कृष्णमोहन झा
मध्यप्रदेश विधानसभा का 27 अप्रैल का विशेष सत्र केवल एक औपचारिक आयोजन नहीं था, बल्कि यह उस विचार का उद्घोष था जिसमें नारी शक्ति को विकास की धुरी मानने का स्पष्ट संकल्प दिखाई देता है। महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण का शासकीय संकल्प ध्वनिमत से पारित होना इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। लेकिन इस सकारात्मक पहल के बीच एक कड़वी सच्चाई भी सामने आई—इतने महत्वपूर्ण अवसर पर भी विपक्ष का साथ न देना।
यह सवाल अब केवल राजनीतिक नहीं रह गया है, बल्कि यह नैतिकता और प्राथमिकताओं का प्रश्न बन गया है। जब बात देश और समाज की आधी आबादी के अधिकारों की हो, तब क्या राजनीति इतनी हावी हो जानी चाहिए कि सहमति की हर संभावना ही समाप्त हो जाए?
मुख्यमंत्री मोहन यादव ने अपने संबोधन में जिस स्पष्टता से विपक्ष की भूमिका पर प्रश्न उठाए, वह केवल एक राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं थी, बल्कि उस निराशा का प्रतिबिंब थी जो ऐसे अवसरों पर उत्पन्न होती है। उन्होंने यह कहा कि महिलाओं की आकांक्षाओं के साथ अन्याय हुआ है, और यह बात केवल भाषण तक सीमित नहीं है—यह उस व्यापक भावना को दर्शाती है जिसे समाज भी महसूस कर रहा है।
वास्तविकता यह है कि महिला आरक्षण का विषय कोई नया मुद्दा नहीं है। यह वर्षों से चर्चा का विषय रहा है, और हर बार यह अपेक्षा की गई कि जब अवसर आएगा, तो सभी दल एकजुट होकर इसे साकार करेंगे। लेकिन इतिहास गवाह है कि यह मुद्दा बार-बार राजनीतिक गणित का शिकार हुआ है।
यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि जब एक राज्य विधानसभा महिलाओं के सम्मान और अधिकारों को लेकर स्पष्ट संदेश देना चाहती है, तब विपक्ष इस अवसर को राजनीतिक चश्मे से देखता है। यह केवल असहमति का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह उस दृष्टिकोण का संकेत है जिसमें सामाजिक मुद्दों को भी राजनीतिक लाभ-हानि के तराजू पर तौला जाता है।
इतिहास रचने का अवसर था, पर राजनीतिक मतभेद फिर आड़े आए
जब अधिकारों पर राजनीति हावी हो जाती है, तब समाज का संतुलन बिगड़ता है।
यह भी विचारणीय है कि यदि इस विषय पर सर्वसम्मति बनती, तो यह केवल एक प्रस्ताव पारित होने की घटना नहीं होती, बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र की परिपक्वता का प्रमाण बनती। लेकिन ऐसा न हो पाना यह संकेत देता है कि अभी भी हमारी राजनीति उस स्तर तक नहीं पहुँच पाई है, जहाँ सामाजिक न्याय के मुद्दों पर दलगत सीमाएँ समाप्त हो जाएँ।
हालाँकि, इस पूरे परिदृश्य में मध्यप्रदेश की पहल एक सकारात्मक दिशा दिखाती है। राज्य सरकार ने न केवल नीतिगत स्तर पर बल्कि व्यवहारिक स्तर पर भी महिला सशक्तिकरण को प्राथमिकता दी है। स्थानीय निकायों में 50 प्रतिशत आरक्षण, सरकारी नौकरियों में 35 प्रतिशत आरक्षण, प्रशासनिक पदों पर महिलाओं की बढ़ती भागीदारी—ये सभी कदम यह दर्शाते हैं कि यदि इच्छाशक्ति हो, तो परिवर्तन संभव है।
प्रदेश में चल रही लाड़ली लक्ष्मी और लाड़ली बहना जैसी योजनाएँ केवल आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनी हैं। स्व-सहायता समूहों के माध्यम से लाखों महिलाएँ आत्मनिर्भर बनी हैं। औद्योगिक क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के प्रयास, विशेषकर धार जिले में पीएम मित्र टेक्सटाइल पार्क की स्थापना, यह दर्शाती है कि महिला सशक्तिकरण को विकास की मुख्यधारा से जोड़ा जा रहा है।
यहाँ एक बड़ा प्रश्न यह भी उठता है कि जब राज्य स्तर पर इस प्रकार की सकारात्मक पहलें हो रही हैं, तब राष्ट्रीय स्तर पर सहमति क्यों नहीं बन पा रही है? क्या यह केवल राजनीतिक मतभेदों का परिणाम है, या फिर इसके पीछे कोई गहरी रणनीति छिपी है?
विपक्ष को यह समझना होगा कि महिला सशक्तिकरण का मुद्दा केवल सरकार का एजेंडा नहीं है, बल्कि यह समाज की आवश्यकता है। यदि इस विषय पर भी राजनीतिक विरोध जारी रहेगा, तो इसका सीधा असर समाज पर पड़ेगा और महिलाओं के बीच यह संदेश जाएगा कि उनके अधिकार अभी भी राजनीति के अधीन यह कहा जा सकता है कि मध्यप्रदेश ने एक सकारात्मक पहल की है, लेकिन इस पहल को पूर्ण सफलता तभी मिलेगी जब इसे व्यापक राजनीतिक समर्थन प्राप्त होगा। विपक्ष को भी इस विषय पर अपनी भूमिका पर पुनर्विचार करना चाहिए और यह समझना चाहिए कि कुछ मुद्दे ऐसे होते हैं जिन्हें राजनीति से ऊपर रखा जाना चाहिए।
यदि हम वास्तव में एक सशक्त और समावेशी भारत का निर्माण करना चाहते हैं, तो यह आवश्यक है कि महिला सशक्तिकरण को केवल नीतियों तक सीमित न रखा जाए, बल्कि इसे एक राष्ट्रीय सहमति का विषय बनाया जाए।
क्योंकि अंततः नारी का सम्मान ही राष्ट्र का स्वाभिमान है।
(लेखक राजनैतिक विश्लेषक है)

