नमः शिवाय अरजरिया
एक मधुर कहानी है कि एक गांव में एक हनुमत भक्त रहता था, व्यक्ति बुद्धि से प्रखर था। उसी गांव में एक कुम्हार भी रहता था। मिट्टी के बर्तन बनाते-बनाते उन्हें नया रंग रूप देते हुए उसके अंदर भी दर्शन का भाव एवं प्रबल वैराग्य का भाव उत्पन्न हो गया था। कुम्हार अपनी अलमस्त फकीरी में कई बार दीपक बनाने बैठे तो उससे गणेश जी बन जाए जिस देव के भाव में कुम्हार रहे उसी देव जैसे विग्रह वाले बर्तन वह बनाने लगता था। एक दिन वही हनुमत भक्त उसके पास आया तथा हनुमान जी की मूर्ति बनाने का आदेश दिया, कुम्हार ने आदेश तो ले लिया लेकिन उन दिनों गांव में गणेशोत्सव की धूम के कारण उसका भाव गणेश जी की ओर प्रबलता लिए हुए था, कुम्हार ने भाव में रहते हुए हनुमान जी के स्थान पर गणेश की मूर्ति बना दी। अगले दिन ग्राहक आया तो हनुमान जी के स्थान पर गणेश जी की मूर्ति देखकर कुम्हार पर बिगड़ने लगा । कुम्हार भावजगत से बाहर आकर ग्राहक से बोला माफ़ करें, मूर्ति तो हनुमान जी की ही बना रहा था परंतु रात्रि में अंधेरा होने के कारण पूँछ पीछे लगने के स्थान पर, आगे लग गई और वैसे भी हनुमान जी और गणेश जी कोई पृथक भी नहीं है-
दोनों ही प्रथम पूज्य हैं, श्री गणेश से ही प्रत्येक पूजा,यज्ञ हवनादि प्रारंभ होते हैं तो राम कथा में मंच पर सर्वप्रथम हनुमान जी को विराजा जाता है। दोनों ही नाम स्मरण से शक्ति को प्राप्त कर जगत का कल्याण करते है। हनुमान जी राम नाम का प्रयोग कर जहाँ सेतुबंध जैसे शिल्प को निर्विध्न पूर्ण करते हैं, वहीं श्री गणेश नारद के कहने पर राम नाम की परिक्रमा कर संपूर्ण त्रिलोक की परिक्रमा का लाभ प्राप्त करते हैं।
कहा गया है-
‘सुमिरि पवनसुत पावन नामु।
अपने वस करि राखे रामू।।’
इसी प्रकार-
‘महिमा जासु ज्ञान गनराऊ।
प्रथम पूजिअत नाम प्रभाऊ।।’
जहां गणेश जी को महाराष्ट्र के साथ संपूर्ण देश में मंगल मूर्ति कहते हैं वही संत शिरोमणि बाबा तुलसी हनुमान जी को मंगल मूरत मारुति नंदन कहते हैं। दोनों ही देव अपने भक्तों के कष्ट या सकल अमंगल को मूलतः निर्मूल करते हैं, दोनों ही देव विघ्नहर्ता है। जो भक्त श्रघा एवं विश्वास के साथ हनुमान जी या गणेश की भक्ति करते हैं उनके जीवन में कभी भी अमंगल नहीं हो सकता है। जो घटनाएं उनके जीवन में नहीं होती हैं वह भी देवद्वय की कृपा से संभव है। ऐसे लोगों के जीवन में कभी भी अनिष्ट नहीं हो सकता। शिवांश एवं शिवपुत्र में एक समरूपता यह भी है कि दोनों सिंदूर प्रिय है , दोनों को भक्तगण सिंदूर अर्पित करते हैं, दोनों देवों का एक एक नाम कपिल भी है जिसका तात्पर्य है बादामी अथवा सिंदूरी रंग वाला ,शंकर सुवन अंजना नंदन एवं भवानी नंदन दोनों को ही मोदक प्रिय तथा प्रसाद के रूप में भक्तगण दोनों को ही मोदक चढ़ाते हैं यही कारण है कि देवद्वय के भक्तों का जीवन सदैव मोद से भरा रहता है।
गणेश जी को विद्यावारिधि अर्थात विद्या का समुद्र एवं बुद्धिविधाता कहा जाता है। यही कारण है कि भारतीय सनातनी संस्कृति में विद्या अध्ययन प्रारम्भ के समय शिक्षक या गुरु भोजपत्र, स्लेट अथवा कॉपी पर सर्वप्रथम ‘ग’ से गणेश लिखकर विद्या अध्ययन की शुरुआत कर छात्र के जीवन में अपरिमित विद्या एवं बुद्धि की प्रार्थना करते है। पौराणिक आख्यानों में उल्लेख है कि महर्षि वेदव्यास के सम्पूर्ण साहित्य के लेखक श्री गणेश है। इसके पीछे मधुर कहानी यह है कि श्री गणेश ने वेदव्यास के लेखक बनने का प्रस्ताव इसी शर्त पर स्वीकार किया था कि उनकी लेखनी में विराम उत्पन्न न हो, इसके उपरांत महर्षि वेदव्यास अनवरत बोलते रहे एवं श्रीगणेश उनके द्वारा बोले गये शब्दो को वेद, उपनिषद एवं पुराण के रूप में लिपिबद्ध करते गये। दूसरी ओर शंकर सुवन हनुमान जी महाराज को भी विद्या एवं बुद्धि का देवता मानते हुऐ बाबा तुलसी कहते है- “बल बुद्धि विद्या देहुँ मोहि, हरहु कलेश विकार” अर्थात हनुमानजी महाराज भी विद्या एवं बुद्धि के प्रदाता है। व्यक्ति उसी वस्तु या गुण को प्रदान कर सकता है जो उसके पास अपरिमित रूप से भंडारित हो। आंजनेय जानकी माता के आशीर्वाद से सर्वविद्याओं, बुद्धि एवं गुणों की खान है।
गणपति जहां दुष्टों के लिये ‘विकटमेव’ है, वहीं रामभक्त हनुमान भी दुष्टों के संहार के लिए भूधर के समान शरीर धारण कर भृकुटि विशाल कर ‘काल के भी काल’ बन जाते है। गणेशजी का एक नाम विनायक है, जिसका तात्पर्य है कोई भी ऐसा जो नेतृत्व करे या किसी भी क्रिया में सबसे आगे हो।हनुमानजी महाराज भी सीतान्वेशण में वानरवाहिनी का नेतृत्व एवम पथ प्रदर्शन करते हैं।सभी को रास्ता दिखाते हैं।उनके मार्गदर्शन से सभी का जीवन धन्य हो जाता है।गौरीनंदन गणेश यदि गणों के अधिपति हैं तो मारुतिनंदन महावीर भी कपिपति हैं। दोनों देवों में एक समता यह भी है कि उनके जीवन में उतावलापन नही है। श्रीराम ने जब सुग्रीव के नेतृत्व में सीता की खोज में वानरों को चारों दिशाओं में भेजा तो हनुमानजी प्रथमतः आगे नही आये।मानसकार लिखते हैं”पाछे पवनतनय सिर नावा”। इसी प्रकार श्रीगणेश को भी पृथ्वी की परिक्रमा की कोई तेजी नहीं है।वह कार्तिकेय के गमन के उपरांत नारद की प्रेरणा से अपने माता पिता की परिक्रमा करते हैं।दोनों देवों का एक नाम पिंगाक्ष भी है।इसी प्रकार दोनों देवों का यस एवम कीर्ति भी करोङो सूर्यों के समान है।
अगर तत्वत: विचार करें तो प्रत्येक दृश्य के नीचे अदृश्य छुपा हुआ है, प्रकट के नीचे अप्रकट है और अदृश्य एवं अप्रकट तत्व एक ही है। आदि शंकर इसे ही ब्रह्म कहते हुए कहते हैं “ब्रह्म सत्यं जगत मिथ्या” विज्ञान भी तो यही कहता है कि संसार में मात्र ऊर्जा है, पदार्थ नहीं है। यदि पदार्थ कहीं दिखता भी है तो वह प्रकाश का सघन रूप है और फिर प्रत्येक पदार्थ को ऊर्जा में बदला भी जा सकता है।वस्तुतः विज्ञान विखंडनवाद पर आधारित है। पूर्व में विखंडन से अणु के माध्यम से परमाणु तक पहुंचे, जो कालांतर में इलेक्ट्रॉन, प्रोटॉन न्यूट्रॉन तक विखंडित हुआ। प्रत्येक पदार्थ में यही तीन तत्व पृष्ठभूमि में थे। अब नवीनतम प्रयोगों से और भी सूक्ष्म कण जैसे हिग्स बोसोन जिसे कुछ लोग गॉड पार्टिकल भी कहते हैं, यहां तक पहुंच चुके हैं। गॉड पार्टिकल की गति की दिशा इलेक्ट्रॉन आदि से इतर नितांत अनिश्चित है। ‘अनिश्चितता कभी पदार्थ का लक्षण नहीं हो सकता है यह तो जीवंतता का लक्षण है।’ अतः आत्यंतिक गहराई में चेतन तत्व ही समस्त ब्रह्मांड में व्याप्त है। इस प्रकार तात्विक या दार्शनिक दृष्टि से भी गणेश और हनुमान जी में कोई भी अंतर नहीं है। यही कारण है कि दोनों को मंगल मूर्ति कहा जाता है।
आइये गणेश चतुर्थी के अवसर पर दैवद्वय का स्मरण करें-
“मंगल मूरति मारुति नंदन
सकल अमंगल मूल निकंदन”
मंगलमूर्ति मोरिया
गणपति बप्पा मोरिया।
गणेश चतुर्थी के पावन एवं पुनीत अवसर पर आप सभी को सपरिवार अशेष शुभकामनाएं।
@नमः शिवाय अरजरिया
राज्य शिष्टाचार अधिकारी मध्यप्रदेश


