कई शताब्दियों में दरभंगा राज परिवार से बड़ा दानी परिवार पूरे भारत में कोई शायद ही हुआ….

नई दिल्ली। विगत कई शताब्दियों में दरभंगा राज परिवार से बड़ा दानी परिवार पूरे भारत में कोई शायद ही हुआ है। तत्कालीन भारत के सबसे धनी परिवारों में से एक दरभंगा महाराज भारत के सबसे बड़े उद्योगपति और सबसे बड़े दानी थे। एक वक्त था की महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह तत्कालीन भारत के सबसे बड़े राजनीतिज्ञ थे, भारत के पहले जनप्रतिनिधि थे।
लोग भारत चीन युद्ध के समय 600 किलो सोना दान करने और सेना को 2 हवाई जहाज दान करने की जानकारी से अचंभित हो रहे हैं जबकि सत्य ये है की राज परिवार द्वारा किए गए कार्यों के सामने ये बहुत छोटा अंश था।
दरभंगा महाराज लक्ष्मीश्वर सिंह कांग्रेस के संस्थापक सदस्य थे। 1888 में कांग्रेस सत्र इलाहाबाद में होना था, अंग्रेजी सरकार ने निषेधा लगा दिया की किसी सार्वजनिक जगह पर कार्यक्रम नहीं हो सकता है। देशभर से कार्यकर्ता आने वाले थे, अब सार्वजनिक मैदान नहीं मिलेगा तो लोग कहां जुटेंगे, सब चिंतित थे। दरभंगा महाराज ने रातों रात इलाहाबाद का सबसे बड़ा महल खरीद लिया, अगले दिन उसी परिसर में कांग्रेस का भव्य कार्यक्रम हुआ, कार्यक्रम के बाद महाराज ने वो महल कांग्रेस को ही दान कर दिया।
बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी के स्थापना में सब मदन मोहन मालवीय का नाम लेते हैं, लेकिन कोई नहीं बताता की दरभंगा महाराज यूनिवर्सिटी स्थापना के सबसे बड़े आर्थिक सहयोगी थे, उन्हीं के रिफरेंस से देशभर के महाराजाओ ने विश्वविद्यालय के लिए दान दिया। युनिवर्सिटी स्थापना के लिए जो हिंदू यूनिवर्सिटी सोसाइटी की स्थापना हुई थी उसके प्रेजिडेंट महाराज रामेश्वर सिंह ही थे। स्थापना के लिए फंड लक्ष्य था 1 करोड़ जुटाना, अकेले महाराज ने पहला डोनर बन 50 लाख रुपया एकमुश्त दिया।
सिर्फ BHU नहीं बल्कि अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के स्थापना में भी दरभंगा महाराज सबसे बड़े गैर मुस्लिम डोनर थे। कलकत्ता यूनिवर्सिटी से लेकर पटना यूनिवर्सिटी तक, PUSA कृषि विश्वविद्यालय से लेकर DMCH तक, PMCH से लेकर अलाहाबाद विश्विद्यालय तक। हरेक के स्थापना में दरभंगा राज परिवार का सबसे बड़ा योगदान है।
बंगाल से अलग बिहार राज्य बनाने के आंदोलन में दरभंगा महाराज का बड़ा योगदान था। आर्थिक सहयोग के अलावा आंदोलन को राजनीतिक शक्ति देने में भी महाराज आगे थे। जब नया बिहार राज्य बना था 1912 में तो राजधानी हेतु ‘पटना’ नहीं बल्कि ‘कटक’ प्रस्तावित था। महाराज दरभंगा रामेश्वर सिंह ने अपनी संपूर्ण शक्ति झोंक दिया की पटना को राजधानी बनाइए, जब जाकर पटना राजधानी बना। दरभंगा महाराज ने अपना भवन दिया जिसमें से कई सालों तक टेंपररी शासन व्यवस्था चला। 1920 में महाराज ने 5 लाख रुपया (सिंगल लार्जेस्ट डोनर) दिया तो PMCH बना, पटना यूनिवर्सिटी को अपना नवलखा पैलेस दिया।
आज भी दरभंगा राज के दो राजमहलों में दो विश्वविद्यालय चल रहा है। वो राज परिवार जिसने 70 साल पहले अपने राजधानी के बीचों बीच 250 एकड़ परिसर में अस्पताल बनवाया था। उनके बनाए एयरपोर्ट्स दरभंगा और पूर्णिया में उस वक्त भी एक्टिव हवाई सेवा थी। उनके काल में रेलवे, बिजली जैसी चीजें दिल्ली के समकाल में दरभंगा आ गई थी। महाराज हिंदी में आर्यावर्त, इंग्लिश में इंडियन नेशन और मैथिली में मिथिला मिहिर नाम से अखबार चलाते थे।
अपने समय के सबसे बड़े विद्वानों और प्रभावशाली व्यक्तियों मे शुमार महाराज रामेश्वर सिंह के पुत्र कामेश्वर सिंह भी अपने समय मे देश मे कमाल के प्रभावशाली थे। देश के 10 सबसे धनी व्यक्तियों मे उनका नाम था, राजनीतिक हैशियत कितनी महत्वपूर्ण थी ये इससे समझा जा सकता है की प्रथम और द्वितीय गोलमेज़ सम्मेलन के लिए गांधीजी के साथ लंदन-जाने वाले टीम मे थे। विजनरी इतने की चीनी, जुट, कॉटन, कोल, रेलवे, आइरन-स्टील, एविएशन, प्रिंट मीडिया, एलेक्ट्रिसीटी, बैंक जैसे अपने समय के 14 सबसे बड़े औद्यौगिक उपक्रमों को कंट्रोल करते थे। जमशेदपुर में टाटा स्टील की स्थापना से लेकर तत्कालीन भारत के सभी औद्योगिक उपक्रमों में राज परिवार की हिस्सेदारी थी। राजनीतिक पैठ इतनी की काउंसिल ऑफ द स्टेट्स, कोन्स्टिटूएंट असेंबली ऑफ इंडिया जैसे ग्रुप्स के मेम्बर्स रहे, 1933 मे मोस्ट एमिन्नेंट ऑर्डर ऑफ इंडियन एम्पाइर के रूप मे मानद मिली थी। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद संविधान बनाने वाली भारत के संविधान सभा के सदस्य थे। मैथिली महासभा, श्री भारत-धर्म महामंडल, बिहार लईन्द्लोर्ड्स के लाइफटाइम प्रेसिडेंट और स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद मृत्यु तक राज्यसभा के सदस्य रहे।
आज मिथिला और बिहार का स्थिति शायद कुछ और होता यदि दरभंगा महाराज कामेश्वर सिंह जी का कोई उत्तराधिकारी या पुत्र होता। 5 लाख करोड़ से अधिक की संपत्ति उत्तराधिकारी के ना होने की वजह से ट्रस्टियों द्वारा बर्बाद कर दिया गया। कई लोग कह सकते हैं की महाराज की संपत्ति से मिथिला और बिहार को क्या फायदा होता। लेकिन सत्य ये है की वर्तमान में बिहार की एक बड़ी समस्या है “किसी बड़े पूंजीपति का न होना”। राज परिवार की जो पूंजी हर जगह बर्बाद कर दिया गया, छिन्न-भिन्न और लूट-पाट कर लिया गया, यदि एक जगह संचित होता तो जरूर वो किसी न किसी तरह बिहार के औद्योगिकरण और भलाई में ही लगा होता। दरभंगा महाराज के लगाए चीनी मिल, पेपर मिल, खाद मिल, सूत मिल, जुट मिल जब बंद हुआ तो उससे नुकसान सिर्फ राज परिवार को थोड़े हुआ, बल्कि नुकसान पूरे बिहार के लोगों को हुआ।
स्वर्गीय दरभंगा महाराज कामेश्वर सिंह की पत्नी महारानी कामसुंदरी जी का आज द्वादश कर्म है। विगत 11 जनवरी को उनका निधन हुआ था। नमन एवम कृतज्ञ श्रद्धांजलि।
(साभार : फेसबुक)

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