गुमकी से मिलेगी निजात, जल्द आ रही है बरसात

आलोक कुमार

बस इंतजार कीजिए। इस साल अतिवृष्टि तय है। काल गणना के पारंगतों ने उद्घोषणा कर रखी है। आदिकाल से चला आ रहा पंडितों का आंकलन अक्सर गलत नहीं होता।

भीषण गर्मी से तप रहे पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के लोग थोड़ा और सब्र करें। गैगेरियन कैलेंडर के 4 जुलाई को श्रावण का महीना लग रहा है। और यह 31 अगस्त तक रहेगा। यानी इस साल झूमकर बरसात कराने वाला श्रावण का महीना 59 दिनों का होगा। सावन के इन दो महीने में चार नहीं बल्कि आठ सोमवार होंगे। फिर भी जो थोड़ी बहुत कसर बचेगा तो वह भरोसे के साथ भादव के महीने में काले मंडराते बादल के साथ जरूर पूरा करेगा।

आगे आश्विन के दशहरे का इंतजार कीजिए। अतिवृष्टित से संभव है कि दुर्गा पूजा के पंडाल में हाफ स्वेटर पहनकर जाना पड़े। पञ्चांग के अनुसार गर्म कपड़ों का बाज़ार समय से पहले गरमा सकता है।

अभी जो बरसात की फुहार से 61 साल बाद मुंबई और दिल्ली एक साथ तर हो रही है, वह श्रावण के मुहाने तक पहुंचाने वाले आषाढ़ मास के आखिरी दिनों का कमाल है। यह झांकी है, सावन की असली बरसात तो बाकी है। इस सुहाने मॉनसूनी बरसात का श्रेय आषाढ़ को दीजिए। और संभव हो, तो आगे की मौसमानुकूल सफर के लिए मौसम विभाग और पंडितों के आसरे रहने के बजाय खुद ब खुद अपने पञ्चांग को पढ़ना सीखिए।

ग्रह नक्षत्रों की गति की सूक्ष्म गणना से बना पञ्चांग कहे तो कूलर, एसी के बाजार में जाइए। वरना पखवाड़े भर की गर्मी से घबराकर एसी की खरीद पर पैसा मत फूंक आइए। इस बार पञ्चांग में अतिवृष्टि के आंकलन को समझकर छाता और बरसाती जरूर खरीद लीजिए। और हां, जिनको अपने म्युनिसिपल बॉडी के भ्रष्टाचार का अंदाजा हो, वो चाहें तो मोटर बोट का अभी से इंतजाम कर लीजिए। सुखी रहने के लिए गैगेरियन कैलेंडर से बाहर निकल नेपाल की तरह सूरज और चंद्र दोनों की सम्मलित गति पर आधारित अपने पञ्चांग पर भरोसा कर लीजिए।

क्योंकि यूनान और लंदन के मौसम पूर्वानुमान के लिए सिर्फ सौर्य की गति की गणना से बने गैगरियन कैलेंडर की तारीखें हमारे लिए बेमानी है। दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाला देश होने के बावजूद हमारे लिए सिर्फ चांद की गति पर आधारित हिजरी संवत की गणना फीट नहीं बैठती। यह उपमहाद्वीप के पाकिस्तान और बंगलादेश के वैज्ञानिकों को बखूबी पता है।

हमारी गणना सटीक है। भारतीय उप महाद्वीप में धरती से मेघ की भेंट कराने वाला महीना श्रावण है। श्रावण के महीना को हम भोले भण्डारी से जोड़ते हैं। उनकी जटा से उड़कर जो जल घनी काली घटा में पहुंचकर भरा होता है वहीं भारतीय उपमहाद्वीप पर श्रावण में खिलखिलाकर बरसता है। खेतों में जा पसरता है। यहीं महीना कृषि को बल देता है। हर साल हमारा अन्न प्रासन्न कराता है। पेट भरने के साथ निर्यात से हमारी इकोनॉमी को संबल देता है।

धरती की प्यास अगर मौसम विभाग की भविष्यवाणी से बुझ रही होती, तो मौसम वैज्ञानिकों को आमजन के खारीखोटी का सामना नहीं करना पड़ता। बल्कि काल गणना से पता चल जाता है कि भारत में किस साल कैसी बरसात होगी, कैसा होगी ठंड और कितने गर्मी का संताप झेलना होगा।

(वरिष्ठ पत्रकार)

Leave a Reply

Your email address will not be published.