चंडीगढ़ की गलियों से नशामुक्ति का शंखनाद: जब बल्ला बना बदलाव का हथियार

चंडीगढ़। “बल्ला घुमाओ, नशा भगाओ” यह महज एक आकर्षक नारा नहीं है, बल्कि एक शहर का अपने युवाओं को अंधेरे से बाहर निकालने का सामूहिक संकल्प है। चंडीगढ़ की सड़कों और पार्कों में टेनिस बॉल की गूँज आज एक नई कहानी लिख रही है। यूटी क्रिकेट एसोसिएशन चंडीगढ़ की दूरगामी सोच और चंडीगढ़ पुलिस के सहयोग से शुरू हुआ यह ‘गली क्रिकेट टूर्नामेंट’ आज एक ऐसे आंदोलन में बदल चुका है, जिसकी गूँज पूरे उत्तर भारत में सुनाई दे रही है।

इस अभियान के सूत्रधार, वरिष्ठ भाजपा नेता और यूटी क्रिकेट एसोसिएशन चंडीगढ़ के पूर्व अध्यक्ष संजय टंडन का मानना है कि युवाओं की असीमित ऊर्जा को यदि सही दिशा न मिले, तो वह भटक सकती है। इस पहल के मूल विचार को साझा करते हुए वे कहते हैं कि हमने महसूस किया कि जब तक हम बच्चों को गलियों और मोहल्लों से निकालकर खेल के मैदानों तक नहीं लाएंगे, तब तक हम उन्हें उनके बेहतर भविष्य का सपना नहीं दिखा पाएंगे। क्रिकेट हमारे देश में एक धर्म की तरह है और इसी जुनून को हमने नशे के खिलाफ एक हथियार बनाने का फैसला किया। हमारा लक्ष्य केवल खिलाड़ी पैदा करना नहीं, बल्कि नशे की गर्त में गिर रहे युवाओं को एक स्वस्थ और अनुशासित जीवन की ओर मोड़ना है। यह टूर्नामेंट आंकड़ों से कहीं अधिक भावनाओं का खेल है। जहां 288 टीमों के करीब 3,500 खिलाड़ी मैदान में उतरते हैं, वहां हर गेंद नशे की बुराई पर एक प्रहार की तरह होती है।

संजय टंडन का मानना है कि यह आयोजन युवाओं को एक ऐसा मंच प्रदान करता है जहां वे ‘बदनामियों की गलियों’ से निकलकर ‘प्रसिद्धि के स्टेडियम’ तक का सफर तय कर सकते हैं। इस अभियान की सफलता का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि इसे ‘एशिया बुक ऑफ रिकॉर्ड्स’ में स्थान मिला है। लेकिन रिकॉर्ड से भी बड़ी उपलब्धि वह ‘शपथ’ है, जो मैच शुरू होने से पहले हर खिलाड़ी लेता है। चंडीगढ़ पुलिस और यूटी क्रिकेट एसोसिएशन चंडीगढ़ की यह जोड़ी यह साबित कर रही है कि जब खेल और समाज सेवा हाथ मिलाते हैं, तो न केवल अच्छे एथलीट तैयार होते हैं, बल्कि एक ‘नशा मुक्त’ समाज की नींव भी पड़ती है। संजय टंडन का विजन साफ है कि खेल के मैदान कभी खाली नहीं रहने चाहिए, क्योंकि जब तक हाथ में बल्ला रहेगा, नशा कभी उस हाथ को थाम नहीं पाएगा।

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