहरा होगा? साथ ही यह भी सबक है कि संवैधानिक पदों पर चयन करते समय केवल योग्यता नहीं, बल्कि सामंजस्य भी ज़रूरी है।

