बिहार में विरासत की जंग: ‘अभी नहीं तो कभी नहीं’ की स्थिति में तेजस्वी, नीतीश-लालू की राजनीति भी मोड़ पर

पटना। बिहार की राजनीति 2025 विधानसभा चुनाव से पहले नए मोड़ पर खड़ी है। राज्य में इस बार का चुनाव न केवल सत्ता के लिए होगा, बल्कि यह दो कद्दावर नेताओं – नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव की राजनीतिक विरासत को तय भी करेगा। ऐसे में तेजस्वी यादव के लिए यह चुनाव ‘अभी नहीं तो कभी नहीं’ की स्थिति बन गई है।

तेजस्वी की उम्र भले ही कम हो, लेकिन बिहार की राजनीति दिन-ब-दिन और जटिल होती जा रही है। अगर वे इस बार सीएम की कुर्सी तक नहीं पहुंच पाए, तो अगली बार मैदान में जनसुराज जैसी नई ताकत और कांग्रेस का मजबूत रूप होगा, जो चुनावी समीकरण को पूरी तरह बदल सकता है।

परिवार में उभरते विरोध के संकेत

आरजेडी के भीतर भी अब नेतृत्व को लेकर असंतोष दिखने लगा है। तेज प्रताप यादव और बहन रोहिणी आचार्य पहले ही तेजस्वी के खिलाफ अप्रत्यक्ष बयानबाजी कर चुके हैं। वहीं, मीसा भारती को लेकर भी कहा जा रहा है कि वह मौजूदा नेतृत्व से पूरी तरह संतुष्ट नहीं हैं। यह स्थिति पार्टी के लिए गंभीर संकेत है, क्योंकि जब नेतृत्व कमजोर होता है, तो सबसे पहले परिवार में विघटन शुरू होता है और फिर पार्टी में दरारें दिखती हैं।

नीतीश और लालू: एक युग के अंत की शुरुआत?

राज्य के दो सबसे बड़े नेता नीतीश कुमार और लालू यादव, जिन्होंने लोकनायक जयप्रकाश नारायण के साथ राजनीति की शुरुआत की थी, अब अपने राजनीतिक जीवन के अंतिम चरण में हैं। उम्र और स्वास्थ्य दोनों ही अब उनके सक्रिय भविष्य पर प्रश्नचिन्ह बना रहे हैं।
इन दोनों नेताओं का अब तक कोई स्पष्ट उत्तराधिकारी नहीं है जो उनके कद की बराबरी कर सके। बिहार के 7.4 करोड़ मतदाता, जिनमें 14 लाख नए वोटर और 51% महिलाएं शामिल हैं, इस चुनाव में तय करेंगे कि उनकी विरासत किसके पास जाएगी।

नीतीश कुमार की विरासत:

2005 में सत्ता में आने के बाद नीतीश कुमार ने बिहार को ‘जंगलराज’ से निकालकर विकास की राजनीति की ओर मोड़ा।

जातीय जनगणना और 75% आरक्षण नीति ने उन्हें सामाजिक न्याय का नया चैंपियन बनाया।

लेकिन बार-बार गठबंधन बदलने के कारण उन पर “पलटीबाज” की छवि चस्पा हुई।

विपक्ष उनकी बीमारी और बढ़ती उम्र को चुनावी मुद्दा बना रहा है।

अब तक उन्होंने अपने बेटे निशांत कुमार को राजनीति से दूर रखा है। अगर निशांत राजनीति में आते हैं, तो कुछ समय तक उन्हें पिता के नाम का लाभ मिल सकता है, जैसे तेजस्वी को लालू यादव की विरासत से मिला है।

अगर निशांत सक्रिय नहीं होते, तो गैर-यादव OBC और EBC मतदाता बीजेपी की ओर झुक सकते हैं और JDU, BJP की छाया में सिमट सकती है।

तेजस्वी यादव की परीक्षा

तेजस्वी यादव के सामने इस बार दोहरी चुनौती है –

नीतीश कुमार की मजबूत प्रशासनिक विरासत को टक्कर देना

अपने ही परिवार और पार्टी में नेतृत्व बनाए रखना।
अगर वे इस बार मुख्यमंत्री नहीं बन पाए, तो उनके सामने कांग्रेस और प्रशांत किशोर जैसे चेहरे और ताकतवर विकल्प खड़े होंगे।

2025 का बिहार विधानसभा चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन की लड़ाई नहीं, बल्कि यह तय करेगा कि नीतीश कुमार की विकासवादी राजनीति का उत्तराधिकारी कौन होगा, और लालू यादव की सामाजिक न्याय की विरासत कौन संभालेगा।

यह लड़ाई महज सीटों की नहीं, बल्कि विरासत बचाने और खोने की लड़ाई बन गई है।
तेजस्वी यादव के लिए यह चुनाव निर्णायक है — “अभी नहीं, तो कभी नहीं!”

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