मिथिला में राम खेलथि होरी…. मिथिला में….

सुधीर कुमार

पुरातन काल से ही मिथिला सांस्कृतिक रूप से बहुत ही समृद्ध और सुसंस्कृत रहा है। खान-पान, विध-व्यवहार, धर्म-संस्कृति, भाषा आदि वर्षों से समृद्ध रहा है। यहां प्रत्येक पर्व एक विशेष पद्धति से मनाया जाता है। प्रत्येक पर्व के पीछे कुछ पौराणिक कहानियां जुड़ी होती है। ऐसे में होली से जुड़ी कोई कहानी ना हो ऐसा कैसे हो सकता है। जबकि यहां के हर होली के गीत में राम-सीता, शिव–पार्वती और राधा-कृष्ण का उल्लेख रहता है। यहां का प्रसिद्ध फगुआ गीत, मिथिला में राम खेलथि होरी…. प्रसिद्ध है तो फगुआ गाने वाले टोली का अंतिम गाना होता है- सदा आनंद रहे अहि द्वारे मोहन खेले होरी हो….

…कह सकते हैं कि राम–सीता, गौरी–शंकर और  राधा-कृष्ण यहां के लोकगीतों के मुख्य पात्र होते हैं। मिथिला जो की जनकनंदिनी, जगतजननी मां सीता की जन्मस्थली है। भगवान श्री राम का यहां ससुराल है। गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या का उद्धार यहीं हुआ, भगवान शंकर यहां महाकवि विद्यापति की चाकरी करना सोचा, इससे ही इस धरती की विशिष्टता परिलक्षित होती है।

इस पर्व पर लोग यहां एक पदयात्रा निकालते हैं। पदयात्रा फाल्गुन शुक्ल पक्ष प्रतिपदा को शुरू होती है और इसका समापन होलिका दहन के दिन जनकपुर में होता है। जिसे तत्कालीन मिथिला की राजधानी कहा जाता है।

सीताराम धुन के साथ नंगे पांव पदयात्रा करते हैं। पदयात्रा में डफली, ढोल, झाल, झल्लर आदि वाद्य यंत्र के साथ फगुआ गाते हुए चलते हैं। पदयात्रा में राम-सीता और शिव–पार्वती की झांकियां निकाली जाती है। यात्रा का समापन राजा जनक की नगरी जनकपुर और उसके परकोट क्षेत्र में होती है। इस क्रम में ये श्रद्धालु यहां अवस्थित राम और सीता से जुड़े लगभग सभी पावन स्थलों की यात्रा करते हैं। यात्रा की शुरुआत बिहार के कलनेश्वर महादेव मंदिर से होती है। जैसा कि पहले भी चर्चा कर चुका हूं, समापन जनकपुर धाम में होता है। इस यात्रा में युगल राम-सीता के स्वरूप की दो पालकी निकाली जाती है। कई बार इस शोभा यात्रा में रामसीता के साथ लक्ष्मण, हनुमान और महादेव परिवार आदि भी बने होते हैं। कलनेश्वर महादेव मंदिर में रात्रि पड़ाव बाद यह यात्रा गिरिजा स्थान यानी फुलहर पहुंचती है। फुलहर जो कि गिरजा स्थान के नाम से भी प्रसिद्ध है। गिरिजा देवी जो राजा जनक की कुलदेवी कही जाती है। यह स्थान भगवान श्रीराम और सीता के प्रथम मिलन का साक्षी रहा है। यही वह पुष्पवाटिका है, जिसमें राम और सीता की पहली मिलन हुई थी। यही वह पुष्पवाटिका यात्रा का दूसरा महत्वपूर्ण पड़ाव है। यह स्थान वर्तमान में बिहार के मधुबनी जिला में अवस्थित है। ऐसी मान्यता है कि यहां देवी सीता पुष्प संग्रह और गिरजा पूजन के लिए आती थीं। वहीं सीता और रामजी के सुखद भेंट स्मृति में फगुआ गाया जाता है। यहां टोली फगुआ गाते हुए रंग गुलाल एक दूसरे को लगाते है। पुआ पकवान खाते हुए रात्रि विश्राम करते हैं। मिथिला में इसी दिन से रंगों वाली होली शुरू हो जाती है। ऐसी मान्यता है कि राम सीता भी यहां पहली बार होली खेले थे। लोग इस स्थान को वृंदावन में स्थित कृष्ण के निधिवन के समतुल्य मानते हैं। इस प्रकार पूरी टोली का अंतिम पड़ाव जनकपुर धाम पहुंचती है। हालांकि इसके अलावा भी विभिन्न जगहों से टोली जिसमें रामसीता, लक्ष्मण, हनुमान, महादेव आदि के रूप बने हुए, रंग गुलाल खेलते हुए फगुआ के दिन जनकपुर पहुंचते हैं।

यूं तो मिथिला में गुलाल की होली सरस्वती पूजा अर्थात बसंत पंचमी के दिन से शुरू हो जाती है। बसंत पंचमी माघ मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन देवी सरस्वती को लोग गुलाल अर्पित कर एक दूसरे को गुलाल लगाकर फगुआ की पारंपरिक शुरुआत करते हैं। एक दूसरी मान्यता यह भी है कि महाशिवरात्रि के दिन भगवान भोलेनाथ को लोग रंग और गुलाल अर्पित कर इस दिन से भी रंग गुलाल खेलना शुरू कर देते हैं। रंग की होली लोग इसी दिन से मानते हैं मिथिला में। यह कुछ मान्यताएं हैं मिथिला में फगुआ को लेकर शेष आप सभी को होली की बहुत-बहुत शुभकामना।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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