नई दिल्ली। हमारी जिंदगी में एक पल ऐसा आता है, जब हमारे अतीत की धारा पीछे छूट जाती है और हम अपनी जिंदगी में एक नए प्रवाह के साथ आगे बढ़ते हैं. ऐसा ही कुछ रजत (बदला हुआ नाम) के साथ हुआ. ऐसा ही पल उसकी जिंदगी में जनवरी, 2019 में आया था, जब नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित कैलाश सत्यार्थी के संगठन बचपन बचाओ आंदोलन (बीबीए) ने स्थानीय प्रशासन के सहयोग से उसे एक ऑटोमोबिल वर्कशॉप से छापामार कार्रवाई कर बाल मजदूरी के नारकीय जीवन से मुक्त कराया. उस समय रजत 16 साल का था.
यह उम्र जिंदगी में कई रंग-बिरंगे सपने देखने के होते हैं. लेकिन रजत के बचपन की कहानी स्याह पन्नों पर लिखी जा रही थी. दूसरे बच्चों की तरह रजत के भी अपनी जिंदगी को बेहतर करने के सपने थे. लेकिन उसका परिवार जिन मुश्किल स्थितियों से जूझ रहा था, उनमें रजत के सपनों को लेकर लिए कोई जगह नहीं थी.
रजत के परिवार को चलाने की पूरी जिम्मेदारी उसके पिता के कमजोर कंधों पर थी, जो गंभीर बीमारी के साथ-साथ बुढ़ापे से जुड़ी अन्य समस्याओं से जूझ रहे थे. अपने परिवार की बेहतरी के लिए अधिक पैसे कमा सके, इसके लिए वे बाहर भी जाना चाहते थे, लेकिन बीमारी और बुढ़ापे ने उनके पैरों में जंजीरे बांध दी थीं. यह सब देखकर रजत को रहा नहीं गया और उसने अपनी पढ़ाई छोड़ काम करने का बड़ा फैसला ले लिया. लेकिन उसके लिए यहां से भी आगे की राह आसान नहीं थीं.
एक ऑटोमोबिल वर्कशॉप में उसे काम तो मिल गया, लेकिन मजदूरी बहुत कम मिल रही थी. ऐसे में उसकी परेशानियां बढ़ती जा रही थीं क्योंकि, जब उसने काम के लिए पढ़ाई छोड़ने का फैसला किया था, तब उसने सोचा था कि वह अपने परिवार को चलाने के लिए ठीक-ठाक पैसा कमा लेगा, लेकिन ऐसा हुआ नहीं. उसके ऑटोमोबिल की दुकान में काम करने के बावजूद उसके परिवार की स्थिति में बहुत अधिक सुधार नहीं हुआ. वह बधुआ मजदूर बन गया। हर रोज 10 से 12 घंटे लगातार काम ने रजत को मानसिक रूप से तोड़ दिया। रजत को अपनी जिंदगी भी उसकी हथेलियों पर लगे ग्रीस और मोबिल की तरह काला ही काला दिख रहा था. लेकिन कहा जाता है न कि रात चाहे कितनी ही अंधेरी क्यों न हो, उसका सवेरा जरूर आता है. ऐसा ही कुछ रजत की जिंदगी में भी हुआ.
रजत की जिंदगी में ऐसा ही सवेरा जनवरी, 2019 में आया, जब उसे बाल श्रम के दलदल से निकाला गया. ऑटोमोबिल रिपेयर की दुकान से छुड़ाए जाने के बाद उसे दिल्ली के बुराड़ी स्थित मुक्ति आश्रम भेजा गया. यहीं से रजत की जिंदगी एक नई धारा के साथ चल पड़ी, जिसका मुहाना एक बेहतर जिंदगी थी.
मुक्ति आश्रम में रजत को वे सारी बुनियादी सुविधाएं जैसे कि- भोजन, कपड़े और छत नसीब हुई, जिसके लिए उसे अब तक जूझना पड़ रहा था. इसके अलावा, बाल श्रम के दौरान मानसिक तौर पर रजत को जिन बुरी परिस्थितयों का सामना करना पड़ा था, उनसे उबरने के लिए आश्रम में नियमित तौर पर उसकी काउंसलिंग की गई. वहीं, काम करने के दौरान हुई पढ़ाई के नुकसान की भरपाई और जन्मजात प्रतिभाओं को निखारने के पर्याप्त अवसर भी आश्रम में उपलब्ध करवाए गए. मुक्ति आश्रम में कुछ समय रहने के बाद जब रजत को उसके माता-पिता के पास वापस भेजा गया तो उसका दाखिला आठवीं क्लास में करवाकर उज्ज्वल भविष्य की बुनियाद रख दी गई. वह फिर से बाल श्रम के चंगुल में न फंस जाएं. इसके अलावा रजत के परिवार को सरकार की कल्याणकारी योजनाओं से जोड़कर उसके परिवार की स्थिति बेहतर करने की भी कोशिश की गई.
एक बातचीत में रजत भावुक होकर कहता है, ‘भले ही परिवार की खराब स्थिति के चलते हमको पढ़ाई छोड़कर काम करना पड़ा, लेकिन हम मुक्ति आश्रम में बिताए गए एक-एक अच्छे टाइम को याद रखे हैं.’
आज की तारीख में रजत 20 साल का हो चुका है और वह न केवल ऑटो चलाकर अपनी जिंदगी को चलाने की कोशिश में लगा हुआ है, बल्कि इसे संवारने के लिए पढ़ाई भी कर रहा है. बचपन बचाओ आंदोलन (बीबीए) ने उसका दाखिला राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान (एनआईओएस) में करवाया है, जिससे वह काम के साथ-साथ पढ़ाई भी कर सके. अभी वह 10वीं में है और आगे भी पढ़ना चाहता है. वह न केवल अपने सुनहरे भविष्य के सपने देख रहा है बल्कि, इसकी बुनियाद भी तैयार कर रहा है.

