बिहार की राजनीतिक और आर्थिक यात्रा पिछले दो दशकों में निर्णायक मोड़ पर रही है। एक समय था जब राज्य की छवि केवल जंगलराज, अपराध और पलायन के लिए जानी जाती थी। नब्बे के दशक में भ्रष्टाचार, बाहुबलियों का आतंक, ठप पड़े उद्योग और बुनियादी सुविधाओं की अभावपूर्ण स्थिति ने बिहार को विकास की दौड़ से पीछे कर दिया था।
लेकिन 2005 के बाद एनडीए सरकार के आगमन ने राज्य की तस्वीर बदलने का काम किया। कानून-व्यवस्था की बहाली, सड़क और बिजली जैसी आधारभूत संरचनाओं में सुधार, शिक्षा और स्वास्थ्य पर ध्यान ने जनता में विश्वास जगाया कि बिहार अब पीछे नहीं रहेगा।
औद्योगिक और निवेश क्षेत्र में भी राज्य ने उल्लेखनीय प्रगति की है। बिहटा ड्राई पोर्ट, मखाना बोर्ड, बरौनी रिफाइनरी और विभिन्न थर्मल पावर प्रोजेक्ट्स ने रोजगार सृजन और आर्थिक विकास को नई दिशा दी। शिक्षा के क्षेत्र में IIT, IIM और AIIMS जैसी संस्थाओं की स्थापना ने युवा पीढ़ी के लिए नए अवसर खोले।
आज बिहार युवा ऊर्जा, सांस्कृतिक विरासत और लोकतांत्रिक आकांक्षाओं के सहारे देश के विकास में अग्रणी भूमिका निभा रहा है। पलायन धीरे-धीरे कम हुआ है, और राज्य के लोग अब न केवल रोजगार की तलाश में बाहर नहीं जा रहे, बल्कि खुद रोजगार देने की दिशा में कदम बढ़ा रहे हैं।
हालांकि अभी भी चुनौतियाँ मौजूद हैं – शिक्षा की गुणवत्ता, स्वास्थ्य सेवाओं का ढांचा और रोजगार सृजन पर लगातार काम करने की आवश्यकता है। लेकिन विकास की निरंतर गति और नीति स्थिरता ने बिहार को अवसर और प्रगति का केंद्र बना दिया है।
बिहार की राजनीति पर चर्चा हो और नब्बे का दशक याद न आए, यह संभव ही नहीं। जबकि आज के लाखों मतदाता उस दौर में पैदा भी नहीं हुए थे, फिर भी लालू राज के समय का जंगलराज आज भी लोगों की स्मृतियों और चर्चाओं में जीवित है। सोशल मीडिया पर आए दिन उसी दौर से जुड़े वीडियो और मीम्स सामने आते हैं, जो उस कालखंड के भयावह माहौल की याद दिलाते हैं।
दरअसल, नब्बे के दशक का बिहार भ्रष्टाचार, अपराध और विकासहीनता का पर्याय बन चुका था। उद्योग-धंधे ठप, शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था चरमराई हुई, और अपराध-राजनीति के गठजोड़ ने निवेश की संभावनाओं को खत्म कर दिया। नालंदा और विक्रमशिला जैसी ऐतिहासिक धरोहर की भूमि शिक्षा के मामले में पिछड़ गई। हालात इतने बिगड़े कि पटना हाईकोर्ट तक को कहना पड़ा कि “बिहार में सरकार नाम की कोई चीज़ नहीं है, यहाँ जंगलराज कायम है।”
2005 का विधानसभा चुनाव इस अंधकारमय दौर से निकलने का मोड़ साबित हुआ। के. जे. राव की निगरानी में हुए निष्पक्ष चुनावों ने राजद को सत्ता से बेदखल किया और एनडीए सरकार ने सत्ता संभाली। इसके बाद कानून-व्यवस्था की बहाली, सड़क और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं में सुधार, तथा शिक्षा और स्वास्थ्य पर ध्यान देकर बिहार ने एक नई राह पकड़ी।
नोबेल विजेता लेखक वी. एस. नैपाल ने जिस बिहार को कभी “सभ्यता समाप्ति की भूमि” कहा था, वही बिहार अब विकास और परिवर्तन की मिसाल बन रहा है। पिछले दो दशकों में कानून-व्यवस्था की मजबूती, राष्ट्रीय राजमार्गों का विस्तार, 100% विद्युतीकरण और IIT, IIM, AIIMS जैसे संस्थानों की स्थापना ने राज्य की तस्वीर बदल डाली।
औद्योगिक क्षेत्र में भी राज्य ने उल्लेखनीय प्रगति की है। बिहटा का ड्राई पोर्ट बिहार को ग्लोबल सप्लाई चेन से जोड़ रहा है, मखाना बोर्ड की स्थापना ने निर्यात का नया द्वार खोला है, और ऊर्जा क्षेत्र में हजारों करोड़ का निवेश हो चुका है। निवेशक सम्मेलन के जरिए राज्य में लाखों करोड़ रुपये के प्रस्ताव आए हैं, जिससे उद्योग और स्टार्टअप्स को नई ऊर्जा मिली है।
डबल इंजन सरकार ने बिहार को “नॉर्थ इंडिया का औद्योगिक ग्रोथ इंजन” बनाने का विज़न रखा है। बजट, जीडीपी और प्रति व्यक्ति आय में कई गुना वृद्धि इसका प्रमाण है। सामाजिक योजनाओं और आर्थिक सुधारों के साथ बिहार नई ऊँचाइयों की ओर अग्रसर है। आज का बिहार अब भय और पलायन की भूमि नहीं, बल्कि अवसर और विकास का केंद्र बन रहा है। जंगलराज का काला अध्याय अब बीते समय की बात हो चुका है। राज्य की युवा पीढ़ी अब जॉब सीकर नहीं बल्कि जॉब गिवर बनने की दिशा में आगे बढ़ रही है।


