मकर संक्राति है तो दही, चूड़ा और चीनी ट्रेंड में है। पर आप शायद ही जानते हों कि सांख्य दर्शन की उत्पति इसी भोजन से हुई है। सांख्य दर्शन के प्रवर्तक कपिल मुनि थे। षड्दर्शन में यह सबसे प्राचीन है। भगवद्गीता से लेकर उपनिषदों तक में प्रत्यक्ष/अप्रत्यक्ष रूप में इसके दर्शन होते हैं।
दही, चूड़ा और चीनी के साथ सांख्य दर्शन को समझने से पहले हम इस भोजन के बारे में जानते हैं। सृष्टि में जो सबसे उत्कृष्ट है, वह यही भोजन है। गोरस में सबसे मांगलिक वस्तु है, दही। अन्न में चूड़ामणि है, चूड़ा। मधुर यानी मिठाई के मूल में है, चीनी।
इन तीनों का संयोग मतलब त्रिवेणी संगम। त्रिलोक का आनंद। दही भुवलोक। चूड़ा भूलोक। चीनी स्वलोक।
माना जाता है कि दही, चूड़ा और चीनी के अनुभवों के आधार पर ही कपिल मुनि ने तीन गुण का वर्णन किया है। त्रिगुण मतलब दही, चूड़ा और चीनी। दही सत्त्वगुण। चूड़ा तमोगुण। चीनी रजोगुण।
असल सत्त्व दही में होता है। इसलिए यह सत्त्वगुण है। चीनी गर्दा है, मतलब रज। चूड़ा रुक्षतम है, मतलब तम। माना जाता है कि इसलिए मिथिला में आज भी ‘तमहा’ चूड़ा शब्द प्रचलित है।
इसे और विस्तार से समझते हैं। तम का अर्थ है अंधकार। जब चूड़ा पात्र में आता है तो आंखों के सामने अंधेरा छा जाता है। फिर उस पर उज्जर यानी सफेद दही पड़ते ही प्रकाश का उदय होता है। सत्त्वगुण को प्रकाश कहा जाता है। सत्त्वं लघु प्रकाशकमिष्टम्। यही कारण है दही लघुपाकी और इतना प्रिय होता है। रजोगुण के बिना क्रिया का प्रवर्तन संभव नहीं है। इसलिए बिना चीनी के आप दही और चूड़ा नहीं खा सकते।
वैसे कुछ लोग दही, चूड़ा को नमक के साथ भी खाते हैं। तो ऐसे बुद्धि व्याधियों का शास्त्र में कोई इलाज नहीं है। जब सृष्टि राम के आगमन के उत्साह में डूबी रहती है ऐसे लोग न्याय यात्रा पर निकल जाते हैं। ऐसे ही लोगों के लिए मैथिली में कहा गया है- भोज ने भात, हरहर गीत!
नोट: दही, चूड़ा, चीन को लेकर इस सिद्धांत के प्रवर्तक खट्टर काका हैं। खट्टर काका के प्रवर्तक मैथिली के प्रसिद्ध व्यंग्यकार प्रोफेसर हरिमोहन झा हैं। खट्टर काका के मैथिली में प्रतिपादित सिद्धांत के हिंदी प्रवर्तक अजीत झा हैं। तस्वीर उसी कपिलेश्वर महादेव की अराधना करते हुए है, जिसकी स्थापना कपिल मुनि ने की थी। यह जगह बिहार के मधुबनी जिले में कपिलेश्वर नामक स्थान पर है।
बोलिए सियावर रामचंद्र की जय!
(साभार : अ से अजीत)

