बिहार में पलटवार की ताक में भाजपा

निशिकांत ठाकुर

एनडीए यदि बिहार के घटनाक्रम से फिलहाल स्तब्ध है, तो इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि वह बिहार सरकार को अपने मन से शासन करने के लिए संपूर्ण संवैधानिक अधिकार (राज्य—केंद्र के बीच) देकर चुप हो बैठ जाएगी। यह कभी हो ही नहीं सकता कि उसके शीर्षस्थ अपने अपमान का घूंट पीकर बिहार के वर्तमान सरकार को निर्बाध रूप से चलने दें। वैसे उसे कई राज्यों में अपने पराजय रूपी अपमान को झेलना पड़ा है, लेकिन अपमान को गांठ बांधकर आक्रमण—दर—आक्रमण करना उसकी एकमात्र आदत है। पश्चिम बंगाल में अपने षड्यंत्र के सारे घोड़े खोलने के बाद हाथ क्या आया! पजाब में तिल का ताड़ बनाकर वहां अपने को इस तरह समूल नाश किया जिसके कारण आज वहां की विधानसभा में उसका नामलेवा भी नहीं है । यदि कोई एकाध ढूंढे से मिल भी जाएं तो वहां यही कहावत चरितार्थ होती है कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता। मध्य प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र इसके ताजा उदाहरण हैं जहां अपनी दुर्गति कराने  के बाद फिर से सत्ता में आ गई । आज के  राजनीतिज्ञों का उद्देश्य भी तो यही होता है कि येन-केन-प्रकरेण सत्ता उनकी हो जाए। जनहित के लिए वे ऐसा चाहते हैं, यह मानना भूल होगी, क्योंकि स्वहित की रक्षा करना ही उनका मूलमंत्र है । बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के दल बदलने के बाद बिहार भाजपा के ही  कई नेताओं ने अलग—अलग प्रेस कॉन्फ्रेंस करके यह बताने का प्रयास किया है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उनकी पार्टी को ठगा है, जनता को भी ठगा है। अब यह तो मंथन का विषय कि सच में किसने किसे ठगा है।

लगभग यही पिछले वर्ष महाराष्ट्र में हुआ था, जब सुबह—सबेरे राष्ट्रपति शासन को समाप्त करके देवेंद्र फडणवीस शपथ ग्रहण समारोह करके  कुछ घंटों के लिए मुख्यमंत्री बन बैठे थे। लेकिन, इसके लिए कितनी आलोचनाओं का सामना भाजपा को सुनना पड़ा, यह वही जानती है। बिहार के लिए भी सत्ता परिवर्तन की बात की जा रही है। वहां भी तो यही कहा जा रहा है कि भाजपा ने नीतीश सरकार को गिराने या उनके कद को छोटा करने का प्रयास किया। बिहार के लोगों का कहना है कि नीतीश कुमार ने भाजपा को छोड़कर उसकी बढ़ती रफ्तार को रोकने का प्रयास किया है। इससे बिहार का विकास होगा। वैसे यह सच है कि लगभग तीस वर्ष से बिहार में जो कुछ हुआ, उसकी नाकामी और उपलब्धि लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार को ही सदैव दिया जाता रहेगा, क्योंकि इतने लंबे समय तक बिहार में इन्हीं दोनों नेताओं का शासन रहा है। वैसे आदिकाल से ही बिहार पलायन के लिए मशहूर रहा है, लेकिन इन दोनों के कार्यकाल में जो पलायन हुआ, उसे आप देश के किसी शहर में किसी कस्बे में देख सकते हैं। कहते हैं इतने वर्षों में राज्य के विकास के लिए कोई कार्य किया ही नहीं गया। सभी अपने अपना स्वार्थ सिद्धि करते रहे। परिणाम यह हुआ कि राज्य में रहकर कुछ धनपति बन गए और कुछ अपनी जिंदगी किसी प्रकार गुजरते रहे।
काफी लंबे काल तक बिहार में सत्तासीन एनडीए का दावा है कि वह देश का विकास करना चाहते हैं, लेकिन उनकी सोच बिहार के विकास के लिए आक्रामक क्यों नहीं है जैसा कि अन्य राज्यों में उनके शासनकाल में देखा गया। न तो इतने लंबे कार्यकाल में कोई उद्योग लगाए गए, न ही रोजगार के साधन उपलब्ध कराने के लिए कोई नई योजना बनाई जा सकी। यदि कोई योजना सरकार ने बनाई भी होगी तो उसे धरातल पर किसी ने उतरते ही नहीं देखा। आज नई सरकार के गठन के बाद राज्य में जो उज्ज्वल भविष्य की खुशी दिख रही है, उसका कारण भी तो यही है। लोगों में एक आशा की किरण जगी है कि शायद अब कुछ राज्य में रोजगार के साधन उपलब्ध हो जाएं। वैसे, सरकार की योजना भी अधिक से अधिक बेरोजगारों को रोजगार देने की  है, लेकिन उसमें उन्हें कितनी सफलता मिलती है, यह देखने की बात होगी। लेकिन, क्या इस नई सरकार को इतना समय मिल पाएगा कि वह अपने वादे पूरे करते हुए युवाओं को रोजगार उपलब्ध करा सके। ऐसा इसलिए, क्योंकि कहा तो यह जा रहा है कि अपनी खुन्नस कहिए या अपमान का बदला लेने के लिए भाजपा सरकारी जांच एजेंसियों का दुरुपयोग करे। दिल्ली में चर्चा है कि बहुत जल्द प्रवर्तन निदेशालय और आयकर विभाग को इस सरकार को तहस—नहस करने के लिए अपने हथकंडे अपनाने के आदेश दिए जा सकते हैं।

गांधीजी जब दक्षिण अफ्रीका में थे, वे ताजा फैशन के मुताबिक बेदाग पोषक पहनने वाले वकील हुआ करते थे। लेकिन, जब उनकी भारत वापसी हुई तो उनके गुरु गोपाल कृष्ण गोखले ने आदेश दिया था कि पहले वर्ष कान खुले, लेकिन मुंह बंद रखकर पूरे हिंदुस्तान की यात्रा करें। महात्मा गांधी ने यही किया। हिंदुस्तान की यात्रा में जो हृदतविदारक दृश्य उन्होंने देखा, उसके बाद उन्होंने अर्द्धनग्न रहकर देशहित में काम करना शुरू किया। क्या आज के हमारे नेतागण इस तरह कार्य कर सकते हैं! हां, समय बदला विकास के नए—नए आयाम बनते गए। विश्व की तरक्की हो रही है, लेकिन हम निश्चित रूप से उनमें बहुत पीछे चल रहे हैं। यह ठीक है कि आजादी के सैनानियों के महानतम बलिदान से हमें स्वतंत्र जीने का रास्ता बना गए, लेकिन उन रास्तों को सही करना हम जीवित लोगों का है। जबकि, हम एक— दूसरे का पैर खींचने का लगातार प्रयास करते रहते हैं। इससे यही होता है कि दुनिया विकास के झंडे गाड़ती रहती है और हम पिछड़ते रहते हैं। बिहार के साथ भी तो यही हुआ। ब्रिटिश हुकूमत से लड़ने वाले बिहार को उसी काल से पिछड़ा और उपेक्षित घोषित करके किसी का भी लाभ नहीं हुआ। न तो बिहार आत्मनिर्भर बन सका, न किसी ने उसकी गरीबी को दूर करने का प्रयास किया। पिछली सरकार में उप मुख्यमंत्री और वर्तमान में राज्यसभा सदस्य सुशील कुमार मोदी उस दिन बहुत खुश हुए थे जिस  दिन जम्मू—कश्मीर से धारा 370 को हटा लिया गया था। उन्होंने प्रसन्नता जताते हुए कहा था कि अब बिहारियों को वहां भी नौकरियां मिल जाया करेंगी। उनके इस शर्मनाक  बयान का आज भी देश में उपहास उड़ाया जाता है।

लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार, दोनों लोकनायक जयप्रकाश नारायण के आंदोलन से निकले हुए राजनेता हैं। नीतीश कुमार गांधीवादी भी है, यह उनके कार्यकलापों से दिखता है। बिहार में शराब बंदी उसी का उदाहरण है। गांधी जी शराब के विरोधी थे। आज नीतीश कुमार भी उसी रास्ते पर चल पड़े हैं, लेकिन इससे राजस्व का राज्य में जो  नुकसान हो रहा है, पता नहीं उसकी भरपाई सरकार कैसे कर पा रही है। बिहार वैसे भी गरीब और पिछड़ा राज्य है। राजस्व की इतनी बड़ी हानि बार—बार गले के नीचे नहीं उतरती है। इस नई सरकार में मुख्यमंत्री को इस पर विचार करना ही पड़ेगा, अन्यथा किस प्रकार अपने पैरों पर बिहार खड़ा हो पाएगा। आजादी के बाद से अब तक 24वें राज्य के रूप में गिना जाने वाला कब एक—एक सीढ़ी पार करते हुए आगे बढ़ता है! अंतिम प्रश्न यह कि यदि स्वच्छंद भाव से नियमानुसार कार्य करने की छूट उसे केंद्रीय सरकार से मिल जाए तो हो सकता है बिहारियों को राज्य के बाहर अपमान का घूंट नहीं पीना पड़े।

 


(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं)

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