एनडीए की एकजुटता — सुशासन और स्थिरता के नए अध्याय की तैयारी

डॉ धनंजय गिरि

बिहार की राजनीति में जब केंद्रीय गृह मंत्री और भाजपा के वरिष्ठ नेता अमित शाह ने पटना में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से उनके आवास पर मुलाकात की। यह मुलाकात उस समय हुई जब 243 सदस्यीय विधानसभा के पहले चरण के नामांकन की प्रक्रिया अपने अंतिम दिन पर थी। इस मुलाकात ने बिहार चुनाव को लेकर एनडीए की रणनीति और एकजुटता का स्पष्ट संकेत दिया।अमित शाह ने इससे पहले गुरुवार को यह साफ कर दिया था कि राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) आगामी विधानसभा चुनाव नीतीश कुमार के नेतृत्व में लड़ेगा। शाह ने नीतीश कुमार को जेपी आंदोलन और आपातकाल के दौर के प्रमुख नेताओं में से एक बताते हुए उनके राजनीतिक अनुभव और प्रतिबद्धता की सराहना की। उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार ने हमेशा सुशासन और विकास की राजनीति को प्राथमिकता दी है और बिहार को स्थिरता की दिशा में आगे बढ़ाया है।शाह ने अपने संबोधन में यह भी स्पष्ट किया कि भाजपा अपने सहयोगी दलों के साथ समान सम्मान और भरोसे के साथ काम करती रही है — चाहे वह केंद्र की सरकार हो या राज्य की। उन्होंने कहा कि “जहां भी भाजपा को पूर्ण बहुमत मिला, हमने गठबंधन की मर्यादा और साझेदारी का सम्मान किया, और इस बार भी वही परंपरा कायम रहेगी।”राजनीतिक समीकरणों की दृष्टि से भी एनडीए ने स्पष्टता दिखाते हुए सीट बंटवारे का फ़ॉर्मूला तय कर लिया है — भाजपा और जेडीयू 101-101 सीटों पर चुनाव लड़ेंगे, जबकि हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा (सेक्युलर) और राष्ट्रीय लोक मोर्चा (आरएलएम) को छह-छह सीटें और लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) को 29 सीटें दी गई हैं। यह संतुलित साझेदारी एनडीए की संगठनात्मक परिपक्वता और सामूहिक दृष्टिकोण को दर्शाती है।

बिहार भाजपा अध्यक्ष दिलीप कुमार जायसवाल ने भी इस बात की पुष्टि की कि नीतीश कुमार ही एनडीए के मुख्यमंत्री पद के चेहरा होंगे और गठबंधन पूरी मजबूती के साथ उनके नेतृत्व में चुनाव मैदान में उतरेगा। उन्होंने यह भी कहा कि “एनडीए में सब कुछ ठीक है” — यह बयान विपक्ष के उन कयासों पर विराम लगाने वाला है, जो एनडीए के भीतर असंतोष की अफवाहें फैला रहे थे।

आज जब बिहार विकास और स्थिरता के नए युग की ओर बढ़ रहा है, तब एनडीए की यह एकजुटता केवल चुनावी रणनीति नहीं बल्कि सुशासन के भरोसे की पुनर्पुष्टि है। नीतीश कुमार के अनुभव और अमित शाह के संगठनात्मक नेतृत्व का यह संयोजन बिहार को एक बार फिर स्थिर, सक्षम और आत्मनिर्भर शासन की दिशा में अग्रसर कर सकता है।यह स्पष्ट है कि बिहार में चुनावी मुकाबला केवल सत्ता परिवर्तन का नहीं, बल्कि सुशासन बनाम अराजकता के बीच भविष्य की दिशा तय करने का प्रश्न बन चुका है — और एनडीए ने इस चुनौती का सामना एकजुट होकर करने की तैयारी पूरी कर ली है।

इस बार का चुनाव केवल विकास के मुद्दे पर नहीं बल्कि विश्वसनीयता की परीक्षा भी है। एनडीए यह संदेश देने में सफल रहा है कि उसका गठबंधन नीतिगत रूप से स्पष्ट और नेतृत्व के मामले में स्थिर है। वहीं, महागठबंधन की देरी और असहमति जनता के मन में अस्थिरता का भाव पैदा कर रही है।

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के मद्देनज़र राजनीतिक समीकरण लगातार बदल रहे हैं, लेकिन विपक्षी महागठबंधन के भीतर राजद और कांग्रेस के बीच आपसी मनमुटाव की खबरें जनता में असमंजस पैदा कर रही हैं। यह स्थिति केवल चुनावी रणनीति का सवाल नहीं है, बल्कि जनता के लिए स्पष्ट संदेश की कमी को भी उजागर करती है।राजद और कांग्रेस दोनों ही बिहार में सत्ता में आने की महत्वाकांक्षा रखते हैं, लेकिन गठबंधन के भीतर विवाद और सीटों के बंटवारे को लेकर असहमति ने विपक्षी खेमे को कमजोर किया है। इसका सीधा असर मतदाताओं पर पड़ रहा है, जो अब यह समझने में कठिनाई महसूस कर रहे हैं कि गठबंधन में कौन कितना निर्णायक है और वास्तविक नेतृत्व किसके हाथ में होगा।विपक्ष का यह मनमुटाव राज्य की राजनीति में केवल भ्रम पैदा करता है और एनडीए को चुनावी लाभ की राह आसान बनाता है।

एनडीए ने इस बीच अपनी एकजुटता और स्पष्ट नेतृत्व को सामने रखा है, जिससे जनता के सामने विकल्प स्पष्ट दिखाई दे रहा है।राजनीतिक दलों के लिए यह समय केवल घोषणाओं और वादों का नहीं, बल्कि जनता के बीच विश्वास और स्पष्टता दिखाने का है। यदि विपक्ष आपसी मतभेदों को सुलझाने में विफल रहता है, तो यह बिहार के मतदाताओं के निर्णय पर सीधा प्रभाव डालेगा। राजद और कांग्रेस के बीच अनसुलझा मनमुटाव विपक्ष के लिए खतरे की घंटी है। जनता अब विकास, सुशासन और स्थिर नेतृत्व चाहती है, और ऐसे में असमंजस पैदा करने वाली राजनीति विपक्ष के पक्ष में नहीं जाती। बिहार चुनाव 2025 में विपक्ष के लिए यही सबसे बड़ी चुनौती साबित होगी।

कांग्रेस की उम्मीदवार सूची जारी होने से विपक्षी खेमे में कुछ हलचल जरूर आई है, लेकिन अब भी एक साझा दृष्टिकोण और समन्वय का अभाव साफ झलकता है। चुनावी राजनीति में देरी का अर्थ है — जनता के बीच संदेश पहुँचाने में कमी। आज बिहार की जनता राजनीतिक बयानों से ज़्यादा काम और स्थायित्व चाहती है। अगर विपक्ष समय रहते स्पष्टता और एकता नहीं दिखा पाया, तो एनडीए की “विकास और स्थिरता” की कहानी ही जनता के मन में निर्णायक साबित होगी।

Leave a Reply

Your email address will not be published.