ननकीराम कंवर ने प्रधानमंत्री से की लोक निर्माण विभाग के प्रमुख अभियंता की लिखित शिकायत, केंद्रीय जांच की मांग

 

नई दिल्ली। छत्तीसगढ़ के पूर्व गृहमंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता ननकी राम कंवर ने प्रधानमंत्री से लोक निर्माण विभाग के अभियंता की शिकायत करके जांच की मांग की। आश्चर्य इस बात का है छत्तीसगढ़ में बीजेपी की सरकार है इसके बावजूद प्रदेश के वरिष्ठ नेता को अपनी बात पत्र के जरिए प्रधानमंत्री तक पहुंचाना पड़ रही है। सवाल यह है कि विष्णुदेव साय की सरकार अपने ही वरिष्ठ नेताओं की शिकायत को अनदेखा क्यों कर रही है।

ननकी राम कंवर ने अपने विस्तृत पत्र में आरोप लगाया है कि भतपहरी ने विभाग में विभिन्न पदों पर रहते हुए नियमों की अनदेखी कर अपने चहेते ठेकेदारों को लाभ पहुंचाया, कथित रूप से कमीशनखोरी की तथा बेनामी और रिश्तेदारों के नाम पर अवैध चल-अचल संपत्ति अर्जित की। उन्होंने यह भी उल्लेख किया है कि राज्य आर्थिक अपराध अन्वेषण एवं एंटी करप्शन ब्यूरो में वर्ष 2011 और 2015 में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम तथा भादवि की धाराओं के तहत प्रकरण दर्ज हुए थे, लेकिन राजनीतिक पहुंच के कारण इन मामलों में ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी और फाइलें लंबित पड़ी रहीं।

पत्र में राजनांदगांव संभाग के मानपुर–संबलपुर मार्ग निर्माण कार्य का मुद्दा भी उठाया गया है। कंवर के अनुसार, लगभग 6.95 करोड़ रुपये की प्रशासकीय स्वीकृति के विरुद्ध करीब 10 करोड़ रुपये तक भुगतान किए जाने का आरोप है। शिकायत के बाद मुख्य तकनीकी परीक्षक (सतर्कता) की जांच में स्वीकृत राशि से अधिक व्यय और रिकॉर्ड संबंधी गंभीर अनियमितताओं की बात सामने आने का दावा किया गया है। इसके बावजूद संबंधित अधिकारी के खिलाफ कठोर कार्रवाई न होना कई सवाल खड़े करता है।

इसी प्रकार बिलासपुर मंडल में निरस्त किए गए एक अनुबंध को पुनर्जीवित कर बिना दंड समयवृद्धि और एस्केलेशन स्वीकृत कर लाखों रुपये का कथित लाभ ठेकेदार को पहुंचाने का आरोप भी लगाया गया है। कंवर का दावा है कि इससे शासन को आर्थिक क्षति हुई है।

कंवर ने यह भी आरोप लगाया कि पदोन्नति की प्रक्रिया के दौरान लंबित शिकायतों और गंभीर आरोपों की पूरी जानकारी आयोग के समक्ष प्रस्तुत नहीं की गई, जिससे विभाग के अन्य अभियंताओं में असंतोष और अविश्वास का वातावरण बना हुआ है। उनका कहना है कि यदि इतने गंभीर आरोपों के बावजूद अधिकारी उच्च पदों तक पहुंचते रहे, तो यह केवल एक व्यक्ति का मामला नहीं बल्कि पूरी प्रशासनिक व्यवस्था की पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न है।

उन्होंने मांग की है कि संबंधित अधिकारी को पद से हटाकर लंबित मामलों की निष्पक्ष जांच किसी केंद्रीय एजेंसी से कराई जाए और यदि अनियमितताएं प्रमाणित हों, तो शासन को हुए नुकसान की वसूली सुनिश्चित की जाए।

यह मामला केवल एक अधिकारी पर लगे आरोपों तक सीमित नहीं है, बल्कि लोक निर्माण विभाग की साख और विकास कार्यों की विश्वसनीयता से भी जुड़ा है। सड़कों, पुलों और आधारभूत संरचना की गुणवत्ता सीधे तौर पर विभाग की पारदर्शिता और जवाबदेही पर निर्भर करती है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि सरकार इन आरोपों पर क्या रुख अपनाती है—क्या इसे राजनीतिक विवाद मानकर टाला जाएगा या पारदर्शी और समयबद्ध जांच के जरिए सच्चाई सामने लाई जाएगी।

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