डॉ धनंजय गिरि
भारत की स्वतंत्रता की गाथा में अनेक ऐसे क्षण हैं, जिनमें शब्दों ने शस्त्रों से अधिक बल दिया। “वंदे मातरम्” उन्हीं में से एक है — एक ऐसा उद्घोष, जिसने न केवल गुलाम भारत को स्वतंत्रता की चेतना दी, बल्कि भारतीय अस्मिता को शब्दों में मूर्त रूप प्रदान किया। आज जब ‘वंदे मातरम्’ के 150 वर्ष पूरे हो रहे हैं, यह केवल एक ऐतिहासिक अवसर नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक आत्मा के पुनः स्मरण का क्षण है। 1875 के आसपास बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने जब आनंदमठ उपन्यास में इस गीत को लिखा, तब उन्होंने केवल कविता नहीं रची — उन्होंने एक ऐसी राष्ट्रीय भावना का शंखनाद किया, जिसने समूचे भारत को एक सूत्र में बाँध दिया।
“वंदे मातरम्” उन दिनों में उच्चारित हुआ जब भारत कई टुकड़ों में बँटा था — न केवल भूगोल से, बल्कि भाषा, जाति और धर्म से भी। इस उद्घोष ने सबको यह एहसास कराया कि ‘माँ भारत’ केवल धरती का टुकड़ा नहीं, बल्कि हमारी सामूहिक चेतना का प्रतीक है। यही कारण था कि स्वतंत्रता संग्राम के दौरान जब कोई भारतीय “वंदे मातरम्” पुकारता था, तो वह केवल नारा नहीं, बल्कि बलिदान की प्रतिज्ञा होती थी।
ब्रिटिश शासन ने इस उद्घोष से भय खाया, क्योंकि यह नारा तलवारों से अधिक तेज था। सड़कों पर, जेलों में, सभा स्थलों पर — हर जगह “वंदे मातरम्” का गूंजना भारत की आत्मा के जागरण का प्रतीक बन गया। लाल-बाल-पाल से लेकर महात्मा गांधी, नेताजी सुभाष चंद्र बोस और भगत सिंह तक, हर स्वतंत्रता सेनानी के हृदय में इस गीत की गूंज थी।
राष्ट्रगान, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगीत जैसे प्रतीक भारतीयों के हृदय में विशेष स्थान रखते हैं। “वंदे मातरम” भी ऐसा ही एक प्रतीक है, जो देश की गौरवशाली एकता और देशभक्ति का प्रतिनिधित्व करता है। करोडों भारतीय आज भी “वंदे मातरम” से प्रेरणा लेते हैं, जिसने स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
भारत की संविधान सभा ने 24 जनवरी 1950 को इसे राष्ट्रगीत के रूप में घोषित किया। देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने स्पष्ट किया कि “वंदे मातरम” को राष्ट्रगान “जन गण मन” के समान सम्मान दिया जाना चाहिए। आज भी “वंदे मातरम” देशभक्ति और एकजुटता का प्रिय गीत बना हुआ है। जब हम भारत को माता कहते हैं, तो हमारा अभिप्राय केवल किसी भूभाग से नहीं, बल्कि एक सजीव, सचेत और दिव्य सत्ता से होता है, जो परमात्मा के गुणों का प्रतीक है। माता का स्वरूप दिव्यता, निःस्वार्थ प्रेम और स्नेह का परिचायक है, जो अपने सभी बच्चों, अच्छों और बुरों, के कल्याण और शांति की कामना करती है। ऐसी माता का अपमान कौन कर सकता है? इतिहास में आक्रमणकारियों ने कई संस्कृतियों को नष्ट किया और समाप्त कर दिया, लेकिन सनातन संस्कृति 200 से अधिक भयंकर आक्रमणों के बावजूद अक्षुण्ण बनी रही।
प्रत्येक नागरिक में यह भावना विकसित होती है कि “भारत माता” सर्वोपरि है। यह न केवल हमारे व्यक्तिगत जीवन में कृतज्ञता की भावना जगाता है, बल्कि यह स्वीकार करने के लिए प्रेरित करता है कि जीवन में जो कुछ भी हमने पाया है, वह भारत माता की कृपा और संरक्षण के कारण संभव हुआ। साथ ही यह हमें यह याद दिलाता है कि समाज और राष्ट्र के कल्याण के लिए प्रयास करना और उसकी सुरक्षा करना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है।
भारत की स्वतंत्रता और गौरव के प्रतीक के रूप में सबसे प्रसिद्ध और प्रेरक नारा है “वंदे मातरम”। 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से भी पहले, 1767-1800 के संन्यासी-फ़कीर विद्रोह के दौरान इसके अस्तित्व के संकेत मिलते हैं। भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के पूरे काल में यह नारा देशभक्तों द्वारा जनता को एकजुट करने और अपने देश के प्रति गर्व और सम्मान की भावना जगाने के लिए प्रयुक्त होता रहा।
स्वतंत्रता के बाद भी “वंदे मातरम्” का महत्व कम नहीं हुआ। संविधान सभा में इसे राष्ट्रीय गीत का दर्जा दिया गया। यह दर्जा केवल औपचारिक नहीं था — यह उस ऐतिहासिक स्वीकार का प्रतीक था कि भारत की आत्मा का स्वर यही गीत है।
आज जब हम 150 वर्ष बाद इसे स्मरण कर रहे हैं, हमें यह समझना होगा कि “वंदे मातरम्” का अर्थ केवल अतीत की महिमा नहीं, बल्कि भविष्य की दिशा भी है। यह हमें स्मरण कराता है कि राष्ट्रप्रेम केवल भावना नहीं, बल्कि कर्तव्य है।
डिजिटल युग के इस भारत में जब युवा पीढ़ी नई चुनौतियों का सामना कर रही है — आत्मनिर्भर भारत, तकनीकी विकास और सांस्कृतिक पुनर्जागरण — ऐसे समय में “वंदे मातरम्” की पुकार फिर हमें एकजुट करती है। यह हमें याद दिलाती है कि भारत माता की वंदना केवल शब्दों में नहीं, कर्म में भी होनी चाहिए।
आज हम गर्व के साथ उस स्वतंत्र, सबल और समर्थ भारत को देख रहे हैं, जिसका स्वप्न हमारे महान स्वतंत्रता सेनानियों ने देखा था। इस स्वप्न को साकार करने में प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में देश निरंतर आगे बढ़ रहा है। एक ओर केंद्र सरकार ने गरीब और वंचित वर्ग के जीवन स्तर को सुधारने के लिए घर, बिजली, स्वास्थ्य बीमा और स्वच्छता जैसी बुनियादी सुविधाएं सुनिश्चित की हैं, तो दूसरी ओर भारत को वैश्विक स्तर पर एक सशक्त राष्ट्र के रूप में स्थापित किया है।
ऐसे समय में जब राष्ट्रगीत ‘वंदे मातरम्’ अपने 150 वर्ष पूरे कर रहा है, यह अवसर हमारे राष्ट्रीय गौरव और एकता की भावना को पुनः जागृत करने का है। सात नवंबर को राजभाषा विभाग द्वारा इस ऐतिहासिक अवसर पर प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जा रहा है। इन आयोजनों में सरकारी कार्मिकों की सक्रिय भागीदारी यह दर्शाती है कि प्रशासनिक तंत्र भी राष्ट्रभक्ति की इस भावना को जन-जन तक पहुंचाने में अग्रणी भूमिका निभा रहा है। जब शासन और समाज दोनों स्तरों पर सहभागिता होती है, तो राष्ट्रीय उत्सव एक जन-आंदोलन का रूप ले लेता है।
आज वंदे मातरम् के 150 वर्ष पूरे होने पर हमें यह संकल्प लेना चाहिए कि प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी के आत्मनिर्भर भारत और विकसित भारत के सपने को साकार करने में हम सभी अपनी भूमिका निभाएँ। हमें भारत में निर्मित स्वदेशी उत्पादों का अधिक से अधिक उपयोग करना चाहिए, ताकि देश की अर्थव्यवस्था सुदृढ़ हो और भारत नए शिखरों को छुए।
वंदे मातरम् केवल एक गीत नहीं, बल्कि भारत की आत्मा का उद्घोष है — मातृभूमि के प्रति समर्पण, स्वाभिमान और त्याग की भावना का प्रतीक। इस अमर गीत की 150वीं वर्षगांठ पर हम सबको यह प्रण लेना चाहिए कि हम राष्ट्रहित को सर्वोपरि रखेंगे और अपने कर्म से भारत को विश्वगुरु बनाने में योगदान देंगे।

