नई दिल्ली। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने आपातकाल की 50वीं वर्षगांठ के अवसर पर आयोजित ‘संविधान हत्या दिवस 2025’ कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि 25 जून 1975 को लगाया गया आपातकाल लोकतंत्र के इतिहास का सबसे काला अध्याय था, जिसे केवल सत्ता बचाने के लिए थोपा गया था।
उन्होंने कहा कि 12 जून 1975 को दो घटनाएं एक साथ हुईं – पहली, इलाहाबाद हाई कोर्ट द्वारा तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के चुनाव को रद्द किया जाना, और दूसरी, गुजरात में जनता मोर्चा की जीत। अमित शाह ने कहा, “मैं गुजरात से आता हूं। 12 जून को वहां कांग्रेस की सत्ता समाप्त हुई और जनता पार्टी की सरकार बनी। इन दोनों घटनाओं से घबराकर इंदिरा गांधी ने 25 जून को आपातकाल लागू कर दिया। कारण बताया गया कि राष्ट्र की सुरक्षा खतरे में है, लेकिन पूरी दुनिया जानती है कि असल में उनकी कुर्सी खतरे में थी, राष्ट्र नहीं।”
शाह ने कहा कि 24 जून 1975 की रात को देश में आपातकाल की घोषणा कर दी गई, और इसके साथ ही एक तानाशाही युग की शुरुआत हुई।
“बाबा साहेब अंबेडकर और संविधान निर्माताओं ने जिस संविधान को 2 लाख 66 हजार शब्दों के माध्यम से गढ़ा था, उस पूरी आत्मा को इंदिरा गांधी ने एक वाक्य में समाप्त कर दिया — ‘राष्ट्रपति ने आपातकाल की घोषणा की है’।”
उन्होंने कहा कि इतिहास केवल घटनाएं नहीं बताता, वह नीयत और दृष्टिकोण को भी उजागर करता है। आपातकाल उसी नीयत और राजनीतिक स्वार्थ का परिणाम था, जहां लोकतंत्र, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संविधान की भावना को कुचल दिया गया।
गृह मंत्री ने यह भी कहा कि यह घटना आज की पीढ़ी के लिए एक चेतावनी है, ताकि वे जानें कि लोकतंत्र की रक्षा केवल संविधान से नहीं, बल्कि संविधान की भावना को जीवित रखने वाले नागरिकों से होती है।
उन्होंने युवाओं से आग्रह किया कि वे लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करें और किसी भी स्थिति में तानाशाही प्रवृत्तियों के प्रति सजग रहें।

