कृष्णमोहन झा
बांग्लादेश में हिन्दू समुदाय के साथ हो रही घटनाएं अब किसी “आंतरिक कानून-व्यवस्था” का विषय नहीं रहीं। यह अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारों की खुली अवहेलना अल्पसंख्यकों के विरुद्ध सुनियोजित हिंसा और वैश्विक नैतिकता की कठोर परीक्षा बन चुकी हैं। जब एक हिन्दू विधवा के साथ सामूहिक दुष्कर्म कर उसके बाल काट दिए जाते हैं और उसे पेड़ से बांध दिया जाता है, जब एक हिन्दू नागरिक की हत्या कर दी जाती है, जब एक स्थानीय अख़बार के संपादक को केवल इसलिए सिर में तीन गोलियां मार दी जाती हैं क्योंकि उसने सच लिखने का साहस किया—तो यह केवल अपराध नहीं, बल्कि सभ्यता के विरुद्ध अपराध (Crime against Civilization) है।
सबसे भयावह तथ्य यह है कि ये घटनाएं अपवाद नहीं हैं। वर्षों से बांग्लादेश में हिन्दुओं के विरुद्ध हमले, हत्याएं, महिलाओं के साथ यौन हिंसा, मंदिरों पर हमले, जबरन पलायन और भय का वातावरण—लगातार रिपोर्ट होते रहे हैं। हर घटना के बाद आश्वासन दिए जाते हैं, जांच के वादे होते हैं, लेकिन ज़मीन पर हिन्दुओं की असुरक्षा जस की तस बनी रहती है।
संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार घोषणा, अंतरराष्ट्रीय नागरिक एवं राजनीतिक अधिकार संधि (ICCPR) और अल्पसंख्यक अधिकारों से जुड़े तमाम वैश्विक दस्तावेज स्पष्ट कहते हैं कि धर्म, आस्था और पहचान के आधार पर किसी भी समुदाय को हिंसा, भेदभाव और उत्पीड़न से बचाना राज्य का दायित्व है| प्रश्न यह है कि क्या बांग्लादेश इस दायित्व का निर्वाह कर पा रहा है? या फिर राज्य की कमजोरी—या मौन सहमति—हिंसक तत्वों को खुली छूट दे रही है?जब किसी देश में एक समुदाय की महिलाएं बार-बार यौन हिंसा का शिकार होती हैं, उनकी धार्मिक पहचान के कारण उन्हें निशाना बनाया जाता है, और दोषियों को दंड नहीं मिलता—तो वह स्थिति Systematic Persecution की श्रेणी में आती है। यह केवल मानवाधिकार उल्लंघन नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय चिंता का विषय है।
मानवाधिकार इतिहास बताता है कि जब किसी समुदाय को भयभीत कर तोड़ना होता है, तो महिलाओं को निशाना बनाया जाता है। बांग्लादेश में हिन्दू महिलाओं के साथ हो रही हिंसा को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। एक विधवा के साथ सामूहिक दुष्कर्म, उसके बाल काटना, सार्वजनिक अपमान—यह सब केवल व्यक्तिगत अपराध नहीं, बल्कि सामूहिक आतंक फैलाने की रणनीति है। यह सवाल अंतरराष्ट्रीय महिला अधिकार संगठनों से भी है—क्या महिला अधिकार केवल कुछ भौगोलिक क्षेत्रों या कुछ पहचानों तक सीमित हैं? क्या हिन्दू महिला होना वैश्विक संवेदना को कम कर देता है?
एक स्थानीय अख़बार के हिन्दू संपादक की हत्या—जिसे सिर में तीन गोलियां मारी गईं—केवल एक पत्रकार की हत्या नहीं है। यह स्वतंत्र पत्रकारिता लोकतंत्र और सत्य के अधिकार पर सीधा हमला है। अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार, पत्रकारों की हत्या राज्य की विफलता मानी जाती है। जब हत्याएं होती हैं और दोषी बच निकलते हैं, तो संदेश साफ होता है सच बोलोगे तो मारे जाओगे|
यह प्रश्न अंतरराष्ट्रीय मीडिया संगठनों और प्रेस फ्रीडम इंडेक्स तैयार करने वाली संस्थाओं से भी है—क्या हिन्दू पत्रकार की हत्या उनकी प्राथमिकताओं में आती है? बांग्लादेश में हिन्दू जनसंख्या का लगातार घटना—यह किसी प्राकृतिक जनसांख्यिकीय परिवर्तन का परिणाम नहीं है। यह डर, हिंसा और असुरक्षा से उपजा मौन पलायन है। इतिहास गवाह है कि जब कोई समुदाय अपने ही घर में सुरक्षित नहीं रहता, तो वह या तो झुकता है या पलायन करता है। यह स्थिति किसी भी सभ्य समाज के लिए चेतावनी होनी चाहिए।
यह प्रश्न केवल बांग्लादेश तक सीमित नहीं है। यह प्रश्न भारत का है—उस भारत का, जो स्वयं को सनातन सभ्यता का केंद्र और लोकतांत्रिक मूल्यों का संरक्षक मानता है। यदि हम सांस्कृतिक रूप से हिन्दू राष्ट्र के नैतिक नेतृत्व की बात करते हैं, तो सीमाओं के पार पीड़ित हिन्दुओं के प्रति संवेदनहीनता कोई विकल्प नहीं हो सकती
यह न तो युद्ध की मांग है, न हस्तक्षेप की घोषणा। यह नैतिक हस्तक्षेप की मांग है अंतरराष्ट्रीय मंचों पर स्पष्ट और निरंतर आवाज़ संयुक्त राष्ट्र और मानवाधिकार परिषद में औपचारिक मुद्दा बांग्लादेश सरकार से जवाबदेही और पीड़ितों को यह भरोसा कि वे अकेले नहीं हैं| यह भी एक असहज सत्य है कि वैश्विक मानवाधिकार विमर्श चयनात्मक संवेदनशीलता से ग्रस्त है। कुछ क्षेत्रों और कुछ समुदायों पर अत्याचार होते ही दुनिया जाग जाती है। लेकिन जब हिन्दू अल्पसंख्यक पीड़ित होते हैं, तो वही दुनिया असहज चुप्पी ओढ़ लेती है।क्या मानवाधिकारों की परिभाषा धर्म देखकर तय होती है?क्या पीड़ित की पहचान तय करती है कि उस पर कितनी चर्चा होगी?इतिहास बताता है कि अत्याचार केवल हथियारों से नहीं होते—वे मौन से भी होते हैं। जब समाज, राष्ट्र और विश्व पीड़ित की चीख पर चुप रहते हैं, तब अत्याचारी को वैधता मिलती है। बांग्लादेश में आज जो हो रहा है, वह केवल वहां के हिन्दुओं की नहीं, बल्कि पूरी मानवता की परीक्षा है।
यह समय बयान जारी करने का नहीं, दृढ़ कार्रवाई और स्पष्ट नैतिक पक्ष लेने का है। यदि आज भी अंतरराष्ट्रीय समुदाय, मानवाधिकार संगठन और लोकतांत्रिक राष्ट्र चुप रहते हैं, तो इतिहास उन्हें निर्दोष नहीं मानेगा।बांग्लादेश के हिन्दू कोई पराए नहीं हैं। उनका दर्द किसी दूसरे देश का आंतरिक मामला नहीं है।यह मानवाधिकारों का वैश्विक प्रश्न है।और यदि आज भी हम चुप रहे, तो कल जब इतिहास पूछेगा जब निर्दोषों पर अत्याचार हो रहा था, तब तुम कहाँ थे?”
तो हमारे पास देने के लिए कोई उत्तर नहीं होगा।


