नई दिल्ली। समकालीन हिंदी काव्य-जगत में एक सार्थक और मूल्यपरक हस्तक्षेप के रूप में अन्तर्ध्वनि का प्रकाशन उल्लेखनीय है। डायमंड पॉकेट बुक्स द्वारा प्रकाशित यह कृति प्रख्यात शिक्षिका एवं साहित्यकार स्मृति श्रीवास्तव का तृतीय काव्य-संग्रह है, जो आस्था, राष्ट्रप्रेम, प्रकृति-संवेदना और सामाजिक चेतना को एक समन्वित काव्य-दृष्टि में प्रस्तुत करता है।
हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के पश्चात स्मृति श्रीवास्तव ने अपना जीवन हिंदी भाषा, भारतीय संस्कृति और मानवीय मूल्यों के संवर्धन हेतु समर्पित किया है। नई दिल्ली के सेंट थॉमस स्कूल में दो दशकों तक हिंदी एवं संस्कृत अध्यापन, दिल्ली विश्वविद्यालय के नेत्रहीन विद्यार्थियों के लिए दुर्लभ ग्रंथों का वाचन-रिकॉर्डिंग तथा वंचित महिलाओं के लिए सामाजिक सक्रियता—इन विविध अनुभवों की गहन मानवीय संवेदना “अन्तर्ध्वनि” की कविताओं में सजीव रूप से अभिव्यक्त हुई है।
संग्रह का शीर्षक स्वयं में दार्शनिक अर्थवत्ता लिए हुए है। ‘ध्वनि’ जहाँ बाह्य अभिव्यक्ति है, वहीं ‘अन्तर्ध्वनि’ अंतःकरण की वह सूक्ष्म तरंग है जो व्यक्ति को आत्मावलोकन की ओर प्रेरित करती है। भूमिका में उल्लिखित ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः’ का भाव पूरे संग्रह का नैतिक अधिष्ठान निर्मित करता है। यह कृति किसी एक विषय तक सीमित न रहकर भक्ति, प्रकृति, राष्ट्रभाव, सामाजिक सरोकार और अंतर्मन के सूक्ष्म द्वंद्वों तक विस्तृत काव्य-परिसर रचती है।
संग्रह का प्रारंभ गणेश वंदना से होता है और माँ सरस्वती, नमामि शंकर तथा दुर्गा स्तुति के माध्यम से भारतीय अध्यात्म की सांस्कृतिक निरंतरता को स्थापित करता है। कवयित्री की भक्ति-दृष्टि पलायनवादी न होकर सकारात्मक ऊर्जा का स्रोत है, जो व्यक्ति को करुणा, समभाव और लोकमंगल की भावना से जोड़ती है। “जग में चहुँ दिश आनंद सरसे, सबके आँगन आशीष बरसे” जैसी पंक्तियाँ उनके सार्वभौमिक मंगलकामना भाव को उद्घाटित करती हैं।
“पर्व-पुष्पांजलि” खंड भारतीय उत्सव-परंपरा का काव्यात्मक दस्तावेज प्रस्तुत करता है। नूतन वर्ष, मकर संक्रांति, रक्षाबंधन, हरतालिका तीज और शिक्षक दिवस जैसे पर्वों को केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सांस्कृतिक एकात्मता के प्रतीक के रूप में चित्रित किया गया है। विभिन्न प्रांतों में अलग-अलग नामों से मनाए जाने वाले उत्सवों के माध्यम से कवयित्री भारतीय संस्कृति की विविधता में निहित एकता को रेखांकित करती हैं।
“मातृभूमि के गौरव” खंड में राष्ट्रभाव की ओजस्वी अभिव्यक्ति दृष्टिगोचर होती है। स्वतंत्रता सेनानियों और शहीदों की स्मृति केवल ऐतिहासिक उल्लेख नहीं, बल्कि नैतिक प्रेरणा का स्रोत बनकर उभरती है। यहाँ राष्ट्रप्रेम उग्र भाव नहीं, बल्कि कृतज्ञता, उत्तरदायित्व और विश्वबंधुत्व की भावना के साथ अभिव्यक्त होता है।
पर्यावरणीय चेतना पर केंद्रित “हरित धरा का आह्वान” संग्रह की विशिष्ट उपलब्धि है। “पृथ्वी को सांस लेने दो” और “पर्वत पुकार रहे हैं” जैसी कविताएँ प्रकृति के अति-दोहन पर संवेदनशील टिप्पणी प्रस्तुत करती हैं। धरती का नारी-रूपक के माध्यम से मानवीकरण कर कवयित्री पारिस्थितिक संतुलन की आवश्यकता पर बल देती हैं। गिरती पत्तियों, रिमझिम वर्षा, शरद की शीतलता और तारों की रागिनी के माध्यम से प्रकृति एक जीवंत संवादिनी के रूप में उभरती है।
“जागृति के स्वर” खंड समकालीन सामाजिक यथार्थ से संवाद स्थापित करता है। डिजिटल संस्कृति की आभासी संवेदनाओं, बदलते सामाजिक मूल्यों, स्त्री-सशक्तिकरण, पारिवारिक संबंधों और नैतिक दुविधाओं पर आधारित कविताएँ विचारोत्तेजक विमर्श प्रस्तुत करती हैं। वहीं अंतिम खंड “अंतर्मन के दीप” आत्मसंवाद और भाव-गहराई का सशक्त उदाहरण है, जहाँ जीवन की एकरसता, स्मृतियों की ऊष्मा, सपनों की शक्ति और आत्मसंतोष जैसे विषयों का संवेदनात्मक चित्रण मिलता है।
काव्य-शिल्प की दृष्टि से “अन्तर्ध्वनि” सहज, संप्रेषणीय और लयात्मक है। अलंकारों का संयमित प्रयोग और भावों की प्रामाणिकता पाठक के साथ सीधा संवाद स्थापित करती है। यह संग्रह बौद्धिक विश्लेषण के साथ-साथ भावनात्मक स्पर्श भी प्रदान करता है।

