कांग्रेस को मिला गैर गांधी अध्यक्ष

कमलेश भारतीय

आखिरकार चौबीस साल बाद देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस को बिना गांधी सरनेम के अध्यक्ष मिल गया ! यानी गैर गांधी अध्यक्ष ! इससे जहां कांग्रेस में खुशी की लहर है , वहीं एक उम्मीद की लौ भी कि अब अगले लोकसभा चुनाव की तैयारियां शुरू हो सकती हैं । हालांकि एक समय राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत बिल्कुल राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के करीब पहुंच गये थे लेकिन उन्होंने राजस्थान के मुख्यमंत्री पद की कुर्सी का मोह नहीं छोड़ा और रेस से बाहर हो गये या कर दिये गये । इसके बाद सिर्फ शशि थरूर ने ही मैदान में आने का हौंसला किया । पहले दिन से ही यह मुकाबला नाबराबरी का लग रहा था और यही हुआ भी । शशि थरूर बुरी तरह पराजित हुए और कह रहे हैं कि इस चुनाव से पार्टी में लोकतंत्र बहाल होने की शुरूआत हो गयी है ।
इसके बावजूद भाजपा इसे सोनिया गांधी के भरोसेमंद अध्यक्ष ही बता रही है और यह मज़ेदार बहस भी चली कि दो आदमी ही अध्यक्ष का फैसला करते हैं यानी सोनिया व राहुल तो उधर से जवाब आया कि भाजपा के अध्यक्ष का फैसला भी दो ही आदमी करते हैं -प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ! यानी आंतरिक लोकतंत्र इतना ही है । बाकी पारिवारिक पार्टियों की तो आंतरिक लोकतंत्र पर बात करना ही बेकार है ।
खड़गे के बारे में बचपन की बात आ रही है जब निजाम ने इनका गांव ही जलवा दिया था और मां की चुन्नी के पालने में जो बच्चा पिता को मिला वही बड़ा होकर मल्लिकार्जुन खड़गे बना यानी एक लाक्षागृह जैसी घटना से बचे अर्जुन ! है न महाभारत काल से कुछ प्रेरित सी बात और घटना । किसी को महिमामंडित नहीं करना चाहता लेकिन लाक्षागृह से बचे पांडवों ने ही आखिर महाभारत जीता था और उसमें भी अर्जुन की बड़ी भूमिका थी । अब कांग्रेस के सामने सन् 2024 का महाभारत है । देखते हैं कि यह अर्जुन क्या कर पायेंगे ? संगठन को बनाने और गुटबाजी से निपटने की सबसे बड़ी जरूरत है । इसके अतिरिक्त कांग्रेस से मोहभंग न हो और पार्टी को छोडकर न जायें , इस रफ्तार को भी रोकना है अर्जुन को ! मछली की आंख की तरह सन् 2024 के चुनाव पर आंख लगाये रखनी होगी । युवा नेताओं को पार्टी से बांधे रखने और जी 23 समूह के रूठे वरिष्ठ नेताओं को भी मनाने की जरूरत है यानी नये व वरिष्ठ नेताओं में संतुलन बनाने रखने की जिम्मेदारी होगी । कितना कुछ है करने को । कांग्रेस से अभी जनता निराश नहीं हुई लेकिन इसकी गुटबाजी से जरूर तकलीफ होती है । बढ़ती महंगाई , साम्प्रदायिक ताकतों का सिर उठाना और ध्रुवीकरण की राजनीति से आगे निकल कर आक्रमणकारी रुख अपनाना होगा । देखिए अर्जुन की खड़ग या तीर कहां तक जायेंगे ,,,?

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।)

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