नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में लंबे समय से जारी तनाव के बीच ईरान और अमेरिका के बीच दो हफ्ते के युद्धविराम की सहमति बनी है। हालांकि, ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि यह स्थायी समाधान नहीं, बल्कि एक अस्थायी विराम है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या यह कदम स्थायी शांति की दिशा में बढ़ रहा है या सिर्फ तनाव को टालने की कोशिश है।
सूत्रों के मुताबिक, अमेरिका और ईरान के बीच जल्द ही औपचारिक वार्ता शुरू हो सकती है, जिसकी संभावित मेजबानी पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में होने की उम्मीद जताई जा रही है। दोनों देशों के बीच यह बातचीत कई अहम शर्तों पर आधारित होगी।
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़: रणनीतिक केंद्र में बना मुद्दा
युद्धविराम के दौरान ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ को फिर से खोलने पर सहमति जताई है, जो वैश्विक तेल आपूर्ति के लिए बेहद अहम मार्ग है। हालांकि, उसने यह भी साफ किया है कि इस मार्ग की निगरानी उसकी सेना करेगी, यानी आवाजाही पूरी तरह स्वतंत्र नहीं होगी।
ईरान की 10-सूत्रीय योजना: क्या हैं प्रमुख शर्तें?
ईरान ने स्थायी युद्धविराम के लिए एक विस्तृत 10-सूत्रीय प्रस्ताव रखा है, जिसमें क्षेत्रीय स्थिरता और आर्थिक पुनर्बहाली पर जोर दिया गया है। प्रमुख मांगें इस प्रकार हैं:
- ईरान, इराक, लेबनान और यमन में चल रहे सभी संघर्षों का पूर्ण अंत
- ईरान के खिलाफ किसी भी सैन्य कार्रवाई पर स्थायी रोक
- स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़ में सुरक्षित नौवहन के लिए सख्त प्रोटोकॉल
- युद्ध से हुए नुकसान की भरपाई (मुआवजा)
ईरान पर लगे सभी आर्थिक प्रतिबंधों को हटाना - अमेरिका द्वारा फ्रीज किए गए ईरानी फंड्स और संपत्तियों की रिहाई
- परमाणु हथियार न बनाने की प्रतिबद्धता की पुनर्पुष्टि
इसी बीच, डोनाल्ड ट्रंप ने दो सप्ताह के “दो-तरफा युद्धविराम” की घोषणा करते हुए इसे सकारात्मक कदम बताया है। उन्होंने संकेत दिया कि बातचीत में प्रगति हो रही है और जल्द ही व्यापक समझौता संभव हो सकता है।
मतभेद अब भी बरकरार
हालांकि युद्धविराम और होर्मुज़ जलडमरूमध्य को खोलने जैसे कदम तनाव कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं, लेकिन दोनों देशों के बीच अभी भी कई बड़े मतभेद बने हुए हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह युद्धविराम फिलहाल “तनाव प्रबंधन” का उपाय है, न कि स्थायी समाधान। आने वाली वार्ताएं ही तय करेंगी कि यह पहल शांति का रास्ता बनती है या फिर एक और अस्थायी विराम साबित होती है।

