बिहार संग्रहालय में कला एवं संस्कृति के संरक्षण में संग्रहालयों की भूमिका पर संगोष्ठी आयोजित

पटना। भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेंद्र प्रसाद की पुण्यतिथि के अवसर पर “कला एवं संस्कृति के संरक्षण में संग्रहालयों की भूमिका” विषय पर एक विचारोत्तेजक संगोष्ठी का आयोजन बिहार संग्रहालय में किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता बिहार संग्रहालय के उपर निदेशक श्री अशोक कुमार सिन्हा ने की।

अपने संबोधन में श्री अशोक कुमार सिन्हा ने डॉ राजेंद्र प्रसाद की अमर विरासत पर प्रकाश डालते हुए बताया कि वर्ष 1917 में स्थापित बिहार संग्रहालयमें महान राजनेता के दुर्लभ चित्रों और कृतियों को समर्पित एक विशेष दीर्घा का विकास कार्य प्रगति पर है। उन्होंने कहा कि ऐसे प्रयास ऐतिहासिक चेतना को सुदृढ़ करते हैं तथा नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जुड़ने के लिए प्रेरित करते हैं।

प्रख्यात लेखक एवं ब्रिटिश लिंगुआ के संस्थापक डॉ बीरबल झा ने अपने प्रेरणादायक वक्तव्य में संग्रहालयों की कालजयी प्रासंगिकता को रेखांकित किया। उन्होंने कहा, “संग्रहालय इन धरोहरों को समय की क्षति से सुरक्षित रखते हैं। वे सुनिश्चित करते हैं कि संस्कृति की ज्योति कभी बुझने न पाए। वे हमें स्मरण कराते हैं कि सभ्यता एक दिन में निर्मित नहीं होती; उसे सदियों में गढ़ा जाता है।”

संग्रहालयों को “सांस्कृतिक दूत” बताते हुए डॉ झा ने कहा, “वे विश्व से यह उद्घोष करते हैं—यह हमारी पहचान है, यह हमारी ज्ञान-परंपरा की गहराई है।” अपने वक्तव्य को और समृद्ध करते हुए उन्होंने पाँचवीं शताब्दी के राजा एवं कवि Bhartrihari की अमर कृति Niti Shatakam से उद्धरण प्रस्तुत किया—
“जिस मनुष्य में साहित्य, संगीत और कला का अभाव है, वह केवल पूँछ और सींग के बिना पशु के समान है। यह वास्तविक पशुओं का सौभाग्य है कि ऐसा मनुष्य घास नहीं खाता, फिर भी जीवित रहता है।”

इस गहन उद्धरण के माध्यम से डॉ झा ने मानव चरित्र के परिष्कार और सभ्यता के संरक्षण में कला एवं संस्कृति की अनिवार्य भूमिका को पुनः रेखांकित किया।

इस अवसर पर उपर निदेशक डॉ सुनील कुमार झा, श्री रणवीर सिंह राजपूत, डॉ शंकर जय किशन, डॉ विशी उपाध्याय, श्रीमती स्वाति कुमारी सिंह, श्री नंदन कुमार, श्री घनश्याम सिंह, श्री पशुपति कुमार सिंह, मिस अदीवा, श्री सुराज सावंत तथा श्री रंजीत कुमार सहित अनेक वक्ताओं ने अपने विचार व्यक्त किए। सभी वक्ताओं ने संग्रहालयों को विरासत के भंडार, शिक्षा के केंद्र तथा अतीत, वर्तमान और भविष्य के मध्य सेतु के रूप में रेखांकित किया।

बिहार संग्रहालय एवं ब्रिटिश लिंगुआ द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित इस संगोष्ठी का समापन संग्रहालय संबंधी पहलों को सुदृढ़ करने और कला एवं संस्कृति के प्रति जनभागीदारी को बढ़ाने के सामूहिक संकल्प के साथ हुआ। वक्ताओं ने पुनः प्रतिपादित किया कि धरोहरों का संरक्षण केवल संस्थागत दायित्व नहीं, बल्कि राष्ट्रीय कर्तव्य है।

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