नई दिल्ली। सुप्रसिद्ध साहित्यकार शकुंतला मित्तल ने कहा कि भवानी प्रसाद मिश्र की कृति ‘त्रिकाल संध्या’ केवल एक कविता संग्रह नहीं, बल्कि आपातकाल की क्रूरता और लोकतांत्रिक मूल्यों पर हुए हमलों के विरुद्ध साहित्यिक प्रतिरोध का ऐतिहासिक दस्तावेज है। उन्होंने कहा कि इस संग्रह में कवि केवल शिकायत नहीं करते, बल्कि अपनी कविताओं को ही अन्याय के विरुद्ध संघर्ष का सशक्त माध्यम बना देते हैं और घने अंधकार में भी आशा तथा उजाले का मार्ग दिखाते हैं।
वे शनिवार को अखिल भारतीय साहित्य परिषद् से संबद्ध इंद्रप्रस्थ साहित्य भारती द्वारा प्रवासी भवन, नई दिल्ली में आयोजित भवानी प्रसाद मिश्र कृत ‘त्रिकाल संध्या (आपातकाल की कविताएं)’ पर केंद्रित पुस्तक-चर्चा कार्यक्रम को संबोधित कर रही थीं।
आपातकाल की पीड़ा और प्रतिरोध का सशक्त चित्रण
शकुंतला मित्तल ने कहा कि इस पुस्तक में कवि ने वर्ष 1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल के दौरान उत्पन्न परिस्थितियों को अपनी पीड़ा, आक्रोश, वेदना और प्रतिरोध के माध्यम से अत्यंत सरल, किंतु प्रभावशाली भाषा में अभिव्यक्त किया है। उन्होंने कहा कि यह काव्य-संग्रह लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के पक्ष में एक मजबूत साहित्यिक हस्तक्षेप है।
सेंसरशिप के दौर में कविता बनी प्रतिरोध की आवाज
वरिष्ठ साहित्यकार सुरेन्द्र कुमार अरोड़ा ने कहा कि जब आपातकाल के दौरान देश में बड़े पैमाने पर गिरफ्तारियां हुईं, प्रेस पर सेंसरशिप लागू की गई और लोकतांत्रिक अधिकारों का दमन किया गया, तब भवानी प्रसाद मिश्र प्रतिदिन नियमित रूप से सुबह, दोपहर और शाम (त्रिकाल) कविता लिख रहे थे। उन्होंने कहा कि यह अनुशासन उनके क्रांतिकारी व्यक्तित्व और लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति अटूट प्रतिबद्धता का परिचायक था।
भय के माहौल में भी नहीं रुकी कलम
साहित्यकार डॉ. नवीन नीरज ने कहा कि आपातकाल के समय अनेक लेखक और कवि सत्ता के दबाव में मौन हो गए थे, लेकिन भवानी प्रसाद मिश्र ने ‘त्रिकाल संध्या’ के माध्यम से लगातार कविताएं लिखकर सार्थक और निर्भीक प्रतिरोध दर्ज कराया।
युवा लेखिका गुंजन शर्मा ने कहा कि जटिल और भयावह परिस्थितियों के बावजूद भवानी प्रसाद मिश्र ने अपनी सहज भाषा, सरल शैली और आम जन की अभिव्यक्ति को नहीं छोड़ा। यही उनकी रचनाओं की सबसे बड़ी शक्ति है।
वहीं युवा पत्रकार विवेक वशिष्ठ ने कहा कि ‘त्रिकाल संध्या’ स्वतंत्रता, लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की आजादी के दमन के विरुद्ध लिखा गया भारतीय साहित्य का एक ऐतिहासिक काव्य-प्रतिरोध है।
साहित्यकारों और युवा रचनाकारों की रही सहभागिता
कार्यक्रम का संचालन दिल्ली विश्वविद्यालय की सहायक प्राध्यापक मोनिका जायसवाल ने किया। इस अवसर पर अखिल भारतीय साहित्य परिषद् के केंद्रीय कार्यालय सचिव संजीव सिन्हा, इंद्रप्रस्थ साहित्य भारती के प्रांत टोली सदस्य मुन्ना रजक, शिवम पांडेय, वैभव कृष्ण तिवारी तथा विकास आनंद सहित अनेक साहित्यकार, शोधार्थी और युवा रचनाकार उपस्थित रहे।
कार्यक्रम में वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि ‘त्रिकाल संध्या’ आज भी लोकतांत्रिक मूल्यों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अन्याय के विरुद्ध साहित्य की भूमिका को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण और प्रासंगिक कृति है।

