देश की हर सीमा की पुख्ता सुरक्षा जरूरी

 

निशिकांत ठाकुर

पिछले सप्ताह दिल्ली में आहूत एक बैठक में जम्मू-कश्मीर संभाग की सुरक्षा स्थिति की समीक्षा करते हुए गृहमंत्री अमित शाह ने साफ कहा कि प्रधानमंत्री एक शांतिपूर्ण और समृद्ध कश्मीर देखना चाहते हैं। चूंकि बैठक जम्मू—कश्मीर के लिए हो रही थी, इसलिए प्रधानमंत्री की मंशा जम्मू—कश्मीर को लेकर क्या है, उसे साझा किया गया। लेकिन, हमारी सीमा तो सात देशों— बांग्लादेश, चीन, पाकिस्तान, नेपाल, म्यांमार और अफगानिस्तान से भी लगती है। यदि हम भूटान की सीमा को भी जोड़ दें तो आठ देशों से भारत की सीमा लगती है। निश्चित रूप से अन्य देशों, जिनसे हमारी सीमा जुड़ती है, के लिए भी अलग—अलग बैठकें होती होंगी, लेकिन इनमें से कुछ देश हमारे मित्र हैं। उनसे हमारे अच्छे संबंध हैं, इसलिए उन देशों की सीमाओं के साथ हम उतने आक्रामक नहीं होते हैं।

पाकिस्तान चूंकि हमारे लिए महत्वपूर्ण इसलिए हो जाता है, क्योंकि उसका जन्म ही भारत विरोध के लिए हुआ है और वह भारत पर हर समय किसी— न—किसी रूप में हमला करने की ताक में लगा रहता है। दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि बंटवारे के बाद से अब तक उसके जितने भी शासक हुए, किसी ने संबंधों को सुधारने की दिशा में कोई पहल नहीं की। पाकिस्तान के राजनेताओं की राजनीति चलती ही भारत विरोध पर है, फिर वह इसे सुधारने का प्रयास करें तो क्यों? हमारे देश की सीमा पाकिस्तान से 2,900 किलोमीटर लंबी, यानी 1,800 मील की है, जिसकी सुरक्षा करना टेढ़ी खीर है।
विभाजन की घोषणा 3 जून की शाम को आल इंडिया रेडियो पर माउंटबेटन ने की थी। महीनों के व्यस्त और गहन विचार-विमर्श तथा वार्ता, जिसमें लंदन में ब्रिटिश सरकार, भारत सरकार और एक भारतीय राय रखने वाले व्यापक क्षेत्र शामिल थे, और साथ में इस खेल के केंद्र में मौजूद थे कांग्रेस, मुस्लिम लीग और सिख प्रतिनिधि। लंदन में प्रधानमंत्री एटली ने दोपहर 3.30 बजे हाउस ऑफ कॉमन्स में एक बयान दिया। यह भारत के रेडियो पर प्रसारित किया गया था। संबोधित माउंटबेटन ने किया था।

वर्ष 2000 में एक बार बाघा बॉर्डर पर सीमा पार के एक पाकिस्तानी नागरिक से पूछा कि इतनी लंबी सीमा सुरक्षा के लिए आपके पाकिस्तान की क्या भूमिका रहती है? उसका उत्तर बहुत ही विचलित करने वाला था। उसका कहना था कि यह फेंसिंग आपने अपने देश की सुरक्षा के लिए लगाई है। ऐसे में पाकिस्तान इसकी सुरक्षा की जहमत क्यों उठाए। इसी का तो परिणाम है कि जब भी देखें, सेंध मारकर वे हमारी सीमा में घुसकर उत्पात मचाते हैं। शायद ही कोई दिन ऐसा जाता हो, जब पाकिस्तान द्वारा किसी—न—किसी प्रकार के आतंक की सूचना न मिलती हो। कश्मीर घाटी के निवासी तो इन घटनाओं को सियासतदानों का खेल मानते हैं। उनका कहना है कि पाकिस्तान कंगाल देश है। उसकी यह हैसियत नहीं कि वह हिंदुस्तान में घुसकर यहां के आबोहवा को खराब करे। घुसपैठ और आतंक फैलाना शुद्ध सियासी खेल है और नुकसान आम भारतीय जनता को उठाना पड़ता है।

गृहमंत्री ने बैठक को संबोधित करते हुए कहा कि इस छद्म युद्ध को जीतने के लिए सीमापर आतंकियों, हथियार व गोला—बारूद की आवाजाही का डर पूरी तरह समाप्त करना जरूरी है। पुलवामा जैसी घटनाओं से अब जनमानस त्रस्त हो गया है। उसकी यह इच्छा कभी नहीं होती कि खामख्वाह उस पर कथित आतंकी हमला हो और वे अशांत रहें। अपनी यात्रा के दौरान कई स्थानीय निवासियों ने कहा कि हम वर्षों से अशांत हैं और यहां के लगभग सभी निवासी इस आतंकी युद्ध में अपने परिवार के किसी—न— किसी को खोया है। इसलिए अब और नहीं। यह खेल बंद होना चाहिए। सरकार को इस पर कड़ाई से निर्णय लेने की जरूरत है।

पाकिस्तान तो चोर की तरह घुसकर हमारे यहां बार—बार घुसपैठ करता रहता है, लेकिन वहीं चीन को देखें, तो वह डाकू की तरह हमारी सीमाओं में घुसकर अपना गांव तक बसा लेता है। दादागीरी यह कि इसे मानने के लिए भी वह तैयार भी नहीं होता। देश बड़ा हो तो स्वाभाविक है उसकी सीमाएं भी बड़ी होंगी। भारत-चीन की सीमा 4,047 किलोमीटर की है, जो भारत के पांच राज्यों जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश जैसे दुरूह राज्यों से गुजरता है। इन राज्यों में वह हर बार अतिक्रमण करके थोड़ी—थोड़ी जमीन हथियाता रहता हैं और समय—समय पर आंख भी दिखाता रहता है। चूंकि उसके नाक—नक्श भारतीय नागरिक से नहीं मिलते, इसलिए वह पाकिस्तान की तरह छुपकर आतंकी कार्रवाई नहीं करता, लेकिन सीना ठोंककर हमारी अंतर्राष्ट्रीय मैक मोहन सीमा—रेखा को मानने से साफ इंकार कर देता है। चूंकि वह सर्वसंपन्न और शक्तिशाली देश है, इसलिए अपनी विस्तारवादी नीति के तहत बार—बार सीमा—रेखा का उल्लंघन करता रहता है। पिछले दिनों गलवां घाटी में हमारे 20 सैनिकों को बेवजह शहीद कर दिया था। इस धींगामुश्ती और विस्तारवादी नीति के कारण वह अपने पड़ोसी किसी—न—किसी देश से उलझता रहता है। अभी वह अपनी विस्तारवादी नीति के ही कारण ताइवान को युद्धाभ्यास के नाम पर तपा रखा है, जिसमें उसने अमेरिका से सीधे पंगा ले लिया है।

भारतीय सीमा जिन देशों से लगती है, उनमें पाकिस्तान और चीन ही ऐसे दो देश हैं जिनका धर्म यह है कि वह भारत से पंगा लेते रहें और अपनी खुन्नस दूर करते रहें। बांग्लादेश हमारा मित्र है और सच तो यही है कि भारत के कारण ही आज बांग्लादेश अपने अस्तित्व में आया है। यदि कांग्रेस की समकालीन इंदिरा गांधी की सरकार वर्ष 1971 में पूर्वी पाकिस्तान में हस्तक्षेप नहीं करती तो आज बांग्लादेश इस रूप में नजर ही नहीं आता। लेकिन, इस बात को कोई आज नहीं मानता और बांग्लादेश भी कभी—कभी आंखें दिखाने से बाज नहीं आता। नेपाल एक मात्र विश्व का हिंदू राष्ट्र है और उस देश से हमारा आदिकाल से रोटी-बेटी का संबंध रहा है, इसलिए हम नेपाल के प्रति आश्वस्त रहते हैं कि वहां सीमा हमारी सुरक्षित है। म्यांमार और अफगानिस्तान से हमारे संबंध अच्छे—बुरे होते रहते हैं, लेकिन हमें उन देशों से कोई खतरा नहीं रहता। इसी प्रकार भूटान भी हमारा मित्र देश है, इसलिए हमें उनसे भी खतरा नहीं है। जिन दो देशों की सीमा से हमारे भारतीय नागरिक आजिज आ चुके हैं, वे पाकिस्तान और चीन ही हैं। इसलिए इन दोनों देशों से हमारी सरकार की बातचीत के साथ—साथ सीमा को और मजबूत बनाए रखने की आवश्यकता है। जिस तरह गृहमंत्री ने पाकिस्तान की सीमा को शील्ड करने की योजना बनाई है, यदि उस पर यदि अक्षरशः पालन किया गया तो आतंकियों की रीढ़ कमज़ोर होगी और भारतीयों का मनोबल बढ़ेगा, जिससे वे सीमा क्षेत्र में अपने विकास के लिए सरकार से नई—नई योजनाओं को क्रियान्वित करने का प्रयास करेंगे। रही बात चीन की, उससे तो हमेशा सतर्क रहने की जरूरत है। चीन के लिए यही कहा जा सकता है कि ‘सतर्कता हटी, दुर्घटना घटी’, क्योंकि चीन सदैव लंबा हाथ मारने के लिए बैचेन रहता है और आम कहावत भी है कि ‘चीन का प्रवेश जहां कहीं हो जाता हैं, वहां केवल ड्रैगन ही नजर आता है।’

 

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हैं)

 

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