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रानी कमलापति स्टेशन से देश के कोने-कोने में पहुंचेगी जनजातीय समाज की यशगाथा

कृष्णमोहन झा

राजधानी भोपाल का हबीबगंज स्टेशन अपने नवीनतम भव्य विश्वस्तरीय स्वरूप में रानी कमलापति स्टेशन के नाम से जाना जायेगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी एक गरिमामय समारोह में कमलापति स्टेशन का लोकार्पण करने के लिए भोपाल पधार रहे हैं । भोपाल की जनता के लिए यह निश्चित रूप से यह द्विगुणित हर्ष और गौरव का विषय है । हबीबगंज स्टेशन ‌‌को आधुनिकतम सुविधाओं से सुसज्जित विश्व स्तरीय स्टेशन का स्वरूप प्रदान करने के उद्देश्य से पिछले कई सालों से रात दिन निर्माण कार्य किया जा रहा था जिसके जल्द से जल्द पूर्ण होने की अधीरता से प्रतीक्षा की जा रही थी और यह भी एक सुखद संयोग है कि निर्माण कार्य पूर्ण होते ही राजधानी के निवासियों को दो खुशखबरी एक साथ मिलीं। पहली यह कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी स्वयं एक अनूठे समारोह में भव्य विश्वस्तरीय स्टेशन का लोकार्पण करने के लिए भोपाल आ रहे हैं और दूसरी यह कि हबीबगंज स्टेशन का नामकरण रानी कमलापति स्टेशन किया जा रहा है।इस शुभ घड़ी में भोपाल वासी स्वयं को हर्षित ,पुलकित और गौरवान्वित अनुभव कर रहे हैं । निश्चित रूप से यह ऐतिहासिक घड़ी होगी जिसका साक्षी बनने का सौभाग्य भोपाल वासियों को चंद घंटों बाद मिलने जा रहा है । केंद्र सरकार के प्रधानमंत्री पद की बागडोर नरेन्द्र मोदी के हाथों में आने के बाद देश ने इतिहास के पन्नों में स्वर्णाक्षरों में अंकित किए जाने योग्य जो गौरवशाली उपलब्धियां अर्जित की हैं उस श्रंखला की नवीनतम कड़ी के रूप में राजधानी में आज प्रधानमंत्री द्वारा रानी कमलापति स्टेशन का लोकार्पण किया जा रहा है । गौरतलब है कि इसके पूर्व भी जनभावनाओं का सम्मान करते हुए देश के कुछ प्रसिद्ध रेल्वे स्टेशनों के नाम बदले गए हैं उनके बीच भोपाल के हबीबगंज स्टेशन का रानी कमलापति स्टेशन के रूप में नामकरण का अपना अलग महत्व है जिसके लिए मोदी सरकार निश्चित रूप से साधुवाद की हकदार है।
जिन लोगों की पिछली कई पीढ़ियां भोपाल में निवास करती आ रही हैं उनमें से अधिकांश ने संभवतः रानी कमलापति की गौरवगाथा पढ़ी और सुनी होगी परन्तु हबीबगंज स्टेशन का नामकरण रानी कमलापति स्टेशन के रूप में किए जाने के बाद उनकी गौरवगाथा के प्रति सभी को जिज्ञासा होना स्वाभाविक है । रानी कमलापति स्टेशन पर अब जब देश के विभिन्न भागों से आने जाने वाली रेलगाड़ियां रुका करेंगी तो उनसे यात्रा करने वाले लोगों में भी कमलापति की महानता से अवगत होने की प्रबल इच्छा जागृत होना स्वाभाविक है। एक महान यशस्वी महारानी के नाम से अब जिस विश्वस्तरीय स्टेशन को जाना जाएगा उसकी यशगाथा यहां से गुजरनी वाली रेलगाड़ियों के सुधि यात्रियों के माध्यम से जब देश के कोने कोने में पहुंचेगी तब भोपाल के लोग यह सोचकर स्वयं को गौरवान्वित महसूस करेंगे कि अपनी आन ,बान,शान और धर्म की रक्षा हेतु जलसमाधि लेने वाली यशस्वी महारानी की कर्मभूमि यही भोपाल नगरी थी। रानी कमलापति की गौरवगाथा से परिचित होने के लिए हमें इतिहास के पन्ने पलटने की आवश्यकता है । रानी कमलापति 16 वीं शताब्दी में जिला
सीहोर के अंतर्गत आने वाली रियासत सलकन पुर के राजा कृपालसिंह सरौतिया की पुत्री थीं। कमल के सौंदर्य की धनी पुत्री का नाम इसीलिए कमलापति रखा गया था। जो बुद्धि मती, रूपमती होने के साथ ही युद्ध कला में भी पारंगत थीं।
कमला पति जब विवाह के योग्य हुईं तो पिता कृपालसिंह ने उनके लिए सुयोग्य वर की तलाश शुरू की ।उनका भांजे चैनसिंह की जो जमींदार परिवार से संबंध रखता था, कमलापति पर नजर थी परंतु कमलापति उसे सख्त नापसंद करती थी। कमलापति ने भोपाल से 55 किलोमीटर दूर स्थित गिन्नौर गढ़ के राजा सुराजशाह के पुत्र निजामशाह से विवाह करना स्वीकार किया। निजामशाह ने रानी कमलापति से अपने अटूट प्रेम के रूप में भोपाल में सात मंजिला कमलापति महल बनवाया। इसी बीच रानी ने एक सुंदर पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम नवल शाह रखा गया। उधर चैन सिंह की कुदृष्टि रानी पर हमेशा बनी रही। एक दिन उसने निजामशाह को भोजन पर आमंत्रित किया और उन्हें भोजन में जहर देकर मार डाला। रानी को असहाय मानकर उसने गिन्नौरगढ पर हमला कर दिया। बाद में रानी अपने पुत्र को लेकर भोपाल स्थित महल में रहने के लिए आ गई। रानी कमलापति जानती थीं कि चैन सिंह अपनी निकृष्ट हरकतों से बाज नहीं आएगा इसलिए रानी ने भोपाल की सीमा पर रूके अफगानियों के मित्र दोस्त मोहम्मद खान के माध्यम से चैनसिह को मरवा देने का विकल्प चुन लिया।दोस्त मोहम्मद खान पैसै लेकर युद्ध करता था। दोस्त मोहम्मद खान ने चैन सिंह से रानी को छुटकारा दिला दिया परंतु बाद में उसकी भी नीयत बदल गई। उसने पहले गिन्नौरगढ पर कब्जा किया फिर वह संपूर्ण भोपाल पर कब्जा कमाने की साजिश रचने लगा। उसकी कुदृष्टि को भांप कर रानी के 14 वर्षीय पुत्र नवलशाह ने अपने 100 साथियों के मिल कर लालघाटी में उसके युद्ध करने का फैसला किया परंतु उस युद्ध में नवलशाह बच नहीं सका। बताया जाता है कि उस युद्ध में इतना रक्त बहा कि धरती लाल हो गई। इसीलिए तब से उस क्षेत्र को लालघाटी के नाम से जाना जाने लगा। युद्ध में बच गए दो लडाकों ने मनुआभान की पहाड़ी पर धुंआ करके युद्ध के परिणाम की सूचना रानी कमलापति को दी। उसके बाद रानी ने बड़े तालाब के बांध का सकरा रास्ता खुलवाया जिससे पानी का छोटे तालाब में आना शुरू हो गया और फिर रानी ने समस्त दौलत और आभूषणों के साथ जल समाधि ले ली। बताया जाता है कि कमलापति महल की पांच मंजिलें अभी भी पानी में समाई हुई हैं।विश्वस्तरीय कमलापति स्टेशन पर रुकने वाली रेलगाड़ियां संपूर्ण देशवासियों को उनकी गौरवगाथा से परिचित कराएंगी।
देश में अभी भी ऐसी ऐतिहासिक , पौराणिक, सामाजिक और सार्वजनिक महत्व की इमारतों, स्टेशनों और नगरों आदि की संख्या कम नहीं है जो जब तब हमारे मन में यह टीस पैदा करती हैं कि इस महान देश में अतीत में मुगल शासकों और अंग्रेजी हुकूमत ने यहां की धर्म और संस्कृति से खिलवाड़ करने में कोई शर्म महसूस नहीं की थी । उन्होंने यहां की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, धार्मिक धरोहरों को अपनी मनमानी का शिकार बनाया। अनेक शहरों, इमारतों आदि के नाम बदल डाले । अनेक शहरों में महत्वपूर्ण मार्गों के नाम अभी भी मुगल अथवा शासकों के काल की कटु यादों को हमारे मानस पटल से नहीं मिटने देते। मोदी सरकार ने उन कटु यादों को हमारे मानस पटल से मिटाने की पुनीत भावना से एक स्तुत्य अभियान प्रारंभ किया है । भोपाल में हबीबगंज स्टेशन का रानी कमलापति स्टेशन के रूप में नामकरण करने का फैसला भी उसी दिशा में सराहनीय पहल है । हर देशभक्त भारत वासी की दिली इच्छा यही है कि यह सिलसिला निरंतर जारी रहना चाहिए । इसके लिए आवश्यक साहस और इच्छा शक्ति प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अंदर कूट कूट कर भरी है इसलिए भारत की जनता को यह भरोसा है कि मुगल और अंग्रेज आक्रांताओं की कर्कश यादें अब हमारे मानस पटल पर फिर कभी नहीं उभरेगी।

टीम डिजिटल

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