नई दिल्ली। पूरे देश में प्रशांत किशोर की छवि एक ऐसे व्यक्तित्व के रूप में दर्ज है जिसने समय समय पर देश की सभी बड़ी पार्टियों के साथ जुड़कर उनका चुनाव प्रबंधन संभाला है और उन्हें चुनावी रण समर में विजय श्री भी दिलाई है। जिस भी राजनीतिक पार्टी के साथ वो जुड़े, उस राजनीतिक दल को प्रशांत किशोर के जुड़ने का फायदा मिला। अगर उपलब्धि का परसेंटेज देखेंगे तो यह 90% से ऊपर बैठता है। पहले 2014 में जब पहली बार नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री के कैंडिडेट के तौर पर लोकसभा का चुनाव लड़ रहे थे तो यह प्रशांत किशोर ही थे जो मोदी जी की छवि जनता के बीच गढ़ रहे थे। अपने चुनाव संबंधी आंकड़ें के अस्त्रों से वो जनता का नब्ज टटोलने तथा उसे अपने पक्ष में मोड़ने में माहिर हैं। तो क्या कारण है की बिहार में उनकी रणनीति फेल हो गई?प्रशांत किशोर पूरी शिद्दत के साथ बिहार में लगातार 3 साल जनता के बीच रहे। गांव गांव जाकर जनता की समस्याओं से रूबरू होते रहे अपनी बात जनता को बताते रहे, उनकी समस्याओं को समझते रहे और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और लालू और उनके बेटे तेजस्वी यादव पर बराबर निशाना साधते रहे। उन्होंने बिहार के चुनावी समर में जनता को तीसरा विकल्प देने की कोशिश की। मीडिया ने भी उनको गहराई से लिया उनकी बातों को प्रमुखता से रखा। कैंडिडेट भी उन्होंने अच्छे दिए, सभी को शिक्षा व बिहार को बेरोजगारी, पलायन से बचाने का मुद्दा उठाया और उससे लड़ने के लिए एक विजन प्रस्तुत किया। परंतु ऐसा क्यों हुआ यह जानने के लिए बिहार जनता का मूड पढ़ना जरूरी है और इस केस को भी देश के राजनीति में एक केस स्टडी माना जाएगा। सब कुछ ठीक चल रहा था। जनता प्रशांत किशोर की बात सुन रही थी, उनकी सभाओं में भीड़ भी काफी जुड़ रही थी। आज से महज़ एक महीने पहले जब महागठबंधन में राजद और कांग्रेस के बीच में खटपट चल रही थी और उस वक्त प्रशांत किशोर भाजपा और जदयू के बड़े नेताओं पर हमलावर थे और एक-एक बड़े नेताओं की बखिया उधेड़ रहे थे तो लग रहा था की असली विपक्ष की भूमिका प्रशांत किशोर की पार्टी जन सुराज ही निभा रही है। परंतु अचानक प्रशांत किशोर एक भारी गलती कर बैठे और वही गलती चुनाव में पूरे जन सुराज पार्टी को लेकर डूब गई। यह गलती थी उनके स्वयं का चुनाव न लड़ने का डिसीजन।
वैसे तो प्रशांत जी ने दो गलतियां की हैं। पहला स्वयं को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित न करना तथा दूसरा जनता को आशा और विश्वास दिला कर स्वयं को चुनाव न लड़ने का डिसीजन लेना। प्रशांत किशोर जी को अतीत से सबक लेना चाहिए था। शायद उस पर उन्होंने ठीक से गौर नहीं किया। उन्होंने जिस भी पार्टी का इलेक्शन कैंपेन किया है। हर उस पार्टी का एक मुख्यमंत्री कैंडिडेट था। वही उत्तर प्रदेश में वह कांग्रेस के समर्थन में कुछ नहीं कर पाए क्योंकि वहां कोई चेहरा नहीं था।
बिहार में किशोर ने यह समझकर अपने आप को मुख्यमंत्री या कैंडिडेट नहीं बनाया क्योंकि वह अगड़ी जाती ब्राह्मण वर्ग से आते थे। यह उनकी भूल साबित हुई। बिहार की जनता का मिजाज जरा लड़ाकू किस्म का है। वह प्रशांत किशोर को एनडीए के विरुद्ध लड़ते हुए देखना चाहती थी। प्रशांत किशोर ने पहले जनता में यह भरम फैलाया कि वह अपने गृह जिला रोहतास के करहगर सीट से लड़ेंगे या फिर राघोपुर सीट से तेजस्वी यादव के खिलाफ ताल ठोक सकते हैं। वे राघोपुर पहुंचे भी, लेकिन अचानक उन्होंने अपने चुनाव न लड़ने की घोषणा कर दी। भाजपा जैसे प्रमुख दलों ने उनके चुनाव न लड़ने को मुद्दा बना दिया। रविशंकर प्रसाद ने तो बजाप्ता बयान जारी कर प्रशांत किशोर पर हार के डर से मैदान छोड़कर भाग जाने का आरोप लगाया तथा आरोप प्रत्यारोप छोड़कर उन्हें चुनाव लड़ने की चुनौति भी दी। उनके चुनाव न लड़ने की घोषणा ने सारा फर्क पैदा किया। इससे मतदाताओं के बीच गलत मैसेज गया। इनके कैंडिडेट का भी मनोबल गिरा। रही सही कसर एनडीए के शीर्ष नेताओं ने (उनकी पार्टी के पांच कैंडिडेट का नाम वापस करवा के) उतार दी! चुनाव में इनके कुछ कैंडीडेट्स ने अपने दम पर लड़ने की कोशिश भी की पर उन्हें उतना समर्थ नहीं था, उतनी ऊर्जा नहीं बची थी। अत: सभी सीटों पर जन सुराज पार्टी को हार झेलना पड़ा।

