गांधी के दर्शन में शक्ति स्वरूपा

डॉ. जीवन एस रजक

भारतवर्ष की महान संस्कृति स्त्री-पुरुष की समानता पर आधारित है। हमारी संस्कृति में स्त्री को शक्ति स्वरूपा माना गया है। शास्त्रों के अनुसार मनु और ‘शतरूपा‘ दो आदि पूर्वज थे, जिनसे इस सृष्टि में मानव जाति की उत्पत्ति हुई है। इस सृष्टि का अस्तित्व और उसका गतिमान चरित्र भी स्त्री और पुरुष दो स्तंभों पर टिका हुआ है।
मनुस्मृति में कहा गया है –
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः।
यत्रैतास्तु न पूज्यन्ते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः।। 3/56।।
शोचन्ति जामयो यत्र विनश्यत्याशु तत्कुलम्।
न शोचन्ति तु यत्रैया वर्धते तद्धि सर्वदा ।। 3/57।।
अर्थात् जहाँ स्त्रियों की पूजा होती है, वहाँ देवता निवास करते है, और जहाँ स्त्रियों की पूजा नही होती है, उनका सम्मान नही होता है, वहाँ किए गए अच्छे कर्म भी निष्फल हो जाते है। जिस परिवार में स्त्रियाँ कष्ट भोगती है, उस परिवार का शीघ्र विनाश हो जाता है। और जहाँ स्त्रियाँ प्रसन्न रहती है वह कुल सर्वदा समृद्ध रहता है।
इस तरह हमारी सनातन संस्कृति में स्त्रियों को पूज्जनीय माना गया है। संपूर्ण भारतवर्ष में शक्ति स्वरूप में देवी मानकर स्त्री की उपासना की जाती है। हमारे दर्शन में स्त्री को शक्ति का केन्द्र माना गया है। आध्यात्मिक रूप से यह स्वीकार किया गया है कि सृष्टि के सभी देव, दानव, यक्ष, किन्नर और मनुष्य, स्त्री से ही शक्ति प्राप्त करते है। कदाचित् इसीलिए हमारे देश में वर्ष में दो बार नवरात्रि के रूप में शक्ति की उपासना की जाकर शक्ति प्राप्ति की कामना की जाती है।
शतपथ ब्राह्मण में लिखा है कि – ‘‘पत्नी पुरुष की आत्मा का आधा भाग है‘‘ इसीलिए स्त्री को पुरुष की अर्धांगनी कहा जाता है। क्योंकि स्त्री और पुरुष दोनों एक दूसरे के पूरक है, और एक दूसरे के बिना अस्तित्वहीन भी है। वास्तव में दो आदि पूर्वजों में से एक स्त्री थी और दूसरा पुरुष था। दोनों में कोई भेद नही था, दोनों समान थे। सृष्टि की रचना में दोनों का योगदान भी बराबर था।
समय परिवर्तन के साथ आदिम; आखेटक और खाना बदोश मनुष्य जैसे-जैसे सभ्य होता गया वैसे-वैसे स्त्री पुरुष के बीच की समानता खत्म होती गई। पुरुष स्वयं को स्वयंभु सर्वश्रेष्ठ समझने लगा। उसने स्त्री को उपभोग की वस्तु, प्रदर्शन का छायाचित्र और वासना तृप्ति का साधन मात्र बना दिया। बदलते समय के साथ समाज में पूज्जनीय माने जाने वाली स्त्री को असूचित घोषित कर दैवीय स्थानों पर उसका प्रवेश निषिद्ध कर दिया गया। सदियों से पितृसत्तात्मक सामंतवादी सामाजिक ढांचे में स्त्रियाँ धर्म, मान्यताओं, परम्पराओं और रूढ़ियों का शिकार होती रहीं। पुरुष वर्ग सदियों तक योजनाबद्ध तरीके से सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक क्षेत्र में स्त्रियों को पीछे रखने का षड़यंत्र करता रहा।
सौभाग्य से 19वीं शताब्दी भारतीय स्त्रियों के लिए नवजागरण का संदेश लेकर आयी। अनेक समाज सुधारकों ने स्त्री के समुचित उत्थान के लिए अनेक सार्थक प्रयास किये। स्त्री नवजागरण में महात्मा गांधी के विचारों ने स्त्री समुदाय को गति देने और अनेक सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक उत्थान में उत्प्रेरक का कार्य किया।
वास्तव में भारतवर्ष में स्त्री उत्थान के संघर्ष और स्त्री-पुरुष समता का देश व्यापी जागरण लाने में महात्मा गांधी की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। गांधी जी ने सदियों से शोषित और वंचित रही स्त्री जाति के उद्धार के लिए अपने जीवन काल में जो कुछ किया वह केवल आधुनिक भारत के इतिहास में ही नही बल्कि संपूर्ण भारतीय इतिहास में अद्वितीय है। महिलाओं के प्रति आदर का भाव गांधी जी के चरित्र का मुख्य गुण था। वे स्त्री शक्ति को भली-भांति जानते थे। उनके शब्दों में- ‘‘महिला को अबला कहना उसकी मानहानि करना है। अगर ताकत से हमारा मतलब पाश्विक शक्ति से है तो निःसंदेह पुरुष की अपेक्षा महिला में पशुता कम है।‘‘
स्त्रियों के लिए गांधी जी के हृदय में अत्यंत गहरी सहानुभूति और आदर का भाव था। उनका मानना था कि स्त्रियों में चारित्रिक और नैतिक शक्ति पुरुष से अधिक होती है। उनमे त्याग, प्रेम और अहिंसा की शक्ति भी अधिक होती है। गांधी जी ने स्त्री को पुरुष से अधिक उच्चतर गुणों और नैतिकता से युक्त माना है। वे कहते थे स्त्री और पुरुष दोनों को परिवार तथा समाज में समान महत्व और पहचान मिलनी चाहिए, जिससे समाज में संतुलन बना रहे। स्त्री पुरुष की साथी है, जिसे ईश्वर ने एक समान मानसिक वृत्ति दी है। उसे पुरुष की तरह हर कार्य में सहभागिता करने का अधिकार है।
गांधी जी मन, वचन और कर्म से स्त्री-पुरुष समानता के प्रबल समर्थक थे। उनका मानना था कि स्त्री- पुरुष की रचना एक ही तत्व से हुई है तो एक के लिए संभव है, वह दूसरे के लिए असंभव कैसे हो सकता है? गांधी जी ने सार्वजनिक जीवन में राष्ट्र तथा विश्व के कल्याण की दृष्टि से स्त्रियों की सक्रिय सहभागिता का समर्थन किया। उनका मानना था कि स्त्री शक्ति तभी फलीभूत होगी जब समाजगत रीति- रिवाजों के साथ- साथ समाज के वैधानिक नियमों व कानूनों में भी परिवर्तन लाया जाए।
गांधी जी का मानना था कि स्त्रियों को अपनी अंतःशक्ति को पहचानना और जागृत करना होगा। उनके अनुसार स्त्रियों को अपने उत्थान के लिए स्वयं को तैयार करना पड़ेगा। उनका विश्वस था कि एक निर्भय एवं आत्म- विश्वास से युक्त स्त्री, जो यह जानती है, कि उसकी पवित्रता उसका श्रेष्ठ बल है, वह कभी असम्मानित नही हो सकती है।
स्कन्दपुराण में कहा गया है :-
नरं नारी प्रोद्धरति मज्जन्तं भववारिधौ।

अर्थात् ‘स्त्री भव-सागर में डूबते हुए पुरुष का उद्धार कर देती है।‘ वास्तव में स्त्री सृष्टि की उत्पादिका, प्रतिपालिका और कष्ट में सांत्वना देने वाली है। कण्टकाकीर्ण मार्ग को सुगम बनाने का एक मात्र साधन स्त्री ही है। वह धर्म का प्रतीक है, संस्कृति का उज्जवल पक्ष है और शक्ति का केन्द्र है। वास्तव में मनुष्य को पृथ्वी से स्वर्ग तक पहुंचाने का अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति का एकमात्र साधन स्त्री ही है।
भारत की धार्मिक और दार्शनिक परम्परा में वैदिक काल से लेकर आज तक स्त्री के उत्थान और समानता पर सतत विमर्श होता रहा है। महात्मा गांधी ने भी भारतीय स्त्रियों पर चिंतन करते हुए उनके जीवन के सभी पहलुओं पर दृष्टि डाली है। गांधी के दर्शन में स्त्री विमर्श की सर्वोच्च विशेषता यह है कि यह सामाजिक सौहार्द एवं राजनीतिक विकास में मात्र स्त्री के अधिकारों की चर्चा ही नही करता अपितु राष्ट्र के निर्माण में स्त्रियों के समुचित और प्रासंगिक योगदान को भी स्वीकार करता है। इसके साथ ही गांधी का चिंतन सभी स्तरों पर उन गुणों की भी विस्तार से व्याख्या करता है, जिसके आधार पर स्त्रियों की एक अलग पहचान, व्यक्तित्व विकास और उनका अस्तित्व स्थापित होता है।

(लेखक राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी एवं साहित्यकार हैं।)

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