राजेश बब्बर : एक्टिंग से निर्देशन तक

हिसार।  मैंने स्कूल टाइम से एक्टिंग से शुरूआत की थी लेकिन जैसे जैसे इसमें डूबता गया , वैसे वैसे निर्देशन की ओर कदम बढाता गया । यह कहना है छोरिया छोरों से कम नहीं होतीं , हरियाणवी फिल्म के निर्देशक का । कल ही यह फिल्म रिलीज हुई है और परसों हिसार के सनसिटी में इसके प्रीमियर पर राजेश बब्बर अपनी टीम के साथ आए थे ।
– इसके बाद कौन कौन सी फिल्म में सतीश कौशिक के सहायक रहे ?
– हम आपके दिल में रहते हैं , हमारा दिल आपके पास है , मुझे कुछ कहना है । सोनी टी वी के कालगेट टाॅप टेन कार्यक्रम का भी निर्देशन किया और फिर बालाजी में कहानी घर घर की , कुसुम , कहीं तो मिलेंगे , कहीं तो होगा आदि सीरियल्ज का स्वतंत्र निर्देशन किया । मेरे लोकप्रिय सीरियल रहे मायका , सबकी लाडली बेबो और सपने सुहाने लडकपन के ।
– थियेटर करते करते निर्देशन में कैसे आ गये ?
– थियेटर में एक्टिंग ठीक है लेकिन इसमें रोजी रोटी नहीं । दिल्ली में रहते स्लम एरिया के बच्चों के साथ बहुत नुक्कड नाटक खेले । थियेटर वर्कशाप भी लगाईं । लेकिन फिर ठान लिया कि अब डायरेक्शन ही करूंगा और मुम्बई पहुंच गया ।
– साथ साथ एक्टिंग नहीं कर सकते ?
– नहीं । मुम्बई में एक ही लाइन चुननी पडती है ।
-प्रिय डायरेक्टर कौन ?
– जो रियलिस्टिक फिल्में बनाते हैं । सतीश कौशिक से तो बहुत कुछ सीखा और सीखता रहता हूं । राजकुमार हिरानी और नीरज पांडे की डायरेक्शन अच्छी लगती है ।
– हरियाणवी फिल्में पगडी- द ऑनर व सतरंगी राष्ट्रीय पुरस्कार तो जीत पाईं लेकिन दर्शकों का दिल नहीं । क्यों ?
‘ हरियाणवी फिल्म बनाने में खतरे ही खतरे हैं । सतीश कौशिक हर जगह कह रहे हैं कि भोजपुरी और पंजाबी की तरह हरियाणवी फिल्म इंडस्ट्री बनानी है तभी बात बनेगी । यह जिम्मादारी हमारी भी है और हरियाणा के दर्शकों की भी । हमने तो छोरियां छोरों से कम नहीं होतीं फिलाम बना दी पूरे मन और समर्पण से । अब इसे सफल बनाना दर्शकों के हाथ में है । हरियाणा में टेलेंट की कमी नहीं ।
– सिरसा में कितने साल बाद आए ?
– लगभग पंद्रह बीस साल बाद । अपनी फिल्म लेकर आया । कर्ज उतारने माटी का । बहुत पुराने पुराने दोस्त मिले और बहुत यादें शेयर कीं ।

मूल रूप से सिरसा निवासी राजेश बब्बर सन् 1994 से मुम्बई में बसे हुए हैं । सिरसा के जीनियस स्कूवल से पढाई के दौरान वे साहिल ग्रुप से जुड गये और नाटकों में रूचि बढती गयी । गवर्नमेंट नेशनल काॅलेज से बीए के बाद पंजाब विश्वविद्यालय के इंडियन थियेटर से एम ए की और दिल्ली का रूख किया । वहां नयी पीढी का कलामंच ग्रुप का गठन कर नुक्कड नाटक खेलने शुरू किए । तीन चार वर्ष ऐसे ही नुक्कड नाटक खेल कर मुम्बई की राह पकडी औय सतीश कौशिक के सहायक निर्देशक बन गये । यहीं से एक अभिनेता का निर्देशक बनने का सफर शुरू हुआ । जुनून फिल्म थी पहली ।
वरिष्ठ पत्रकार कमलेश भारतीय के द्वारा लिया गया साक्षात्कार

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