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भारत के साथ संबंधों में प्रगाढता लाएगी नई नेपाली सरकार

नेपाल की नवनिर्वाचित सरकार ने कहा है कि वो स्वतंत्र विदेश नीति के सिद्धांत पर कार्य करेगी. नेपाल के वाम गठबंधन ने हाल ही में देश में हुए आम चुनावों में भारी मतों से जीत के बाद दावा किया है कि वो स्वतंत्र विदेश नीति के आधार पर पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को विकसित करेंगे. नेपाल के प्रति भारत का रवैय्या, नेपाल में भारत के हितों से जुड़ा हुआ है, जैसे जल संसाधनों का इस्तेमाल, व्यापर संवर्धन, पूंजी निवेश के मौके, संयुक्त उद्योगों का लगाए जाना, आदि. नेपाल की भारत पर अति-निर्भरता की वजह से भी दोनों देशों के रिश्ते प्रभावित होते हैं. बड़ी संख्या में नेपाल के निवासी अपने जीवनयापन के लिए भारत पर निर्भर हैं.

अजय कुमार कर्ण
प्रबंध संपादक, न्यूज हरपल

नेपाल में हाल में संपन्न हुए राष्ट्रीय चुनाव में वाम दलों के गठबंधन ने बहुमत जीत लिया है. यह गठबंधन शीघ्र ही सरकार बनाएगा और यदि इस सरकार के मुखिया केशव प्रसाद ओली होते हैं, तो यह भारत के लिए असहज स्थिति पैदा कर सकता है, जैसा ओली के पहले प्रधान मंत्री रहने पर हुआ था. यह काफी समय से स्पष्ट था कि चीन धीरे-धीरे नेपाल में अपना प्रभाव बढ़ा रहा है, लेकिन इन चुनाव में भी नेपाल के लोग भारत के प्रभाव के विरोध में ही अपना मत प्रदर्शन करेंगे ऐसी उम्मीद नहीं की जा रही थी. अब यह साफ़ हो गया है कि भारत की नेपाल को लेकर विदेश नीति को चीन ने पछाड़ दिया है.
भारत और नेपाल के बीच सामाजिक और सांस्कृतिक रिश्ते सदियों पुराने और बहुत करीबी रहे हैं. इन रिश्तों में दोनों देशों के बीच ऐतिहासिक, भौगोलिक, सांस्कृतिक और भाषाई नजदीकियां परिलक्षित होती रही हैं.सामरिक दृष्टि से नेपाल की भौगोलिक स्थिति की वजह से इस देश पर भारत और चीन के अलावा दुनिया की महाशक्तियों की भी नजर रहती है. दोनों देशों के बीच परस्पर लाभकारी सहयोग और संभावित तनाव और विरोध के कारणों को जानना जरूरी है, जिससे दोनों देशों के बीच दीर्घकालीन सहयोग और साझेदारी बनी रहे.
नेपाल की नवनिर्वाचित सरकार ने कहा है कि वो स्वतंत्र विदेश नीति के सिद्धांत पर कार्य करेगी. नेपाल के वाम गठबंधन ने हाल ही में देश में हुए आम चुनावों में भारी मतों से जीत के बाद दावा किया है कि वो स्वतंत्र विदेश नीति के आधार पर पड़ोसी देशों के साथ संबंधों को विकसित करेंगे. नेपाल में सरकार वामपंथी-माओवादी गठबंधन के नेतृत्व में बनने जा रही है. वाम गठबंधन सीपीएन-यूएमएल व सीपीएन-माओवादी ने रविवार को काठमांडू में आयोजित मीटिंग के बाद प्रेस विज्ञप्ति में कहा कि नेपाल के संविधान में दिए गए निर्देशों के आधार पर, हम अनुकूल राष्ट्रों, विशेष रूप से पड़ोसी देशों और अंतरराष्ट्रीय संगठनों के साथ संबंधों को विकसित करेंगे. इसका मतलब साफ है कि नवनिर्वाचित सरकार भारत व चीन दोनों ही देशों के साथ संबंधों को मजबूती प्रदान करेगी. नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री केपी ओली के नेतृत्व में सीपीएन-यूएमएल व पूर्व प्रधानमंत्री प्रचंड के नेतृत्व में सीपीएन माओवादी पार्टी के गठबंधन में नेपाल का आम चुनाव लड़ा जिसमें इन्होंने रिकॉर्ड मतों से जीत हासिल की है. वाम गठबंधन ने आम चुनावों में बहुमत हासिल किया है और जनवरी में बनने वाली अगली सरकार का नेतृत्व करने के लिए पूरी तरह से तैयार है. सीपीएन-यूएमएल और माओवादी गठबंधन द्वारा जारी बयान में कहा गया है कि वाम गठबंधन नेपाल में एक स्थिर सरकार बनाने और चुनावों में किए गए सभी वादों को पूरा करने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है.
नेपाल के प्रति भारत का रवैय्या, नेपाल में भारत के हितों से जुड़ा हुआ है, जैसे जल संसाधनों का इस्तेमाल, व्यापर संवर्धन, पूंजी निवेश के मौके, संयुक्त उद्योगों का लगाए जाना, आदि. नेपाल की भारत पर अति-निर्भरता की वजह से भी दोनों देशों के रिश्ते प्रभावित होते हैं. बड़ी संख्या में नेपाल के निवासी अपने जीवनयापन के लिए भारत पर निर्भर हैं. चूंकि नेपाल चारों ओर से दूसरे देशों से घिरा हुआ है और उसे समुद्र तक पहुंच नहीं है, इसलिए भारत ने नेपाल को विदेशी व्यापर के लिए रास्ते दिए हैं. भारत की ओर से नेपाल को बीस ट्रांजिट पॉइंट (निर्गत बिंदु) दिए गए हैं, जहां से नेपाल के सामान बाहर ले जाए जा सकते हैं, इसके अतिरिक्त, भारत के कोलकाता, कांडला और मुंबई बंदरगाहों पर भी नेपाल को सुविधाएं दी गई हैं.
भारत नेपाल का सबसे बड़ा एकल व्यापार पार्टनर है, और दोनों देशों के बीच आवागमन और व्यापार के मुद्दों से द्विपक्षीय रिश्ते हमेशा प्रभावित होते रहे हैं. भारत द्वारा अक्सर इन दोनों मुद्दों को जोड़ा जाता रहा है, जबकि नेपाल ने 1978 से ही इन दोनों मुद्दों को अलग कर रखा है. नदी के पानी का विकास और सहयोग भी एक ऐसा ही मुद्दा है जिस पर दोनों देश अपना सहयोग बढ़ा सकते हैं. दोनों देशों के बीच इस मुद्दे पर एक सहमति भी बनी हुई है, हालांकि पिछले वर्षों में कई बार इस मुद्दे पर दोनों देशों के बीच इसको लेकर राजनीति भी हुई है.
सीपीएन-यूएमएल के एक नेता ने कहा है कि नेपाल का वामपंथी गठबंधन ‘‘ना तो भारत विरोधी’’ होगा और ‘‘ना ही चीन समर्थक’’ होगा.साथ ही , यह दोनों देशों के साथ अच्छे संबंध कायम रखेगा. सीपीएन- यूएमएल के महासचिव ईश्वर पोखरेल ने कहा, ‘‘दोनों देश (भारत और चीन) हमारे पड़ोसी हैं, हम दोनों पड़ोसियों का सम्मान करते हैं. भारत हमारा पड़ोसी है. कोई नेपाली भारत विरोधी नहीं होगा.’’ हांगकांग के साउथ चाइना मार्निंग पोस्ट की खबर के मुताबिक उन्होंने जोर देते हुए कहा कि उनकी पार्टी ना तो भारत विरोधी है, ना ही चीन समर्थक है.
स्वतंत्रता के बाद, भारत में नेपाल में अपने रणनीतिक हितों को देखते हुए नेपाल के साथ खुली सीमाएं रखने का फैसला किया था, हालांकि इसके कारण होने वाली अपराधिक और समाज-विरोधी गतिविधियाँ भारत के लिए गंभीर समस्या बन चुकी हैं. खुली सीमा का अपराधी, तस्कर आदि लाभ उठाते हैं. इसमें चोरी, डकैती, हत्याएं, कस्टम ड्यूटी की चोरी, नशीले पदार्थों, हथियारों, अवैध जानवरों की खाल और अन्य चीजों, तथा पुरातत्व से जुडी मूर्तियों आदि की की तस्करी शामिल है. खुली सीमा होने के कारण अवैध आवागमन भी होता रहता है और ऐसे लोगों की संख्या के लिए कोई सीमा या कोटा निर्धारित न होने की वजह से यह कभी पता नहीं चला पाता कि कितने लोग अवैध रूप से देश में दाखिल होते हैं. इसका साफ़ असर भारत के तराई क्षेत्र में देखा जा सकता है, जहां का जनसँख्या, सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक परिवेश इस वजह से बदल गया है.
आर्थिक और सीमा सुरक्षा के अलावा नदी के पानी की साझेदारी भी दोनों देशों के बीच अन-सुलझा मुद्दा है. वर्ष 1992 में तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने नेपाल की यात्रा के दौरान कहा था कि भारत नेपाल के औद्योगीकरण में सहायता करेगा और नदियों के पानी का उचित उपयोग करने पर भी सहयोग करेगा. उसके बाद से भारत ने नेपाल के प्रति उदार रवैया अपनाना शुरू किया था, लेकिन कुछ सालों बाद नेपाल में कम्युनिस्ट ताकतों के मजबूत होने की वजह से नेपाल की आन्तरिक राजनीति भारत के लिए चिंता का विषय बनी हुई है. वहां के वाम दल भारत को एक अधिनायकवादी ताकत के रूप में प्रचारित करते हैं और नेपाली कांग्रेस को भारत को समर्थन देने वाली पार्टी के रूप में देखते हैं. वाम दल 1950 के भारत-नेपाल संधि, नदियों के जल के समझौते और भारतीयों मूल के लोगों के नेपाल में बसने के भी खिलाफ हैं. यह साफ़ है कि नेपाल के साथ परम्परागत दोस्ती के अधर पर अब रिश्तों को परिभाषित नहीं किया जा सकता. जहां भारत के हित में है कि अब नेपाल में एक स्थायी सरकार बने, वहीँ नेपाल में भारत-विरोधी जनभावना को दूर करना भी जरूरी है.

 

 

टीम डिजिटल

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