असहमति की आवाज अब बंद

 

कमलेश भारतीय

लीजिए । अब मीडिया में असहमति की आवाज बंद कर दी गयी है और इस पर भी कब्जा जमा लिया गया है क्योंकि अब असहमति की आवाज सुनना कानों को पसंद नहीं है । यह असहमति की आवाज थी -एनडीटीवी के रवीश कुमार की , जिन्हें मैग्सेसे सम्मान भी मिला । जब से मीडिया के अधिकांश संस्थान और टीवी चैनलों ने सत्ता के आगे पूरी तरह समर्पण कर दिया तब से धीरे धीरे स्वतंत्र सोच रखने वाले पत्रकारों को भी बाहर का रास्ता दिखाया जाने लगा । इनमें अजीत अंजुम , अभिसार कौशिक, दीपक चौरसिया व अन्य अनेक पत्रकार शामिल हैं । अब ये पत्रकार अपने अपने यूट्यूब चैनल चला रहे हैं । इनमें से सिर्फ एनडीटीवी और रवीश कुमार ही बचे हुए थे और आखिर इसे भी अदाणी समूह ने अजगर की तरह अपनी लपेट में ले ही लिया और अब असहमति की बची हुई एकमात्र आवाज भी दबा दी गयी ।
राष्ट्रीय मीडिया के इस तरह आत्मसमर्पण का दृश्य वैसे ही है जैसे महाभारत का द्रौपदी चीरहरण ! सभी महारथी सिर झुकाये बेबस बैठे हैं और दुशासन चीरहरण कर अट्टहास कर रहा है !
आखिर मीडिया पर इतने पहरे क्यों ? क्या अब सोशल मीडिया ही सबसे पावरफुल हो जायेगा ? सोशल मीडिया पर भी खतरे मंडराने लगेंगे ? क्या गौरी लंकेश को भूल जाना इतना आसान होगा ? वे आज बेहद याद आईं । रवीश कुमार ने असहमति दर्ज करवानी बंद नहीं की और आखिर इस्तीफा देकर बाहर आ गये । क्या भास्कर पर छापे भूल जाओगे ? क्योंकि गंगा किनारे अनजान शवों को दिखाने का साहस किया था ? क्या कभी जब ज्ञानी जैल सिंह पंजाब के मुख्यमंत्री थे तब पंजाब केसरी कार्यालय की बिजली काट दी गयी थी और ट्रैक्टर से डीजल सप्लाई कर अखबार का प्रकाशन किया गया था , उसे भूल जाना आसान है ? चेतना अखबार के भवन पर भी ऐसे ही चोट की गयी थी जिसके निशान आज भी बाकी हैं । कितने ही ऐसे उदाहरण याद आ रहे हैं जब मीडिया की स्वतंत्रता , अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला किये गये । आपातकाल में तो संपादकीय तक सेंसर किये जाते थे । अब बिना आपातकाल के असहमति की आवाज चुपचाप दबा दी जाती है और कहीं विरोध को कोई चिंगारी भी नहीं ! बार बार लालकृष्ण आडवाणी की बात याद आती है जब आपातकाल के बाद जनता सरकार में वे सूचना व प्रसारण मंत्री बने और मीडिया पर उन्होंने कहा कि हमने तो थोड़े से निर्देश दिये थे और ये मीडिया वाले तो दंडवत हो गये ! यही क्यों कभी दूरदर्शन को राजीव दर्शन भी कहा जाता था । मीडिया का यह दंडवत होना लोकतंत्र के लिए बहुत घातक है । मीडिया का इस तरह बिक जाना बहुत शर्मनाक है । याद आ रही है रामावतार त्यागी की कविता :
इस सदन में मैं अकेला ही दीया हूं , मत बुझाओ
जब मिलेगी रोशनी मुझसे ही मिलेगी ,,
अब छोटे पत्रों और यूट्यूबर्ज की जिम्मेदारी बढ़ गयी है और सोशल मीडिया की भी ,,,,

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