बताने की नहीं, आजमाने की चीज होती है ‘ताकत’

 

निशिकांत ठाकुर

बीबीसी टेलीविजन पर पिछले दिनों एक पुराने प्रेस कॉन्फ्रेंस को देखने—सुनने का अवसर मिला। प्रेस कॉन्फ्रेंस में आयोजक के अतिरिक्त तीन धुरंधर ब्रिटिश पत्रकार और भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू शामिल थे। साक्षात्कार पं. नेहरू का लिया जा रहा था और जो लोग साक्षात्कार ले रहे थे वे थे- किंग्सले मार्टिन (एडिटर न्यू स्टेट्समैन एंड नेशन), एचवी हाडशन (एडिटर संडे टाइम्स) और डोनाल्ड मैकडोनाल्ड (फॉरेन एडिटर ऑफ इकोनॉमिस्ट), जबकि कॉन्फ्रेंस का संचालन विलियम क्लार्क कर रहे थे। इन विदेशी धुरंधर पत्रकारों के प्रश्न का जिस प्रकार सहजता से उपयुक्त उत्तर दिया जा रहा था, उससे लगता था कि भारतीय राजनीतिज्ञ विश्व के राजनीतिक पटल और परिप्रेक्ष्य में कितने सुदृढ़ और सक्षम हैं। एक—एक स्तरीय प्रश्न का इतना सटीक और स्पष्ट उत्तर भारतीय प्रधानमंत्री दे रहे थे जिससे लगता था कि वह निश्चित रूप से उज्ज्वल भविष्य की ओर इशारा कर रहा था। इस प्रकार के प्रेस कॉन्फ्रेंस में किसी भारतीय प्रधानमंत्री का साक्षात्कार किसी विश्वस्तरीय मंच से लिया गया हो अथवा कोई प्रधानमंत्री किसी विश्वस्तरीय प्रेस कॉन्फ्रेंस में शामिल होकर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सवालों का उत्तर दिया हो, फिलहाल इसकी जानकारी मुझे नहीं है। इसलिए जब यह साक्षात्कार मेरे सामने आया तो सोचा इसे आप सबसे साझा करके समझने का प्रयास करूं कि अंतर्राष्ट्रीय मंच से इस प्रकार का कोई साक्षात्कार भारतीय राजनेता उस काल में भी देते थे, जब वर्षों की गुलामी से उन्हीं दिनों आजाद हुए थे। पं. नेहरू के उद्भट ज्ञान का पता तब चलता है जब उनकी लिखी कई पुस्तकों के अतिरिक्त डिस्कवरी ऑफ इंडिया को पढ़ा। इस प्रेस कॉन्फ्रेंस को सुनने—देखने के बाद जब पुस्तक को पढ़ा तो मानना पड़ा कि उनके बारे में दुष्प्रचारित की जा रही बातें बकवास हैं।

यह ठीक है कि सैकड़ों वर्षों की गुलामी से हम जिस प्रकार आजाद हुए थे उसके बाद तो किसी का यह सोचना लाजिमी था कि भारत एक अत्यंत पिछड़ा और सैकड़ों वर्षों की गुलामी से तुरंत मुक्त हुआ देश है। उसके राजनेताओं की वह सोच हो ही नहीं सकती, जो दूसरे देशों के नेताओं की हो सकती है। विंस्टन चर्चिल ब्रिटेन के नए प्रधानमंत्री बने थे। हिंदुस्तान की आजादी के सिलसिले में उनके बिल्कुल निश्चित और स्पष्ट ख्याल थे जिसे वह कई बार दोहरा भी चुके थे। हिंदुस्तान की आजादी के वह कट्टर विरोधी थे। उसके लिए किसी तरह झुकने का या समझौता करने के लिए तैयार नहीं थे। जनवरी 1937 में उन्होंने कहा था- कभी-न-कभी तुम्हें गांधी, कांग्रेस और उनके आदर्शों को कुचलना पड़ेगा। उसी वर्ष दिसंबर में उन्होंने कहा था- ब्रिटिश राष्ट्र का हिंदुस्तान की आजादी और प्रगति पर से नियंत्रण हटाने का कोई इरादा नहीं है।बादशाह के ताज के सबसे ज्यादा कीमती और सबसे ज्यादा चमकीले उस हीरे को फेंक देने का हमारा कतई कोई इरादा नहीं है, जो अकेला ही सब डोमिनियनो और अधिकृत प्रदेशों के मुकाबले ब्रिटिश साम्राज्य की ताकत और शान को कायम रखता है।

तब तक अलग—अलग दिशाओं में गांधीजी का असर जन—मन में समा गया था। लेकिन, यह अहिंसा का उसूल या आर्थिक विचारधारा की वजह नहीं थी कि वह हिंदुस्तान के सबसे बड़े और प्रमुख नेता हो गए थे। हिंदुस्तान की बहुत बड़ी आबादी के लिए वह हिंदुस्तान के आजाद होने के पक्के इरादे के, उसकी प्रबल राष्ट्रीयता के, अक्खड़पन के आगे सिर न झुकाने के और राष्ट्रीय अपमान से मिली हुई किसी चीज के लिए राजी न होने के प्रतीक बन गए थे। सैकड़ों मामलों में बहुत से लोग उनसे सहमत नहीं थे। वे उनकी आलोचना करते थे और किसी खास सवाल पर उनसे अलग राह अख्तियार कर लेते थे, लेकिन जब लड़ाई का वक्त आता था और हिंदुस्तान की आजादी का दांव लगा होता था तो लोग उनके पास दौड़कर आते थे और उन्हें अपना ऐसा नेता मानते थे, जिसके बिना कुछ हो ही नहीं सकता। गांधीजी, जो बिल्कुल हिंदुस्तानी सांचे में ढले हुए थे, इस खामोशी से बिल्कुल उलट थे। शक्ति और सक्रियता के तो वह महारथी रहे थे और वह एक ऐसे शख्स थे, जो अपने आपको नहीं, दूसरों को आगे बढ़ाते थे। इतिहास बताता है कि भारतीय जनता की निष्क्रियता से लड़ने और उसे दूर करने की जितनी कोशिश उन्होंने की थीं, उतनी किसी और ने नहीं की। गांधीजी के कई गुणों में एक गुण यह भी था कि वह अपनी बेहतरीन अंग्रेजी बोलकर दूसरे को अभिभूत कर देते थे फिर आगे गांधीजी पीछे उनके चाहने वाले चलते थे — वह सर्वमान्य नेता बन चुके थे ।

जिन्ना कठियाबाड़ प्रदेश में गांधी के प्रदेश पर ही जन्मे थे । जिन्ना वास्तव में एक हिंदू नाम था । इस परिवार ने हाल ही में धर्मांतरण कर इस्लाम अपनाया था । वे एक समृद्ध व्यापारी के बेटे और खोजा मुसलमान थे । वे मुसलमानों के कल्याण के लिए समर्पित अवश्य थे , लेकिन स्वयं अकीदतमंद मुसलमान नहीं थे । गांधी की तरह उन्होंने भी लंदन में कानून की पढ़ाई की थी, वे गांधीजी से सात साल छोटे थे , हिंदुस्तान लौटने पर उन्होंने बंबई में वकालत का खासा कमाऊ पेशा खड़ा किया । हिंदुओं और मुसलमानों के बीच एकता कायम करना उनके शुरुआती राजनीतिक उपक्रमों में शामिल था । जैसे ही गांधीजी का प्रभाव बढ़ना शुरु हुआ, वैसे ही सारी स्थिति बदल गई । जिन्ना में कटुता आ गई और उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी । उनका यह कृत्य हिंदू–मुस्लिम रिश्तों में स्थाई खराबी का कारण बना था । जिन्ना आजादी के साथ साथ मुसलमानों और भारत विभाजन की बात करने लगे । यहां तक कि जिन्ना ने एक वक्तव्य जारी करके कहा कि अगर गांधी पाकिस्तान के बनाए जाने पर राजी हो जाएं , तो सारी समस्या मिनटों में सुलझ जाएगी , लेकिन गांधी हिंदुस्तान के विभाजन को एक ईश्वर– द्रोह की तरह देखते थे । यह कोई सोच भी नही सकता था कि भीड़ में एक आम आदमी जैसा दिखने वाला इंसान इतना परिपक्व , ऊर्जावान , मृदुभाषी और बहुआयामी व्यक्तित्व का धनी कैसे हो सकता है , जिसके एक इशारे पर पूरा देश अपना सर्वस्व न्यौछावर करने की तैयार हो जाता था । दरअसल, उसका अपना निज का स्वार्थ कुछ भी नहीं था , वह पारदर्शी थे, लेकिन आंदोलन में इसलिए सक्रिय थे कि हमारे देश के बच्चे बच्चे का भविष्य उज्ज्वल हो सके ।

आजादी की अंग्रजों से लड़ाई में गांधी जी सर्वमान्य नेता थे और उनसे जुड़े पं. जवाहरलाल नेहरू, सुभाष चंद्र बोस, डॉ. राजेंद्र प्रसाद, आचार्य जेवी कृपलानी, सरदार बल्लभ भाई पटेल प्रथम पंक्ति के राजपुरुष थे। अलग—अलग विचारधाराओं के बावजूद नायक गांधीजी ही थे। कहते हैं पं. जवाहरलाल नेहरू के बाद सुभाष चंद्र बोस उनके सर्वाधिक प्रिय थे। इसी विचारधारा के तहत सुभाष चंद्र बोस कहा करते थे कि हमारी 38 करोड़ की आबादी पर केवल एक लाख अंग्रेज हुकूमत चलाए, यह नहीं होना चाहिए। गांधीजी उन्हें समझाते थे कि भारत में रहने वाले केवल एक लाख अंग्रेज ही हिंदुस्तान पर राज्य नहीं करते हैं, बल्कि उनके पीछे यूरोपीय और अमरीकी ताकत है। गांधीजी के बार—बार समझाने के बावजूद सुभाष बाबू इसे स्वीकार नहीं कर पा रहे थे और परिणाम यह हुआ जो ऐतिहासिक है— गांधीजी को स्वयं अपने हाथ से लिखकर सुभाष बाबू को तीन वर्ष के लिए कांग्रेस से निलंबित करना पड़ा। फिर उसके बाद जो कुछ भी हुआ, वह भारतीय इतिहास का काला अध्याय ही है। जर्मनी सहित कई देशों की यात्रा करने के बाद आजाद हिंद सेना का गठन और फिर पराजय और ताइपे में रहस्यमय ढंग से बॉम्बर का दुर्घटनाग्रस्त होना और उनका दुखद निधन आज भी प्रत्येक भारतीय देशभक्त को उद्वेलित कर देता है।

बीबीसी ने आजादी के बाद जिस तरह प्रेस कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया था उसने विश्व को और साफ कर दिया होगा कि भारतीय सत्ता किसी अयोग्य राजनीतिज्ञ के पास नहीं गया है। यह प्रेस कॉन्फ्रेंस विस्टन चर्चिल सहित उन ढेर सारे आलोचकों के मुंह पर करारा तमाचा था, जो कहा करते थे कि भारतीय पहले उस योग्य तो हो जाएं, जो सत्ता चला सकें। अन्यथा ऐसे राजनीतिज्ञों के हाथों सत्ता की बागडोर सौंपने का परिणाम यह होगा कि देश खंड—खंड में बिखर जाएगा। हिंदुस्तान तब भी परिपक्व था जब उसके पास संसाधनों की घोर कमी थी और विशाल भारत और उसकी आबादी बढ़ती ही जा रही थी। रास्ता दुरूह था, लेकिन कठिन रास्ते को तय करने के बाद यदि हम आगे बढ़ते हैं तो हमें खुशी होती है और हमारा आत्मबल बढ़ता है। यही तो हुआ भारत ने विकास के पथ पर धीरे—धीरे पर मजबूती से अपने पांव को आगे बढ़ाया और आगे बढ़कर यहां तक पहुंचे हैं जहां विश्व के तमाम देशों की आंखों में खटकने लगे हैं। लेकिन, कुछ भी हो, हमारे देश के राजनीतिज्ञ विश्व पटल पर छाप छोड़ रहे हैं और भारत विकास के पथ पर अग्रसर होता जा रहा है । आज भारत का विकास भी पूरी गति से हो रहा है और शासन की बागडोर को भी उसके शासक बेशकीमती ढंग पकड़कर विशाल देश को नई दिशा भी दे रहा है ।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं)

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