नई दिल्ली। श्याम लाल कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय के अंग्रेज़ी विभाग एवं आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन प्रकोष्ठ (आईक्यूएसी) द्वारा शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार की भारतीय भाषा समिति के सहयोग से “फ्रॉम हेरिटेज टू होराइज़न: इंडियन लैंग्वेजेज एंड फोकलोर्स” विषय पर दो दिवसीय अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन का सफल आयोजन किया गया।
इस सम्मेलन में देश-विदेश से आए प्रख्यात विद्वानों, शिक्षाविदों, शोधार्थियों और शोध-पत्र प्रस्तुतकर्ताओं ने भाग लिया। कार्यक्रम भारतीय भाषाओं, लोक परंपराओं और उनकी समकालीन प्रासंगिकता पर गंभीर अकादमिक विमर्श का सशक्त मंच बना।
उद्घाटन सत्र में महाविद्यालय के प्राचार्य प्रो. रबी नारायण कर ने अतिथियों का स्वागत करते हुए भारतीय भाषाई और लोक धरोहर को अकादमिक परिप्रेक्ष्य में पुनर्स्थापित करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि उच्च शिक्षण संस्थानों का दायित्व है कि वे विद्यार्थियों में बहुभाषिक एवं बहुसांस्कृतिक दृष्टिकोण विकसित करें।
आईक्यूएसी निदेशक एवं अंग्रेज़ी विभाग की प्रभारी प्रो. कुशा तिवारी ने सम्मेलन की केंद्रीय अवधारणा प्रस्तुत करते हुए कहा कि भारतीय भाषाएँ और लोक परंपराएँ अतीत की स्थिर विरासत नहीं, बल्कि जीवंत परंपराएँ हैं जो निरंतर विकसित होकर वर्तमान चिंतन को समृद्ध करती हैं।
उद्घाटन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में इंडिया हैबिटैट सेंटर के निदेशक प्रो. के. जी. सुरेश तथा विशिष्ट अतिथि के रूप में दिल्ली विश्वविद्यालय के कॉलेजों के डीन प्रो. बलराम पानी उपस्थित रहे। मुख्य वक्तव्य हिंदी विश्वविद्यालय, पश्चिम बंगाल की कुलपति प्रो. नंदिनी साहू ने दिया। उन्होंने वैश्वीकरण के संदर्भ में भारतीय भाषाओं और लोक परंपराओं की भूमिका पर प्रकाश डाला। इस अवसर पर ‘बुक ऑफ एब्स्ट्रैक्ट्स’ का विमोचन भी किया गया।
सम्मेलन संयोजक डॉ. रोहित जहरी ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए शिक्षा मंत्री श्री धर्मेंद्र प्रधान सहित विभिन्न गणमान्य व्यक्तियों के संदेशों का उल्लेख किया तथा सभी सहयोगियों के प्रति आभार व्यक्त किया।
पहले दिन के पूर्णांग सत्र में विभिन्न राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालयों के विद्वानों ने भाषा, लोकसाहित्य, शिक्षा और सांस्कृतिक आदान-प्रदान जैसे विषयों पर विचार रखे। इसके पश्चात चार समानांतर तकनीकी सत्र आयोजित किए गए, जिनमें लोक आख्यान, अनुवाद अध्ययन, भाषाई विविधता, सांस्कृतिक स्मृति और समकालीन शिक्षण पद्धतियों से जुड़े विषयों पर शोध-पत्र प्रस्तुत किए गए।
दूसरे दिन के सत्रों में भाषा और पहचान, लोक परंपराओं का डिजिटलीकरण तथा भाषाई विविधता के संरक्षण जैसे मुद्दों पर गहन चर्चा हुई। विद्वानों ने शिक्षा नीति, लोक परंपराओं के शिक्षण में समावेश और सांस्कृतिक आख्यानों की भूमिका पर महत्वपूर्ण विचार प्रस्तुत किए।
समापन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में एक केंद्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति ने अपने संबोधन में भारतीय भाषाओं और लोक परंपराओं पर निरंतर शोध एवं संवाद की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि भारत की भाषाई और सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए रखने के लिए प्रलेखन, अनुसंधान और नवाचार अत्यंत आवश्यक हैं।
अंत में सम्मेलन संयोजक ने दो दिवसीय आयोजन का सार प्रस्तुत किया और सह-संयोजक द्वारा धन्यवाद ज्ञापन के साथ कार्यक्रम का सफल समापन घोषित किया गया।
यह सम्मेलन भारतीय भाषाई एवं सांस्कृतिक विविधता के संरक्षण और संवर्धन की दिशा में एक महत्वपूर्ण अकादमिक पहल के रूप में उभरा।

