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Mental Health : किसी भी स्थिति से निपटने के लिए खुद को तनाव मुक्त करना होगा : डॉ प्रतिमा मूर्ति

डॉ. प्रतिमा मूर्ति, निदेशक निमहंस, बंगलौर ने कोविड19 के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दीर्घ कालीन और लघु कालीन प्रभाव के विषय में बात की, उन्होंने बताया कि किस तरह सरकार द्वारा संचालित जिला स्तरीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम महामारी से उबरने में सहायक हो सकते हैं। प्रस्तुत है उनसे हुई बातचीत के प्रमुख अंश-

 

सवाल- एक अभूतपूर्व कोविड महामारी ने लोगों के जीवन को आर्थिक, शारीरिक और भावनात्मक आदि कई तरह से प्रभावित किया है, कोविड ने किस तरह के असंख्य मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों को जन्म दिया है?

जवाब- सबसे पहले तो लोगों में इस बात का डर है कि उन्हें कहीं कोविड संक्रमण न हो जाएं, लोग बाहर जाने से डर रहे हैं, उन्हें इस बात का भी डर है कि वह किस तरह का मास्क पहने, या वह कौन सी ऐसी सुरक्षा अपनाएं, जिससे कि संक्रमण न हो। संक्रमण को लेकर इस तरह का खौफ बना कि लोगों ने घर में प्रयोग की जाने वाली खाने पीने की चीजों को भी विसंक्रमित करना शुरू कर दिया। बाद में जब यह स्पष्ट हुआ कि वायरस सतह या भी धरातल के माध्यम से नहीं फैलता है तब कहीं जाकर लोगों का डर खत्म हुआ। लेकिन इसके बाद दूसरी लहर आई जबकि पूरे परिवार के परिवार कोविड संक्रमित हो गए, इससे लोगों मे खौफ बढ़ गया। आमतौर पर घर में जब कोई बीमारी होता है तो घर के सभी सदस्य उसकी देखभाल में लग जाता है, परिजन बहुत सारा सहयोग देते हैं। इसी तरह जब परिवार में किसी की मृत्यु होती है, सभी रिश्तेदार और सदस्य आश्वासन देने पहुंचते हैं। घर में कुछ विशेष तरह की परंपराओं को निभाया जाता है, जिससे जाने वाले व्यक्ति के दुनिया से जाने का दुख कुछ कम हो जाता है। कोविड के समय में लोगों को इस तरह का मानसिक और भावनात्मक सहयोग नहीं मिल पाया। जिससे उनके गम को और बढ़ा दिया और मनोवैज्ञानिक रूप से लोग अधिक परेशान हुए। मानसिक तनाव की इस स्थिति से वापस आने के लिए बहुत से लोगों के लिए काफी मुश्किल भरा होता है, कुछ अभी भी पैनिक अटैक का सामना कर रहे हैं।

सवाल- महामारी ने बच्चों के सामाजिक और मानसिक स्वास्थ्य को किस तरह प्रभावित किया है?

जवाब- बच्चों ने इस समय सबसे अधिक बदलाव का दौर देखा, बच्चे स्कूल नहीं जा पाएं और उन्होंने घर पर रहकर ऑनलाइन क्लास के माध्यम से अपनी पढ़ाई करनी सीखी, फिर बड़ी संख्या में ऐसे भी बच्चे हैं जो ऑनलाइन क्लॉस करने में सक्षम नहीं हैं या जिनके पास शिक्षा के सीमित संसाधन हैं। हमने एक पेटिंग प्रतियोगिता आयोजित की, जिसके माध्यम से जानने का प्रयास किया गया कि बच्चों ने लॉकडाउन को कैसे बिताया? कुछ बच्चों ने पेंटिंग के जरिए यह जाहिर किया कि उन्होंने पहले लॉकडाउन के समय अकेलेपन और एकांतवास का अनुभव किया। कुछ बच्चों की पेंटिंग काफी आशावादी और उत्साहजक थी, जिसमें उन्होंने फ्रंटलाइन वर्कर और स्वास्थ्य कर्मचारियों के कोविउ काल में किए गए कार्य की सराहना की। बच्चों ने कुछ तस्वीरें ऐसी बनाई, जिसमें उन्होंने दिखाया कि वह किस तरह घर पर ही इंडोर गेम खेल रहे हैं और परिवार के साथ मिलकर रचनात्मक कार्य कर रहे हैं। लेकिन जब लॉकडाउन की समयावधि बढ़ गई, तब बच्चों के लिए न्यू नॉर्मल लाइफ में रहना काफी मुश्किल हो गया। बड़े बच्चे में शैक्षणिक शिक्षा को लेकर असमंजस की स्थिति बन गई। स्कूल में कराई जाने वाली बहुत सारी विकासात्मक गतिविधियों बच्चों को नहीं मिल रही थी, खासकर के ऐसे बच्चे जो स्कूल ट्रिप के लिए स्कूल से बाहर जाते हैं। इसके साथ ही अभावों में जीवन व्यतीन करने वाले लोगों के मानसिक स्वास्थ्य को भी कोविड ने बुरी तरह प्रभावित किया। लॉकडाउन और कोविड ने हमें कई तरह की तकनीक को प्रयोग करने का आदी बना दिया। घर पर लंबे समय रहने के कारण बच्चों ने मोबाइल का प्रयोग गैर शैक्षणिक कार्य के लिए भी करना शुरू कर दिया, ऑनलाइन पढ़ाई के साथ ही बच्चे मोबाइल गेम और अन्य आपत्तिजनक चीजें भी देखने लगे। शारीरिक श्रम की कमी, दोस्तों से न मिलना, सामाजिक एकजुटता ने होना आदि चीजों से बच्चों ने शारीरिक और मानसिक विकास पर गहरा असर पड़ा।

सवाल- क्या कोविड19 मानसिक स्वास्थ्य पर दीर्घकालीन प्रभाव भी डाल सकता है?

जवाब- जी, बिल्कुल, कोविड19 के दीर्घकालीन प्रभाव भी हो सकते हैं। हम ऐसे मरीज देख रहे हैं जिन्हें कोविड हुआ और अब वह पोस्ट ट्रामेटिक स्ट्रेस डिस्आर्डर से परेशान हैं, जो लंबे समय तक रह सकता है। और फिर ऐसे लोग जिन्हें पहले से भी कई तरह की मानसिक परेशानियां जैसे तनाव या एंजाइटी है तो ऐसी अवस्था में उनकी सेहत पर कोविड का अधिक गंभीर असर हो सकता है। तीसरा अब जैसा कि हमें पता है कि कोविड केवल फेफड़ों को प्रभावित नहीं करता है, यह मस्तिष्क सहित शरीर के अन्य अंगों को भी प्रभावित कर सकता है। कोविड संक्रमण की वजह से दिमाग की नसों में संकुचन हो सकता है। एसएआरएस और एमईआरएस वायरस पर किए गए अध्ययनों से यह पता चला है कि संक्रमित मरीज दीर्घ काल में तनाव, अनिद्रा और कुछ मामलों में साइकोसिस के शिकार पाए गए। इसके अलावा संक्रमण के बाद लांग कोविड असर भी देखा गया जिसमें मरीजों को थकान, मांसपेशियों में दर्द, याद्दाश्त का कमजोर होना आदि मानसिक समस्याएं देखी गईं।

सवाल- मानसिक स्वास्थ्य एक बड़ी समस्या बन गया है, आपको क्या लगता है कि इससे कैसे निपटा जा सकता है? यह जानते हुए कि देश में बहुत से लोग मानसिक के लिए किसी तरह की चिकित्सीय सहायता नहीं लेते हैं?

जवाब- मानसिक स्वास्थ्य के इलाज और जरूरत, इन दोनों बातों के बीच में शुरू से ही बड़ा अंतर है। कोई तो वजह है लोग अपनी भावनात्मक बातों को लेकर खुलकर बात नहीं कर पाते हैं, लेकिन अब ऐसा लगता है कि जनसंख्या के एक बड़े हिस्से में अब मानसिक स्वास्थ्य को लेकर लोग जागरूक है। मानसिक स्वास्थ्य के बारे में व्यक्तिगत रूप से, सामाजिक स्तर पर और योजनाएं बनाने तक के स्तर पर बात करने की जरूरत है। सबसे पहले इस बात को समझने की जरूरत है कि जब लोगों को इस बात का अनुभव हो कि वह मानसिक रूप से तनाव में है तब उन्हें इस बात के बारे में किसी से बात करनी चाहिए या किसी की सहायता लेनी चाहिए। इसके साथ ही उन्हें लोगों को तनाव की किसी भी स्थिति से निपटने के लिए खुद को तनाव मुक्त करना आना चाहिए। तनाव मुक्त रहने के लिए खुद को ऐसे चीजों में व्यस्त रखें जो उन्हें करना अच्छा लगता है।
मानसिक स्वास्थ्य को शारीरिक स्वास्थ्य देखभाल के साथ जोड़ देना चाहिए, सही मायने में इस संदर्भ में सरकार के जिला स्तरीय मानसिक स्वास्थ्य कार्यक्रम एक बेहतर कार्य कर सकते हैं। नियमित स्वास्थ्य जांच के दौरान लोगों से यह पूछना चाहिए कि क्या वह ठीक तरीके से सो पा रहे हैं, उनका व्यवहार स्थाई रहता है या फिर बदलता रहता है। सभी स्वास्थ्य कर्मियों को इस बात की पहचान करनी आनी चाहिए कि इलाज के लिए आए मरीज का मानसिक स्वास्थ्य सही नहीं है या फिर वह तनाव में है। इसके साथ ही मानसिक स्वास्थ्य के लिए चलाएं जा रही ऑनलाइन सुविधा को भी अधिक मजबूत करने की जरूरत है। निमहंस में हमने इसके लिए 24 घंटे हेल्पलाइन नंबर जारी किया गया है। जिसको मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों द्वारा संचालित किया जाता है। हमें इस बात को समझना होगा कि हमारे मानसिक स्वास्थ्य का सीधा असर शारीरिक स्वास्थ्य पर पड़ता है। तनाव, चिंता, डर, भय आदि कइ तरह के साइक्लॉजिकल समस्याओं की वजह बन सकते हैं। जो क्रानिक बीमारी जैसे डायबिटिज, हाईपरटेंशन और मोटापे की भी वजह है।

सवाल- आपको क्या लगता कि लगातार एक बाद एक हादसे और दुर्घनाएं मनौवैज्ञानिक रूप से स्वास्थ्य को प्रभावित करती हैं, फ्रंट लाइन वर्कर इससे किस तरह सामना करते हैं?

जवाब- स्वास्थ्य क्षेत्र में काम करने वाले स्वास्थ्य कर्मचारियों, मीडिया में काम करने वाले और पुलिस आदि को रोजाना कई तरह की दुर्घटनाओं का सामना करना पड़ता है, और यह उनके मानसिक स्वास्थ्य पर असर डाल सकती है। इससे बचने के लिए हमें एक सामांजस्य की स्थिति को बनाना होगा, जिनती नेगेटिव खबरें हो उतनी ही पॉजिटिव खबरें होगीं तो नकारात्मकता का असर कम होगा। उदाहरण के लिए महामारी में यदि किसी ने अपने प्रियजन को खोया तो ऐसे केस भी है जहां चिकित्सकों ने मरीजों की जान बचाई। तनाव से बचने के लिए हमें चीजों को संतुलन में बनाकर देखना होगा। याद रखें कोविड एक अभूतपूर्व बीमारी है, इससे मुकाबला करने के लिए हमें अधिक मजबूती के साथ खड़े होना होगा। शारीरिक और मानसिक रूप से खुद को तैयार करके हम इस जंग को जीत सकते हैं।

टीम डिजिटल

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