सी एम दुबे
भारतीय जनता पार्टी को लंबे समय तक देश और मध्यप्रदेश की राजनीति में “ब्राह्मण-बनिया नेतृत्व वाली पार्टी” के रूप में देखा जाता रहा है। जनसंघ के दौर से लेकर भाजपा के उत्कर्ष तक ब्राह्मण समाज ने न केवल पार्टी को वैचारिक आधार प्रदान किया, बल्कि संगठन और नेतृत्व के स्तर पर भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मध्यप्रदेश की राजनीति में यह भूमिका और भी अधिक प्रभावशाली रही है।
राज्यसभा के हालिया चुनावों ने एक बार फिर इस प्रश्न को राजनीतिक विमर्श के केंद्र में ला खड़ा किया है कि क्या भाजपा में ब्राह्मण नेतृत्व का प्रभाव लगातार कम होता जा रहा है? क्या वह समाज, जिसने भाजपा को खड़ा करने और विस्तार देने में महत्वपूर्ण योगदान दिया, आज स्वयं को राजनीतिक रूप से उपेक्षित महसूस कर रहा है?
मध्यप्रदेश से भाजपा ने समय-समय पर अनेक प्रतिष्ठित ब्राह्मण नेताओं को राज्यसभा भेजा। देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी भाजपा और जनसंघ की राजनीति में ब्राह्मण नेतृत्व के सबसे बड़े प्रतीक रहे। मध्यप्रदेश से लक्ष्मीनारायण शर्मा, रघुनंदन शर्मा, प्रभात झा और शिवप्रताप (शिवप्रसाद) चिंपुरिया जैसे नेताओं को भी पार्टी ने राज्यसभा में भेजकर सम्मानित किया। इन नेताओं ने केवल संसद में प्रदेश का प्रतिनिधित्व नहीं किया, बल्कि भाजपा की वैचारिक और राजनीतिक पहचान को भी मजबूत किया।
लेकिन पिछले लगभग एक दशक की तस्वीर अलग दिखाई देती है।
मध्यप्रदेश भाजपा से राज्यसभा जाने वाले सांसदों की सूची पर नजर डालें तो स्पष्ट होता है कि पार्टी ने सामाजिक विस्तार की रणनीति के तहत अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़ा वर्ग और अन्य सामाजिक समूहों को प्राथमिकता दी है। यह राजनीतिक दृष्टि से स्वाभाविक और आवश्यक भी माना जा सकता है, लेकिन इसी अवधि में ब्राह्मण समाज का प्रतिनिधित्व लगभग समाप्त होता दिखाई देता है।
हालिया राज्यसभा चुनाव में भी यही स्थिति देखने को मिली। राजनीतिक गलियारों में पूर्व गृह मंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा, पूर्व केंद्रीय मंत्री अनूप मिश्रा और वरिष्ठ नेता सुरेश पचौरी के नामों की चर्चा थी। इन तीनों नेताओं की राजनीतिक स्वीकार्यता, अनुभव और संगठनात्मक योगदान किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं। इसके बावजूद पार्टी ने उन्हें अवसर नहीं दिया। यही वह बिंदु है जिसने ब्राह्मण समाज के भीतर असंतोष की चर्चा को जन्म दिया है।
ब्राह्मण समाज के नेता पुष्पेंद्र मिश्रा ने तो यहां तक आरोप लगाया है कि भाजपा ने ब्राह्मण नेतृत्व की लगातार उपेक्षा कर समाज की भावनाओं को ठेस पहुंचाई है। उनका कहना है कि कभी ब्राह्मण और वैश्य नेतृत्व के मजबूत समन्वय के लिए पहचानी जाने वाली पार्टी अब केवल वैश्य नेतृत्व केंद्रित होती जा रही है।
यद्यपि भाजपा नेतृत्व इस आरोप से सहमत नहीं होगा। पार्टी का तर्क है कि उसका उद्देश्य सभी सामाजिक वर्गों को प्रतिनिधित्व देना है और राज्यसभा का चयन जातीय आधार पर नहीं बल्कि राजनीतिक एवं संगठनात्मक आवश्यकताओं के आधार पर किया जाता है। यह तर्क अपनी जगह उचित भी है।
लेकिन राजनीति केवल तर्कों से नहीं चलती, धारणाओं से भी चलती है।
यही कारण है कि आज भाजपा के परंपरागत समर्थक वर्गों में यह प्रश्न उठ रहा है कि यदि पार्टी ने पिछले एक दशक में एक भी प्रमुख ब्राह्मण चेहरे को राज्यसभा के माध्यम से राष्ट्रीय राजनीति में अवसर नहीं दिया, तो इसके पीछे क्या कारण हैं? क्या यह केवल संयोग है या फिर पार्टी की सामाजिक प्राथमिकताओं में कोई बड़ा बदलाव आया है?
यह भी ध्यान रखना होगा कि ब्राह्मण समाज केवल एक जातीय समूह नहीं, बल्कि भाजपा के वैचारिक आधार का भी महत्वपूर्ण हिस्सा रहा है। जनसंघ से लेकर भाजपा तक संगठन के विस्तार, बौद्धिक विमर्श और राजनीतिक नेतृत्व में इस समाज की भूमिका हमेशा उल्लेखनीय रही है। ऐसे में यदि उपेक्षा की भावना गहराती है तो उसका असर केवल चुनावी गणित तक सीमित नहीं रहेगा।
मध्यप्रदेश में भाजपा आज निर्विवाद रूप से सबसे मजबूत राजनीतिक शक्ति है। लेकिन किसी भी बड़े राजनीतिक दल की स्थायी सफलता का आधार केवल नए सामाजिक समूहों को जोड़ना नहीं होता, बल्कि अपने पारंपरिक समर्थकों का विश्वास बनाए रखना भी होता है।
राज्यसभा चुनाव के बाद उठी यह बहस भाजपा के लिए आत्ममंथन का अवसर भी है। सामाजिक विस्तार आवश्यक है, लेकिन सामाजिक संतुलन उससे भी अधिक आवश्यक है। आने वाले समय में पार्टी के निर्णय यह तय करेंगे कि यह असंतोष केवल राजनीतिक चर्चा बनकर रह जाता है या फिर एक व्यापक सामाजिक-राजनीतिक विमर्श का रूप लेता है।
आज सबसे बड़ा प्रश्न यही है—क्या भाजपा में ब्राह्मण नेतृत्व का स्थान बदल रहा है, या फिर यह केवल प्रतिनिधित्व के एक अस्थायी अंतराल की कहानी है? इसका उत्तर भविष्य की राजनीतिक नियुक्तियों और निर्णयों में छिपा है।
(लेखक विचारक हैं।)


