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महबूबा मुफ्ती की आम माफी औऱ पत्थरबाज़ों का बढ़ता दुस्साह

कृष्णमोहन झा

जम्मू कश्मीर। कश्मीर में लगभग नौ हजार पत्थरबाज युवकों के मुकदमे वापस लेकर जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती यह उम्मीद कर रही थी कि राज्य सरकार के इस सहानुभूत पूर्ण फैसले का पत्थरबाज युवको पर अनुकूल असर पड़ेगा । इससे वे मुख्य धारा में लौटने के लिए प्रेरित होंगे, परंतु उनकी सारी उम्मीदों पर पथरबाज़ों ने पानी फेर दिया है । उन्होंने यह संदेश भी दे दिया है कि जम्मू कश्मीर की सुख समृद्धि और अमन चैन की बहाली की किसी भी कोशिश को नाकाम करना ही उनका असली मकसद है। पत्थरबाज़ी की एक ऐसी ही निंदनीय घटना ने स्वयं मुख्य मंत्री मेहबूबा मुफ़्ती को अब यह बयान देने के लिए विवश कर दिया है कि उक्त घटना के कारण उनका सिर शर्म से झुक गया है। पत्थरबाजी की यह घटना Hविगत दिनों श्रीनगर गुलमर्ग राजमार्ग के नरबल इलाके में घटी, जिसमे चेन्नई के एक युवक की मृत्यु हो गई और एक युवती समेत कुछ लोग घायल हो गए। आश्चर्य की बात तो यह है कि राज्य सरकर ने पहले इस घटना को छिपाने का भरपूर प्रयास किया, किन्तु बाद में घटना को सार्वजनिक करने के लिए उसे मजबूर होना पड़ा।
दरअसल अपने परिवार के साथ कश्मीर घुमने आये चेन्नई के 22 वर्षीय युवक थिरुमनी और एक युवती को पत्थरबाज़ी में गंभीर रूप से घायल होने पर अस्पताल में भर्ती कराया गया । इस मामले को राज्य सरकर दबाने का प्रयास करती रही, किन्तु इलाज के दौरान युवक की मृत्यु हो जाने के कारण सरकार इस मामले की जानकारी सार्वजनिक करने के लिए विवश हो गई। इसके बाद मुफ़्ती सरकार की चौतरफा आलोचना होने लगी। मुख्यमंत्री मेहबूबा मुफ़्ती ने अस्पताल पहुचकर मृतक थिरुमनी के परिजनों को भरोसा दिलाया कि इस घटना के दोषियों को माफ नही किया जाएगा। इसके साथ ही सरकार के जिम्मेदार लोगो पर भी कार्यवाही की जाएगी। अब सवाल यह उठता है कि जब सरकार ने पत्थरबाज युवकों के लिए आम माफी की घोषणा की थी ,तब उन्होंने यह क्यों नही सोचा कि इन पत्थरबाज युवकों का दुस्साहस इस माफी से ओर बढेगा। इस घटना से यह आशंका सही साबित हो ही गई। मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती अब राज्य में पर्यटन के लिए आने वाले नागरिकों को यह भरोसा दिलाने की स्तिथि में नही है कि राज्य में उन्हें पूरी सुरक्षा उपलब्ध कराई जाएगी।दरअसल अलगाववादियों के प्रति महबूबा के नरम रुख के कारण ही राज्य में इस तरह की घटनाएं थमने का नाम नही ले रही है। कश्मीर घाटी में एक ओर तो भारतीय सेना आतंकियों के सफाए के लिए ऑपरेशन ऑल आउट अभियान चला रही है ,तो दूसरी ओर मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती रमजान ओर अमरनाथ यात्रा की अवधि में एक तरफा सीजफायर की मांग केंद्र सरकार से कर रही है। आश्चर्य की बात तो यह है कि सैन्य अभियान को कुछ समय के लिए स्थगित करने की मांग मुख्यमंत्री महबूबा ऐसे समय कर रही है ,जिस समय सेना अध्यक्ष ने सपष्ट रूप से आतंकवादियो एवं अलगांववादियों को यह कठोर चेतावनी दी है कि वह सेना से लड़ने की कोशिश न करे। सेना से वे कभी जीत नही सकते है। सेनाध्यक्ष ने अपनी चेतावनी में दो टूक कहा है कि जैसी आजादी वे चाहते है उन्हें वह कभी नही मिल सकती । रमज़ान एवं अमरनाथ यात्रा के दौरान घाटी में सैन्य अभियान को स्थगित करने का अनुरोध करते वक़्त महबूबा मुफ्ती आखिर इस कढ़वी हकीकत को कैसे भूल बैठी है कि रमज़ान के पावन महीने में पहले भी आतंकी हिंसा की घटनाएं राज्य में घटती रही है। अमरनाथ यात्रा करने वाले श्रद्धालुओं पर तो आतंकी हमले भी हुए है। पूर्व सेना अध्यक्ष दीपक कपूर भी यह मानते है कि इस समय यदि घाटी में सैन्य अभियान को स्थगित किया जाता है तो आतंकवादियो को संगठित होने का मौक़ा मिल जाएगा। इसका लाभ वह अपनी ताकत बढ़ाने के लिए करेंगे। जम्मू कश्मीर के उपमुख्यमंत्री भी पत्थरबाज़ों के प्रति और शक्ति बरतने के पक्षधर है। मेहबूब मुफ़्ती अगर सचमुच ही राज्य में अमन , चैन और सौहाद्र का माहौल बनते देखना चाहती है तो उन्हें केंद्र सरकार से यह अनुरोध करना चाहिए कि राज्य में जब तक आतंकवाद का पूरी तरह सफाया नही हो जाता, तब तक सैन्य अभियान में तनिक भी नरमी न की जाये । जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री ने एक तरफा सीजफायर की मांग करके परोक्ष रूप से ऐसी मांग कर डाली है जो अलगाववादियो व आतंकवादियो की खुशी का कारण बन सकती है ।
पूर्व सेनाध्यक्ष दीपक कपूर ने सपष्ट रूप से कहा है कि सैन्य अभियान से जब कश्मीर घाटी में आतंकियो की कमर टूटने लगी है, तब एक तरफा सीजफ़ायर से हमारी सेना के जवानों के मनोबल पर प्रतिकूल असर पड़ेगा। महबूबा मुफ्ती को इस सच्चाई से भी वाकिफ होना चाहिए कि पत्थरबाजी की घटना के कारण दूसरे राज्य से आये पर्यटक की मौत का राज्य के पर्यटन व्यवसाय पर भी प्रतिकूल असर पड़ेगा । कश्मीर के ट्रेवल एजेंट्स एसोसिएशन ने भी यह आशंका जताई है कि उक्त घटना राज्य में बाहर से आने वाले पर्यटकों को हतोत्साहित करेगी।
गौरतलब है कि 2016 में आतंकी बुरहान वानी को सेना द्वारा मार गिराए जाने के बाद राज्य में उसके समर्थको द्वारा दहशत का वातावरण बना दिया था।इस कारण राज्य में पिछले दो सालों में पर्यटकों की संख्या लगभग आधी रह गई है । एक जानकारी के अनुसार 2016 के पहले चार माह में 3,91,902 पर्यटक कश्मीर पहुचें थे , जो इस साल के पहले चार माह में घटकर आधे रह गए है। पत्थरबाजों को आखिर यह छोटी सी बात समझ मे क्यों नही आती है कि राज्य में पर्यटन उद्योग से अपनी रोज़ी रोटी चलाने वालों को मुसीबत में डालकर वे खुद अपना नुकसान कर रहे है। अगर पर्यटकों ने कश्मीर आने से तौबा कर लिया ,तो इसका राज्य के राजस्व पर भी असर पड़ेगा । बताया जाता है कि चेन्नई के युवक की हत्या के बाद तमिलनाडु के मुख्यमंत्री पलानी सामी ने मुख्यमंत्री महबूबा मुफती से राज्य के शेष 130 पर्यटकों को सुरक्षित वापिस भेजने का अनुरोध किया है।
महबूबा मुफ्ती सरकार से आम माफी के बाद पत्थरबाज युवको से मुख्य धारा में लौटने की उम्मीदें किस तरह धूमिल हुई है, इसका अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब सेना के जवान पुलिस और सुरक्षा बलों के साथ मिलकर आतंकियो के साथ मुठभेड़ कर रहे होते है, तब यह पत्थरबाज युवक उन पर पीछे से पत्थर बरसाते है, ताकि आतंकियो को सैन्य कार्यवाही से बचाया जा सके । हाल ही में शोफियां में जब पत्थरबाजों ने ऐसी ही स्थिति निर्मित की तो सेना को मजबूरन इन पत्थरबाज़ों पर गोली चलानी पड़ीं । इस कार्यवाही में पांच पत्थरबाज़ों को जान से हाथ धोना पड़ा । सवाल यह उठता है कि सरकार से आम माफ़ी पाकर जिन युवको को अपना भविष्य संवारने की चिंता करनी चाहिए वे पाकिस्तान के ईशारों पर चलने वाले अलगाववादियो के हाथों का मोहरा बनने में क्यों रुचि ले रहे है। इन घटनाओं से कुल मिलाकर कश्मीर घाटी में अमन चैन के हालत कायम न होने देने की पाकिस्तानी मंशा को समझने की जरूरत है । इन पत्थरबाज़ों को इस वास्तविकता का एहसास कब होगा कि पाकिस्तान की मंशा पूरी करके केवल वे अपना ही भविष्य बर्बाद कर रहे है। हाल ही में कश्मीर विश्वविद्यालय के एक युवा सहायक प्राध्यापक ने आतंकवाद की राह पकड़ने की कीमत जिस तरह अपनी जान देकर चुकाई है, वह इन भटके हुए पत्थरबाज युवको को सबक सिखाने के लिए काफी है।

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक और आईएफडब्ल्यूजे के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं)

टीम डिजिटल

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