कृष्णमोहन झा
बिहार विधानसभा चुनावों की मतगणना के अब तक घोषित परिणामों एवं ताजा रुझानों से इस नतीजे पर पहुंचना कठिन नहीं है कि बिहार में सत्ता पर काबिज होने का सुनहरा सपना संजोए बैठे विपक्षी महागठबंधन को जनता ने स्पष्ट तौर पर नकार दिया है। इस जनादेश का सबसे बड़ा संदेश यही है कि बिहार में बीस साल पहले के जंगल राज की कड़वी यादें राज्य की जनता के मानस पटल पर अभी भी ताज़ा हैं। चुनावों में पहली बार सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी भारतीय जनता पार्टी ने उस “जंगल राज” को इन चुनावों में मुख्य चुनावी मुद्दा बनाया था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपनी रैलियों में यह भरोसा जताया था कि बिहार की जनता जंगल राज के दिनों में कभी लौटना नहीं चाहेगी। बिहार के चुनाव परिणामों ने एक बार फिर यह भी साबित कर दिया है कि प्रधानमंत्री मोदी की करिश्माई लोकप्रियता इस देश में चुनाव जीतने की गारंटी बन चुकी है। जहां तक बिहार का संबंध है , इसमें दो राय नहीं हो सकती कि जनता दल यूनाइटेड के अध्यक्ष नीतीश कुमार ने भले ही बार बार पाला बदलकर नौ बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने का रिकॉर्ड बनाया हो लेकिन अभी भी वे बिहार की गरीब दलित आबादी के बीच सबसे लोकप्रिय चेहरा हें। इस हकीकत को स्वीकार करने में भारतीय जनता पार्टी ने कभी गुरेज नहीं किया इसीलिए जदयू के साथ उसके चुनावी गठबंधन में नीतीश कुमार हमेशा बड़े भाई की भूमिका में रहे। लेकिन इस बार यह बात विशेष रूप से रेखांकित किए जाने योग्य है कि बिहार विधानसभा चुनावों के इतिहास में पहली बार भारतीय जनता पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। बिहार में भाजपा की इस ऐतिहासिक जीत के बावजूद अभी इन संभावनाओं को ही बलवती माना जा रहा है कि बिहार में सर्वाधिक 9 बार मुख्यमंत्री पद का रिकार्ड कायम करने वाले जदयू के अध्यक्ष नीतीश कुमार को एक बार फिर मुख्यमंत्री की कुर्सी पर आसीन होने का सौभाग्य मिलेगा ।
बिहार के इन विधानसभा चुनावों पर सारे देश की नजरें टिकी हुई थीं और सत्तारूढ़ एनडीए और विपक्षी महागठबंधन , दोनों के लिए ये चुनाव प्रतिष्ठा का प्रश्न बन चुके थे। गौरतलब है कि देश के 17 से अधिक एजेंसियों ने अपने अपने एक्जिट पोल में एनडीए की शानदार विजय सुनिश्चित बता दी थी उधर दूसरी ओर विपक्षी महागठबंधन ने सारे एक्जिट पोल को नकारते हुए सत्ता से एनडीए की विदाई का दावा किया था । इन चुनावों में दोनों ही गठबन्धनोंं ने मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए लोक लुभावन घोषणाएं करने में कोई कसर नहीं छोड़ी ।गौरतलब है कि नीतीश सरकार ने महिलाओं के खाते में दस हजार की राशि जमा कर महिला मतदाताओं को प्रभावित करने का प्रयास किया तो दूसरी ओर चुनाव परिणामों की घोषणा के पूर्व ही खुद को भावी मुख्यमंत्री के रूप में पेश करने वाले राजद नेता एवं पूर्व उप-मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने हर परिवार को रोजगार का आश्वासन देकर युवा मतदाताओं के दिल जीतने की कोशिश की परंतु चुनाव परिणामों से यही संदेश मिलता है कि बिहार की जनता का नीतीश सरकार में भरोसा बरकरार है। विभिन्न राजनीतिक दलों को चुनाव रणनीतिकार के रूप में अपनी सेवाएं दे चुके प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी पहली बार चुनाव मैदान में उतरी थी परन्तु उसके उम्मीदवारों को जितने मत मिले उनसे केवल यही संदेश मिलता है कि प्रशांत किशोर की जनसुराज पार्टी चुनावों में अपनी मौजूदगी से किसी दल के वोट काटने में सफल नहीं हो पाई।
इन चुनाव परिणामों से बिहार में विपक्षी महागठबंधन के दो प्रमुख दलों कांग्रेस और राजद को गहरा सदमा पहुंचा है। उन्होंने एनडीए के हाथों महागठबंधन की इतनी शर्मनाक हार की कभी कल्पना नहीं की होगी। दरअसल राजद के तेजस्वी यादव ने तो यह घोषणा तक कर डाली थी कि 18 नवंबर को मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे। महागठबंधन की शर्मनाक हार से राहुल गांधी और तेजस्वी यादव सहित महागठबंधन के सभी घटक दलों को यह सबक लेना चाहिए कि उनके अति आत्मविश्वास ने उन्हें कहीं का नहीं रखा। इस हार के लिए यह कहकर चुनाव आयोग को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता कि उसने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण के माध्यम से उन लाखों मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा दिए जो महागठबंधन को सत्ता की दहलीज तक पहुंचा सकते थे। राहुल गांधी की वोट अधिकार यात्रा भी मतदाताओं को महागठबंधन के प्रति आकर्षित करने में असफल रही। ऐसा प्रतीत होता है कि “वोट चोर गद्दी छोड़” जैसे नकारात्मक नाऱों को भी जनता ने पसंद नहीं किया। महागठबंधन के दो प्रमुख दलों के अग्रणी नेताओं के रूप में राहुल गांधी और तेजस्वी यादव के बीच पर्याप्त तालमेल का अभाव भी महागठबंधन की शोचनीय हार का कारण बन गया। यह भी कम आश्चर्यजनक नहीं था कि जब बिहार में चुनाव प्रचार अभियान अपने अंतिम दौर में था तब राहुल गांधी कांग्रेस के प्रशिक्षण शिविर में भाग लेने के लिए पचमढ़ी चले गए।चुनाव प्रचार के बीच से राहुल गांधी के पचमढ़ी जाने पर मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव ने तंज भी किया था।
(लेखक राजनैतिक विश्लेषक है)


