‘तमिल करकलाम’ के अंतर्गत वाराणसी के 284 छात्र तमिलनाडु में भाषा, संस्कृति और जीवन-शैली का कर रहे सजीव अनुभव

चेन्नई/वाराणसी। भारत की सांस्कृतिक एकता, भाषायी सौहार्द और सभ्यतागत निरंतरता को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से आयोजित काशी तमिल संगमम् 4.0 के दूसरे चरण में ‘तमिल करकलाम’ अभियान के अंतर्गत वाराणसी के विभिन्न शिक्षण संस्थानों से चयनित कुल 284 छात्र तमिलनाडु भेजे गए हैं। ये सभी छात्र 10 विभिन्न समूहों में विभाजित होकर तमिलनाडु के प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों जैसे आई आई टी मद्रास, श्री संकरा कॉलेज, कांचीपुरम, पोंडिचेरी विश्वविद्यालय सहित अन्य संस्थानों में प्रवास कर रहे हैं। इस प्रवास के दौरान छात्र तमिल भाषा का विधिवत अध्ययन करने के साथ-साथ तमिलनाडु की समृद्ध संस्कृति, परंपराओं, खान-पान, स्थापत्य कला और सामाजिक जीवन को निकट से अनुभव कर रहे हैं।

इसी क्रम में आज चार समूहों के छात्रों ने तमिलनाडु के ऐतिहासिक नगर महाबलीपुरम में स्थित विश्व धरोहर स्मारकों जैसे शोर मंदिर (आठवीं शताब्दी) एवं पंच रथ का शैक्षणिक एवं सांस्कृतिक भ्रमण किया। इस अवसर पर छात्रों ने पल्लवकालीन स्थापत्य कला, समुद्र तट से जुड़ी धार्मिक परंपराओं तथा भारत की प्राचीन वास्तु-संस्कृति को प्रत्यक्ष रूप से देखा और समझा। यह भ्रमण विद्यार्थियों के लिए इतिहास और संस्कृति को पुस्तकों से बाहर आकर जीवंत रूप में देखने का एक दुर्लभ अवसर सिद्ध हुआ।

भ्रमण के दौरान आईआईटी मद्रास में प्रवास कर रहे छात्र राहुल कुमार ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि तमिलनाडु आकर उन्हें अनुशासन, सरलता और सांस्कृतिक समृद्धि का अद्भुत संगम देखने को मिला है। उन्होंने बताया कि यहां तमिल भाषा सिखाने की पद्धति अत्यंत सहज और व्यवहारिक है, जिससे भाषा सीखना रोचक हो गया है। स्थानीय तमिल व्यंजनों जैसे इडली, डोसा, सांभर और पोंगल का स्वाद लेते हुए उन्हें घर जैसा अपनापन महसूस हो रहा है और यह यात्रा उनके लिए अविस्मरणीय बनती जा रही है।

कांचीपुरम में प्रवास कर रहे छात्र समूह के अभय गुप्ता ने कहा कि कांचीपुरम जैसे ऐतिहासिक और आध्यात्मिक नगर में रहकर अध्ययन करना उनके लिए गर्व का विषय है। उन्होंने बताया कि यहां के मंदिर, वस्त्र परंपरा और स्थानीय जीवन-शैली यह दर्शाती है कि तमिल संस्कृति कितनी गहराई से अपने मूल्यों और परंपराओं से जुड़ी हुई है। भाषा सीखने के साथ-साथ वे यह भी अनुभव कर रहे हैं कि उत्तर और दक्षिण भारत की सांस्कृतिक धाराएँ भिन्न होते हुए भी एक ही भारतीय चेतना से जुड़ी हैं।

छात्रा अनन्या ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि तमिलनाडु के लोगों की आत्मीयता, सादगी और सांस्कृतिक सौहार्द ने उन्हें अत्यंत प्रभावित किया है। उन्होंने बताया कि तमिल भोजन, लोक-संगीत, पारंपरिक अभिवादन और ऐतिहासिक स्थलों के दर्शन ने उनके दृष्टिकोण को व्यापक बनाया है। शोर मंदिर और पंच रथ जैसे स्मारकों को प्रत्यक्ष देखकर इतिहास उनके लिए जीवंत हो उठा है, जिससे भारत की विविधता में निहित एकता का भाव और अधिक सशक्त हुआ है।

उल्लेखनीय है कि छात्रों को तमिल भाषा का प्रशिक्षण केंद्रीय सांस्कृतिक तमिल संस्थान से जुड़े अनुभवी शिक्षकों द्वारा प्रदान किया जा रहा है। कक्षा शिक्षण के साथ-साथ संवाद, सांस्कृतिक गतिविधियों और स्थानीय परिवेश के माध्यम से भाषा को व्यवहारिक रूप में सिखाया जा रहा है। तमिलनाडु के पारंपरिक व्यंजन पाकर सभी छात्र अत्यंत प्रसन्न एवं उत्साहित हैं, जिससे उनका संपूर्ण प्रवास ज्ञानवर्धक होने के साथ-साथ आनंददायक भी बन गया है।

काशी तमिल संगमम् 4.0 का यह दूसरा चरण एक भारत–श्रेष्ठ भारत की भावना को साकार करता हुआ उत्तर और दक्षिण भारत के बीच सांस्कृतिक सेतु को और अधिक सुदृढ़ कर रहा है। कार्यक्रम का समापन 30 दिसंबर को रामेस्वरम में प्रस्तावित है, जहाँ माननीय उपराष्ट्रपति, केंद्रीय शिक्षा मंत्री तथा तमिलनाडु के राज्यपाल की गरिमामयी उपस्थिति में भव्य समापन समारोह आयोजित किया जाएगा। यह समारोह काशी और तमिलनाडु के शाश्वत सांस्कृतिक संबंधों का उत्सव होगा।

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