आरती की चीख: “ये शादी नहीं, मेरे जीवन का सौदा है”

 

नई दिल्ली। “मुझे पढ़ाई करनी है, अपने सपनों को पूरा करना है। लेकिन घर वाले, मामा–मामी और मौसा–मौसी सब मिलकर मेरी जबरन शादी राजस्थान के एक अधेड़ उम्र के आदमी से करने पर तुले हैं। ये शादी नहीं, मेरे जीवन का सौदा है। मेरी मासूमियत, मेरी हंसी और मेरे सपनों को छीनकर मुझे बाल विवाह के अंधेरे में धकेला जा रहा है। कृपया, मुझे बचा लीजिए।” ये मार्मिक शब्द हैं 14 साल की उस अनाथ बच्ची के जिसने अपने दर्द और डर को एक पत्र में समेटा। उत्तर प्रदेश के अयोध्या जिले की रहने वाली आरती (बदला हुआ नाम) 10वीं में पढ़ती है। बचपन में ही उसने अपने माता-पिता को खो दिया था, सोचा कि परिवार उसका सहारा बनेगा। लेकिन सहारे की जगह, वही लोग उसके बचपन और सपनों को खत्म करने पर आमादा हो गए। शादी की आड़ में यह दरअसल एक सौदा था, जहां उसकी उम्र, इच्छाएं और उसका भविष्य सब दांव पर लगा दिए गए। आरती की यह चिट्ठी सिर्फ एक बच्ची की पुकार नहीं, बल्कि पूरे समाज के लिए आईना है। सवाल कि आखिर क्यों आज भी बेटियों के सपनों का सौदा किया जाता है? क्यों एक बच्ची को इंसान से ज्यादा बोझ माना जाता है?

बच्चों के अधिकारों के लिए काम करने वाले स्वयंसेवी संगठन अपराजिता सामाजिक समिति के प्रोग्राम मैनेजर अभय पाण्डेय बताते हैं, “संस्था गांव, स्कूल और पंचायत स्तर पर लगातार जागरूकता कैंप आयोजित करती है। यही कारण है कि उन्हें समय रहते कई बाल विवाह की सूचनाएं मिल जाती हैं और बच्चियों का बचपन बचाना संभव हो पाता है।” ऐसी ही एक जागरूकता यात्रा के दौरान समिति को जानकारी मिली कि अयोध्या की रहने वाली आरती की जल्द ही जबरन शादी कराई जाने वाली है। सूचना मिलते ही टीम तुरंत हरकत में आई और सबसे पहले चाइल्ड वेलफेयर कमेटी को अवगत कराया। इसके बाद चाइल्डलाइन और स्थानीय प्रशासन के सहयोग से पूरी टीम आरती के घर पहुंची। शुरुआत में परिवार ने कड़ा विरोध जताया, लेकिन जब टीम ने उन्हें बाल विवाह से जुड़े कानून और उसके गंभीर परिणाम विस्तार से समझाए, तो उनका रवैया बदलने लगा और धीरे-धीरे वे शांत हो गए।

हालांकि परिवार का विरोध थम गया, लेकिन इसी बीच आरती ने डरी-सहमी आवाज में रोते हुए कहा, “मुझे यहां नहीं रहना, प्लीज जल्दी से मुझे निकालिए।” उसकी यह पुकार सुनते ही टीम ने स्थिति की गंभीरता को भांप लिया। यह साफ था कि अगर उसे वहीं छोड़ दिया गया तो उसकी जिंदगी खतरे में पड़ जाएगी। तत्काल निर्णय लेकर टीम ने आरती को घर से रेस्क्यू किया और सुरक्षित स्थान पर ले गई। आज आरती लखनऊ के बालिका गृह में रह रही है, जहां उसे सुरक्षा और पढ़ाई दोनों का माहौल मिला है, अब वह फिर से अपनी किताबों की दुनिया में लौट सकेगी।

 

 

बाल अधिकारों की सुरक्षा और संरक्षण के लिए देश भर में काम कर रहे जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन के सहयोगी संगठन अपराजिता सामाजिक समिति की निदेशक किरण बैस कहती हैं, “आज भी बेटियों की शिक्षा और सुरक्षा को लेकर समाज की सोच बदलने की जरूरत है। जब तक मानसिकता नहीं बदलेगी, तब तक आरती जैसी बेटियां बाल विवाह और ट्रैफिकिंग की शिकार बनती रहेंगी।” आरती की कहानी हमें सिखाती है कि बदलाव सिर्फ कानून बनाने से नहीं आएगा, असली फर्क तब पड़ेगा जब समाज अपनी सोच बदलेगा। जब तक बेटियों को बोझ समझा जाएगा, तब तक उनके सपने अधूरे ही रहेंगे। आरती ने दिखा दिया कि हिम्मत और जज्बे से हालात बदले जा सकते हैं। उसका साहस उन हजारों बच्चियों के लिए उम्मीद और मिसाल है, जिन्हें बचपन में ही शादी के बंधन में जकड़ दिया जाता है।

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